अभिमन्यु का अमर बलिदान

             

 महाभारत-कथा  

बात महाभारत-युद्ध की है।

     युद्ध अपने चरम पर था। भीष्म पितामह के शरशैया पर गिर पड़ने के बाद आचार्य द्रोण को कौरव-सेना का सेनापति बना दिया गया था। दुर्योधन द्रोणाचार्य को उत्तेजित करने के उद्देश्य से बार-बार उनसे कहता — आपके हृदय में पाण्डवों के प्रति सहानुभूति है। आप हमेशा पाण्डवों का पक्ष लेते हैं। देखा जाए तो आपके लिए पाण्डवों को पराजित करना कोई दुष्कर कार्य नहीं क्योंकि आप ही उनके आचार्य थे व धर्नुविद्या आपके द्वारा ही उन्होंने सीखी थी।

     आचार्य द्रोण दुर्योधन के इस मिथ्या आरोप से आवेशित हो जाते और कहते —  दुर्योधन, तुम्हारा कहना बिल्कुल ठीक है, लेकिन पाण्डव-सेना में अर्जुन के रहते उसे कोई नहीं जीत सकता। यदि तुम किसी भी प्रकार से अर्जुन को सेना से दूर कर सको तो पाण्डवों को सहज ही जीता जा सकता है।

अर्जुन को कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि से दूर ले गए

     दुर्योधन ने इसका उपाय करने का निश्चय किया। अगले दिन दुर्योधन के निर्देश पर संशप्तक नामों के वीरों ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को युद्ध के वास्ते ललकारा। एक सच्चे वीर की भांति अर्जुन ने चुनौती स्वीकार की और युद्ध करने लगे। अपनी पहले से तय योजना के मुताबिक संशप्तक वीर युद्ध करते-करते अर्जुन को कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि से काफी दूर ले गए।

युधिष्ठिर को खुली चुनौती

     जैसे ही अर्जुन युद्ध से काफी दूर गया, द्रोणाचार्य ने अपनी सेना के माध्यम से चकव्यूह नामक सैन्य-व्यूह रचना की। इसके बाद दुर्योधन ने युधिष्ठिर को खुली चुनौती दी कि वह व्यूह भेद करें या हार मंजूर करें।

व्यूह-भेद का राज केवल अर्जुन जानते थे

      युधिष्ठिर इस चुनौती से काफी तनाव में आ गए। व्यूह-भेद का राज पांडवों में केवल अर्जुन ही जानते थे और उस समय वहां नहीं थे। युधिष्ठिर अपने तीनो भाईयों के साथ चिंतामग्न हो गए।

     उसने तभी अर्जुन का किशोर पुत्र अभिमन्यु अचानक वहां आ गया। सबको चिंतामग्न देखकर जब वजह जाननी चाही युधिष्ठिर ने सारी घटना सुना दी।

अभिमन्यु ने सबको आश्वस्त किया

     अभिमन्यु ने सारी बात सुनकर सबको आश्वस्त किया – आप लोग किंचित मात्र भी परेशान न हों। मैं कल अकेला ही व्यूह में प्रविष्ट होकर दुश्मनों का घमंड दूर कर दूंगा।

     अभिमन्यु ने बताया – जब मैं मां के गर्भ में था, उन दिनों एक दिन पिताश्री ने मेरी माताजी को चकव्यूह-भेद का रहस्य बताना शुरू किया। पिताजी ने चकव्यूह के छह दरवाजे तोड़ने की विधि बताई, तभी मेरी माताश्री को नींद आ गई। इसलिए पिताश्री ने आगे का रहस्य नहीं बताया। अतएव मैं चकव्यूह में दाखिल होकर छह द्वार तो तोड़ने में सक्षम हूं किंतु सातवां द्वार तोड़कर बाहर निकल आने का रास्ता मुझे नहीं पता।

    गौर से अभिमन्यु की बात सुन रहे महाबली भीम उत्साह से भर उठे, बोले – सातवाँ  द्वार मैं अपनी गदा से तोड़ दूंगा।

     युधिष्ठिर को न चाहते हुए भी किशोर को चक्र -व्यूह भेदने जाने की आज्ञा देनी पड़ी । अन्य कोई उपाय उनके सामने था भी नहीं।

   अगली सुबह युद्ध प्रारंभ हुआ।

अभिमन्यु व्यूह में दाखिल

   व्यूह के मुख्य द्वार की सुरक्षा का जिम्मा दुर्योधन के बहनोई जयद्र॒ध पर था जयद्र॒ध ने कठोर तपस्या के बल पर शंकर भगवान से यह वरदान पा लिया था कि वह अर्जुन के अलावा सभी पांडवों पर विजय पा सकेगा। जयद्रथ को अभिमन्यु ने अपनी बाणों की बौछार से इतना परेशान कर दिया कि हड़बड़ाहट में वह द्वार से हट गया। बस….फिर क्या था? अभिमन्यु एक झटके में व्यूह में दाखिल हो गया। लेकिन अगले ही पल जयद्रथ फिर सचेत हो गया और द्वार रोककर खड़ा हो गया। एड़ी से चोटी तक का जोर लगाने के बावजूद पूरे दिन भीमसेन या अन्य कोई पांडव व्यूह-प्रवेश न कर पाया। जयद्रथ अपने वरदान के फलस्वरूप सबको दरवाजे पर ही रोके रखने में सफल रहा।

    इधर अपने रथ को तेजी से दौड़कर कुल सोलह वर्ष का वीर अभिमन्यु दुश्मनों के व्यूह में घुस चुका था। हर तरफ से अस्त्रों-शस्त्रों की बौछार हो रही थी किंतु अभिमन्यु ने मानो डरना या विचलित होना सीखा ही नहीं था।

अभिमन्यु में बिजली की-सी फुर्ती

    अभिमन्यु में बिजली की-सी फुर्ती और तेजी थी। उसमें अपने धनुष से तीरोंकी कौरव-सेना पर बौछार कर दी। कौरवों की सेना वीर अभिमन्यु के सामने भला कैसे टिक पाती? सेना के हाथी, सैनिक, घोड़े आदि तेजी से धराशाही होने लगे। द्रोणाचार्य, कर्ण, अश्वथामा और शल्य सरीखे महारथी भी अकेले अभिमन्यु के सामने स्वयं को असहाय पा रहे थे। अभिमन्यु के दिव्यास्त्र उनके दिव्यास्त्रों से कहीं अधिक प्रभावकारी थे। अभिमन्यु बिना किसी विशेष बाधा के एक के बाद व्यूह के दरवाजों को तोड़ता हुआ तथा द्वार पर तैनात महारथी को सहजता से पराजित करता हुआ आगे बढ़ता गया। छह द्वार उसने इसी तरह आसानी से पार कर लिए।

    अकेले अभिमन्यु को बिना रूके इतनी बड़ी सेना से लगातार युद्ध करना पड़ रहा था। जिन योद्धाओं को वह पराजित कर पीछे छोड़ आया था, वे वापस संभल कर पीछा करते हुए युद्ध करने वापस आ पहुंचे थे। सातवें दरवाजे को भेदने का स्थान हालांकि अभिमन्यु को मालूम न था | लेकिन फिर भी वह परेशान न था और न ही थकान महसूस कर रहा था।

द्रोणाचार्य हतप्रभ

    कौरव सेना के अनेक महारथी अभिमन्यु के बाणों से घायल हुए यत्र-तत्र पड़े थे। द्रोणाचार्य हतप्रभ थे। फिर उन्होंने स्थिति की गंभीरता को देखकर कहा – `इस बालक के हाथों में जब तक धनुष है, विजय की उम्मीद करना व्यर्थ है।

युद्ध की नीति के विपरीत अन्याय से अभिमन्यु पर एक साथ आकमण

    कर्ण सहित छह महारथियों ने युद्ध की नीति के बिल्कुल विपरीत अन्याय से अभिमन्यु पर एक साथ आकमण कर दिया। उन लोगों ने मिलकर अभिमन्यु के रथ के घोड़ों को एक-एक कर मार दिया। सारथी को भी उन्होंने अनीतिपूर्वक मार दिया। कर्ण ने अभिमन्यु का धनुष काट दिया। यह देख अभिमन्यु ने  बगैर साहस खोये अपनी तलवार निकाली व रथ से कूदकर नीचे आ गया। तलवार से अभिमन्यु ने उन पर इतना जबर्दस्त हमला किया कि सभी भौंचक्के रह गए। फिर एक बार चारों ओर बदहवासी फैल गई।

कौरवों ने बेईमानी और अनीति से उसे घेर रखा था

    कौरवों ने बेईमानी और अनीति से उसे घेर रखा था और लगातार सब उस पर अस्त्रों-शस्त्रों से प्रहार कर रहे थे। अभिमन्यु का कवच कट कर गिर चुका था और बाणों से वह लहुलूहान हो गया था। हाथ की तलवार भी जब टूट गई तो अभिमन्यु ने रथ का एक पहिया उठाया और शत्रुओं पर आक्रमण किया। किसी में उसका मुकाबला करने का साहस न था।

अनीतिपूर्वक कौरवों ने वीर अभिमन्यु को जान से खत्म किया

तभी कौरव-पक्ष की ओर से एक और अन्याय हुआ। किसी ने पीछे से उसके शिरस्त्राण रहित सिर पर गदा से जर्बदस्त प्रहार किया। गदा के उस वार से अभिमन्यु तत्क्षण वहीं गिर पड़ा और उसका देहावसान हो गया। इस तरह अनीतिपूर्वक कौरवों ने वीर अभिमन्यु को जान से खत्म किया। रण-स्थल में साहस से लड़ते हुए अभिमन्यु ने महाभारत के इतिहास में अपना एक अमिट स्थान बना लिया।

अभिमन्यु का बलिदान  याद रखा जायेगा

    आज महाभारत की कथा अभिमन्यु के अमर  बलिदान का जिक्र किये बिना अधूरी है l उसका बलिदान हमेशा –हमेशा  याद रखा जायेगा l

वीर अभिमन्यु

महाभारत का युद्ध क्यों हुआ ?