safed dag

जानें सफ़ेद दाग के बारे में सबा कुछ

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आम आदमी सफेद दाग को एक गंभीर बीमारी मानता है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, इसे लाइलाज तथा धीरे-धीरे पूरे शरीर पर फैल जाने वाला रोग माना जाता है। इन मान्यताओं के चलते रोगी व उसके परिवार-जनों को अत्यधिक मानसिक यंत्रणा सहन करती पड़ती है। सफेद दाग के रोगी से सगे-सम्बन्धी, मित्र, पड़ौसी आदि इसे छूत की अथवा संक्रामक बीमारी मानकर एक दूरी रखने लगते हैं। कई अवसरों पर तो सफेद दाग शादी-सम्बन्धों तक में अवरोध बन जाते हैं। वस्तुतः रोगी को इस रोग में शारीरिक से अधिक मानसिक पीड़ा होती है। वह अक्सर हीन-भावना से ग्रस्त हो जाता है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू तक ने एक बार कहा था – ‘‘भारत में तीन बीमारियां हैं। क्षय-रोग (टी.बी.), कुष्ठ-रोग (लेप्रेसी) तथा फूलबैरी अथवा सफेद दाग (ल्यूकोडर्मा)।’’ पंडित नेहरू के इस कथन से स्पष्ट है कि सफेद दाग का उस समय एक गंभीर रोग माना जाता था।
सफेद दाग या फूलबैरी को एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में ‘ल्यूकोडर्मा‘ कहा जाता है, जो ‘ल्यूकस‘ और ‘डर्मा‘ नामक ग्रीक शब्दों से बना है, इसका अर्थ होता है ‘सफेद चमड़ी‘। आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली के अनुसार ‘ल्यूकोडर्मा‘ का कुष्ठ रोग से कोई संबंध नहीं है तथा यह संक्रामक रोग भी नहीं है।
इसके विपरीत प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में सफेद दाग को कुष्ठ रोग का एक रूप माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार विभिन्न प्रकार के कुष्ठ रोग वात, पिŸा, कफ और कृमि विकारों से उत्पन्न होते हैं। समस्त प्रकार के कुष्ठ रोगों में सफेद दाग सर्वाधिक सामान्य प्रकार का रोग है। आयुर्वेद के शास्त्रों में वर्णन आता है कि अत्यंत सुंदर व दर्शनीय शरीर पर भी छोटा-सा श्वेत दाग पड़ जाने से वह घृणित दिखाई देने लगता है। संभवतः इसी कारण जन सामान्य में इस रोग के प्रति घृणा व वितृष्णा का भाव उत्पन्न हुआ होगा।
आइए, हम इस रोग के कारणों व लक्षणों की आयुर्वेदिक और एलोपैथिक दोनो नजरिए से पड़ताल करें।
आयुर्वेद इस रोग के लिए वात, पिŸा, कफ और कृमि विकारों के अतिरिक्त दूषित रक्त को भी उŸारदायी मानता है। इसके साथ ही आहार-विहार की विसंगतियां भी सफेद दाग उत्पन्न करने में सहायक हो सकती हैं। खान-पान में विजातीय खाद्य पदार्थो का एक साथ सेवन जैसे दूध के साथ दही खाना, दूध के साथ बंैगन, मछली, मूली, उड़द आदि विजातीय पदार्थों का सेवन करना आदि।
व्यापक अनुसंधानों के पश्चात एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति ने ‘ल्यूकोडर्मा‘ के सम्बन्ध में जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनके अनुसार यह खतरनाक बीमारी नहीं है तथा इसका कोढ़ जैसी बीमारी से कोई ताल्लुक नहीं है।
बम्बई की विख्यात त्वचा-रोग विशेषज्ञ डाक्टर रेखा सेठ के अनुसार – ‘ सामान्यतः आदमी की त्वचा नई बनती रहती है और उसकी पुरानी सतह घिसती रहती है, जिसमें त्वचा के रंजक कण (पिगमेंट) रहते है। त्वचा की निचली सतह में ‘मैलनोसाइट‘ नामक कोशिकाएं रहती हैं। इनका कार्य ‘मैलनिन‘ नामक पदार्थ उत्पन्न करना होता है, जो त्वचा की ऊपरी परत को रंग (पिगमेंट) प्रदान करता है। जब शरीर के किसी खास हिस्से में ये ‘मैलनोसाइट‘ कोशिकाएं ‘हड़ताल‘ कर बैठती हैं और ‘मैलनिन‘ नामक पदार्थ का उत्पादन बंद कर देती हैं, तब चमड़ी का वह खास हिस्सा रंगहीन अथवा सफेद हो जाता है। इसे ही ‘सफेद दाग‘ कहा जाता है। यह तो स्पष्ट हो चुका है कि मैलनोसाइट कोशिकाएं कार्य करना कैसे बंद करती हैं किन्तु अभी यह सुनिश्चित नहीं किया जा सका है कि ये काम करना बंद क्यों कर देती हैं?‘‘
जहां तक इस सम्बन्ध में खोज की गई है, उसके अनुसार कोशिकाओं द्वारा कार्य बंद करने की पृष्ठभूमि में शरीर की प्रतिरोधक-शक्ति का कम होना, रबर, प्लास्टिक, और चमड़े के कार्य में प्रयुक्त होने वाले रसायनों के निरन्तर सम्पर्क में रहना घटिया सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करना आदि ज्ञात कारण सम्मिलित हैं।
आयुर्वेद व एलोपैथी दोनों इस तथ्य पर सहमत हैं कि ‘सफेद दाग‘ एक पैतृक रोग भी हो सकता है, यह बीमारी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़़ी में स्थानांतरित हो सकती है किन्तु यह आवश्यक नहीं कि यह रोग विरासत में संतान को मिले ही।
आयुर्वेद जन्म से ही होने वाले सफेद दाग के उपचार का असाध्य मानता है। इसी प्रकार एलोपैथी में प्राइमरी ल्यूकोडर्मा को उसके कारण ज्ञात नहीं हो पाने के कारण अनुपचारित माना जाता है जबकि सेकंडरी ल्यूकोडर्मा (द्वितीयक फुलबैरी) को उपचार के योग्य माना जाता है। एलोपैथी चिकित्सक रोगी को मैलनिन उत्पन्न करने वाली कोशिकाओं को पुर्नजीवित व सक्रिय करने के लिए खाने की गोलियां तथा प्रभावित भाग में लगाने को विशेष मल्हम देते हैं। आमतौर पर ‘मेथाक्सी सोरालीन‘ की टेबलेट दी जाती है, जो काफी हद तक असरकारक बताई जाती है। इसके अतिरिक्त शरीर के प्रभावित भाग पर पराबैंगनी किरणों से सिंकाई भी की जाती है, जिसके फलस्वरूप मृत मैलनोसाइट कोशिकाएं पुनः कार्य करना आंरभ कर देती हैं तथा चमड़ी को वापस अपना स्वाभाविक रंग प्राप्त हो जाता है। सफेद दाग के इलाज में दो माह से एक वर्ष तक का समय लग सकता है। लक्षण दिखाई देते ही उपचार शुरू कर देने से ठीक होने की संभावना अधिक रहती है।
आयुर्वेद के अनुसार यदि सफेद दाग के क्षेत्र विशेष के रोम भी सफेद हो गए हों तो वह असाध्य होता है। आयुर्वेद इस रोग के इलाज हेतु पुरातन काल में जिन आधार-भूत औषधियों पर निर्भर करता है वह है – हरताल, संखिया, गंधक, गौमूत्र, हरड़, हल्दी, दारू हल्दी, नीबू, बच, नीम आदि।
ताजा सफेद दाग हेतु श्वेतार्क के दुग्ध में काला नमक धिसकर लेप करना चाहिए। साथ ही रोगी को चालीस दिन तक निरन्तर प्रातःकाल एक से दो तोला नीम की पŸिायां पीस कर पीना चाहिए।
प्रतिदिन छोटी हरड़ का तीन माशा चूर्ण शुद्ध जल के साथ पीने तथा स्वमूत्र को दागों पर लगाने से भी सफेद दाग ठीक हो सकते हैं।
जानकार व अनुभवी लोगों के अनुसार बंैगन को दो भागों में काटकर उन्हें आपस में घिसा जाए और उससे उत्पन्न झाग को सफेद दाग पर लगाया जाए तो लाभ पहुंचता है।
हरताल, गंधक और फिटकरी को जल में पीस कर दागों पर लगाने से भी सफेद दाग समाप्त हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त शुद्ध किए हुए गंधक को सिरके में मिलाकर इसका लेप दागों पर करना चाहिए।
यद्यपि यह सारे उपचार आयुर्वेद के अन्तर्गत अनुभवी व्यक्तियों द्वारा बताए गए तथा दोष रहित हैं तथापि इनका प्रयोग करने से पूर्व अपने चिकित्सक से अवश्य परामर्श कर लेना चाहिए।
सफेद दाग रोग का सामान्य लक्षण है – शरीर के किसी हिस्से की त्वचा का रंग फीका पड़ना अथवा पूर्णतया रंगहीन हो जाना। प्रारम्भ में चमड़ी का रंग फीका पड़ता है, फिर क्रमशः यह भाग रंगहीन होता जाता है। यह रोग बचपन से बढ़ापे तक किसी भी अवस्था में हो सकता है। भारत में त्वचा रोगों से पीड़ित व्यक्तियों में से केवल एक प्रतिशत इस रोग के शिकार हैं, जबकि विदेशों में यह चार प्रतिशत तक है किन्तु वहां इस रोग को अधिक गंभीरता से नहीं लिया जाता क्योंकि गोरी त्वचा पर सफेद दाग विशेष रूप से नजर भी नहीं आते। आमतौर पर सफेद दाग हाथ, पीठ तथा चेहरे पर अधिक होते हैं।
सफेद दाग की तुलना कुष्ठ रोग से नहीं की जा सकती। कुष्ठ रोग एक गंभीर बीमारी है तथा शारीरिक क्षमता को प्रभावित करती है, जबकि सफेद दाग शरीर के एक हिस्से को रंगहीन करने के अतिरिक्त अन्य कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। शरीर के आंतरिक अंगों की कार्य क्षमता पर सफेद दाग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
इस रोग के रोगियों को लक्षण नजर आते ही समुचित उपचार करवाना चहिए तथा मन में हीनता की ग्रंथियां नहीं पालना चाहिए। प्रशासकीय तथा सामाजिक स्तर पर इस रोग के सम्बन्ध में व्याप्त निर्मूल धारणाओं के उन्मूलन के प्रयास होने चाहिए ताकि सामान्य जन में इस रोग के प्रति फैली निर्मूल भ्रांतियों को दूर किया जा सके।