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जिंदगी की शाम है बुढ़ापा !

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यदि हम वर्तमान ‘समाज‘ की समग्र तस्वीर को कम से कम शब्दों में अभिव्यक्त करना चाहें तो वह शब्द होंगे – ‘कुंठित युवा और उपेक्षित वृद्ध‘, विडम्बना यह है कि दिग्भ्रमित युवा-पीढ़ी के संत्रास, कुंठाएं, हताशा और पीड़ा तो आए दिन कैनवास पर उभरती रहती है किन्तु वरिष्ठ-जन न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में भी एकदम हाशिए पर हैं। जिन्दगी के कोरे कागज पर सार्थक इबारत लिखने वाले शख्स के यकायक हाशिए पर आ जाने के दर्द को मानवीय संवेदनाओं के स्तर पर उनसे जुड़कर ही महसूस किया जा सकता है।
विख्यात लेखिका साइमन द् बेवाह अपनी चर्चित पुस्तक ‘ओल्ड एज‘ में बुढ़ापे के बारे मे लिखती हैं, ‘‘ वृद्धावस्था मन से दुराव का एक तीखा पहलू है। आप जी रहे हैं किन्तु जिंदगी से वंचित किए जा चुके हैं। अब भी आप में चेतना है किन्तु वह इतनी तकलीफदेह है कि आप मौत को बेहतर मानने लगते हैं। यह उम्र का एक ऐसा मुकाम है, जहां आप जिन्दगी और मौत के बीच कहीं अटके हैं।‘‘
हालांकि साइमन की स्थापना से पूर्ण रूप से सहमत नहीं हुआ जा सकता, फिर भी वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के चलते यह काफी अधिक अंशों में सत्य प्रतीत होती है।
चिकित्सा-जगत में हुई आधुनिक खोजों, स्वास्थ्य के प्रति निरन्तर बढ़ती जागरूकता और विभिन्न राष्ट्रों की सरकारों व विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा चलाए गए अभियान के कारण मनुष्य की औसत आयु में बढ़ोŸारी हुई है। सन् 1950 के बाद आदमी की औसत आयु में लगभग बीस वर्ष की वृद्धि हुई है। सन् 1970 में विश्व में साठ से अधिक आयु के व्यक्तियों की संख्या 30 करोड़ चालीस लाख थी। एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में दुनिया में साठ वर्ष से बड़ी आयु के करीब 70 करोड़ लोग हैं। समाज की समूची संरचना में इतने बड़े वर्ग की उपेक्षा नही की जा सकती। अनुमान के अनुसार, यह वृद्धि विकसित और विकासशील राष्ट्रों में लगभग समान रूप से है।
आबादी के संतुलन में हो रहा यह परिवर्तन समूचे सामाजिक समीकरणों को गड़बड़ा सकता है। आगामी दशकों में जैसे-जैसे दीर्घायु जीवन में वृद्धि होगी, वैसे-वैसे हमें इसके सामाजिक परिणामों से दो-चार होना पड़ेगा। जनसंख्या की आयु-वृद्धि का यह परिवर्तन राष्ट्रीय स्तर पर कानून, कराधान, कल्याण कार्यक्रमों, रोजगार नीतियों आदि की आधारभूत परम्परागत मान्यताओं एवम् विचारों को ध्वस्त कर सकता है और इसके लिए हमे समय रहते समुचित नीति-निर्धारण करना होगा।
जहां तक भारत का प्रश्न है, इस समय लगभग 8 करोड़ वृद्ध हैं, जो कुल जनसंख्या के दस प्रतिशत से कम हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार सन् 2030 तक यह तादाद 20 करोड़ हो जाएगी। वृद्धों की संख्या की दृष्टि से भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। पाश्चात्य देशों में वृद्ध वरिष्ठ-जनों की समस्याओं पर और उनकी सुख-सुविधाओं पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है। इन देशों में सरकारें तथा स्थानीय प्रशासन वृद्धजनों को आवास, मनोरंजन, यात्रा, स्वास्थ्य तथा सभी क्षेत्रों में प्राथमिकता उपलब्ध कराना अपना कर्तव्य समझते हैं। अमेरिका आदि कई देशों में ‘सीनीयर सिटीजन सेंटर‘ कार्यरत हैं, जहां समाज के वरिष्ठ नागरिकों को जीवन यापन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की जाती है, फिर भी वहां बूढ़ों की स्थिति उपेक्षा के दायरे में आती है।
भारत में वृद्धावस्था की समस्याओं की पड़ताल करने के लिए हमें अपनी प्राचीन सांस्कृतिक परम्पराओं की पृष्ठभूमि में जाना होगा। संयुक्त परिवार प्रणाली प्रारम्भ से ही हमारी सामाजिक-व्यवस्था का मुख्य आधार रही है। वृद्ध जनों के प्रति आदर एवम् सम्मान का भाव हमारी सांस्कृतिक चेतना का मूल तत्व रहा है। पूर्व में घर के बुजुर्ग को संयुक्त परिवार में मुखिया की हैसियत हासिल थी। समस्त महत्वपूर्ण निर्णय परिवार के मुखिया द्वारा लिए जाते। परिवार के सभी सदस्य उसे पर्याप्त आदर प्रदान करते और इस प्रकार वृद्ध जनों की उपेक्षा की कोई समस्या नहीं थी, किन्तु ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान विकसित हुई सर्वथा नवीन संस्कृति ने क्रमशः संयुक्त परिवारों के परम्परागत ढांचे को प्रभावित करना प्रारंम्भ कर दिया और आज स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि इस नई संस्कृति के चलते संयुक्त परिवार संस्था लगभग विघटन की कगार पर है। इसके लिए विभिन्न कारक उत्तरदायी है, मसलन नैतिक मूल्यो में गिरावट, बेरोजगारी की समस्या, मंहगाई, आधुनिकता, पाश्चात्य सभ्यता के दुष्प्रभाव, बदलती सामाजिक परिस्थितियां और तथाकथित ‘जनरेशन गेप‘ आदि।
देश में उपेक्षित वृद्ध जनों की समस्याओं का मूल कारण संयुक्त परिवार प्रणाली का विघटन ही है। संयुक्त परिवारों के टूटने से जहां वृद्धोें में असुरक्षा, अकेलेपन और आर्थिक अभावों की समस्या बढ़ी है, वहीं युवाजन भी उनके अनुभव, स्नेह और मार्गदर्शन से वंचित हुए हैं। इससे पैदा हुआ सामाजिक शून्य भी कई मनोवैज्ञानिक समस्याओं का जनक है। पहले जहां परिवार के शिशु व बालक वृद्धजनों के स्वाभाविक स्नेह के अधिकारी थे, अब तो उनका बचपन दादा-दादी के नैसर्गिक प्रेम से सर्वथा वंचित रह जाता है। ऐसी स्थिति में बच्चों में बड़े-बूढ़ों के प्रति लगाव व आदर की भावना के विकास की कल्पना करना कठिन है।
बुढ़ापा अपने साथ कई समस्याएं व परेशानियां लेकर आता है, वृद्धावस्था की समस्याओं को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा जा सकता है। पहली शारीरिक व स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और दूसरी मानसिक अकेलपन का कचोटता अहसास, वैसे आर्थिक अहसास अभाव, परिवार व समाज का स्थायी उपेक्षा..भाव, मृत्यु का भय, जीवन के प्रति असुरक्षा की भावना आदि अनेकानेक समस्याएं भी बुढ़ापे के हिस्से में आती हैं।
वृद्धावस्था के आगमन के साथ ही व्यक्ति शारीरिक रूप से अपने आपको कमजोर महसूस करने लगता है। शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता में आई गिरावट के कारण विभिन्न रोग उसे घेरने लगते हैं, शारीरिक व मानसिक प्रक्रियाओं का असंतुलन भी बुढ़ापे की समस्या को और अधिक विकराल स्वरूप प्रदान करता है। जीवन के इस मोड़ पर जब आदमी आर्थिक तौर पर भी असहाय हो जाता है, तब बीमारी के समुचित उपचार के लिए आवश्यक धन जुटाना भी उसके कठिन हो जाता है। इस अर्थ-प्रधान युग में अधिकांश परिवारजन अपने परिवार के वृद्ध सदस्य की बीमारी पर होने वाले खर्च को एक गैर जरूरी बोझ मानने लगते हैं। ऐसी परिस्थितियों में शारीरिक रोगों से जकड़ा बेचारा वृद्ध अतिशय मानसिक तनाव का भी शिकार हो जाता है। उसके पास अपनी विवशता पर आंसू बहाने के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष नहीं रहता।
बढ़ती हुई उम्र के साथ व्यक्ति की प्रवृतियां, परिस्थितियां, आदतें और आपसी संबंध बदलते जाते हैं। अपने ही लोगों के व्यवहार में आए अनपेक्षित बदलाव के साथ वृद्ध जन अक्सर सामन्जस्य स्थापित नहीं कर पाते। कई बार व्यक्ति को वृद्धावस्था में अपने जीवन-साथी के बिछोह का दर्द सहना पड़ता है। वक्त के साथ संगी-साथी, सगे-संबंधी, रिश्तेदार आदि पीछे छूटने लगते हैं। ‘पीढ़ियों का अंतराल‘ बूढ़े लोगों को वैचारिक तथा सम्बन्धों के स्तर पर अपने ही परिवार के सदस्यों से अलग कर देता है। तो उसे यह जीवन, जगत बिल्कुल बेमानी लगने लगता है। युवा उनके तथाकथित दकियानूसी व पुराने तौर तरीकों से सहमत नहीं हो पाते हैं। आधुनिक जीवन मूल्यों के दौर में जब व्यक्ति स्वयं को कतई अप्रासंगिक पाता है। ऐसे वक्त वृद्ध जन इस तेज रफ्तार से भागती दुनिया में खुद को बेहद अकेला महसूस करते हैं।
अकेलेपन का यह मनहूस अहसास उनके समूचे व्यक्तित्व में शून्य की तरह व्याप्त हो जाता है। जीवन भर सक्रिय रहे आदमी के लिए यह अकेलापन कितना यंत्रणापूर्ण और पीड़ादायक हो सकता है, इसे तो कोई भुक्त भोगी ही जान सकता है।
आमतौर पर भारतीय समाज के व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही अपनी सम्पत्ति का बटवारा कर देना पसंद करता है। अपनी जीवन भर की कमाई अपने बेटों में बांटकर वस्तुतः आदमी निहत्था हो जाता है। अपना आर्थिक आधार खोकर वृद्धावस्था में उपेक्षित हो जाने वाले वृद्ध जनों के बहुत-से उदाहरण मिल जाएंगें। आर्थिक पराधीनता भी बुढ़ापे की एक मुख्य समस्या है।
बुढ़ापे की समस्याओं के विरूद्ध संघर्ष में हमें सबसे पहले एक बाद याद रखनी होगी। व्यक्ति को यथासंभव मानसिक बुढ़ापे को रोकने के गुर सीखने होेगे, आत्म संयम और आत्मचिंतन से आप बुढ़ापे को कुछ सालों तक तो दूर धकेल ही सकते हैं। खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए जरूरी है कि जमाने की रफ्तार के साथ चलने की कोशिश कीजिए, पुराने विचारों से चिपके रहकर आप उपेक्षा के सिवा और कुछ नहीं पा सकते।
बूढ़े लोगों को समाज का गैर जरूरी हिस्सा नहीं समझा जाए, इसके लिए पहल उन्ही को करनी होगी। बदलते तौर-तरीकों और आधुनिक विचारों को उन्हें सहजता से लेने की मानसिकता बनानी चाहिए। घर की छोटी-मोटी जिम्मेदारी में हिस्सा बंटाना, खुद को परिवार का ही एक अंग समझना जैसी बातें वृद्धों का अपना के करीब लाने में सहायक होगी।
युवा-पीढ़ी का भी दायित्व है कि वह अपने प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों की महŸाा समझे। वृद्धावस्था कोई बिल्कुल निकम्मी अवस्था नहीं है। उनके पास अनुभवों को एक विशाल खजाना है, जो हमेशा ही उनकी शारीरिक अक्षमताओं की क्षतिपूर्ति करता है। वृद्ध आपसे केवल आदर व अपनत्व चाहते हैं, जो उनका हक भी है।
वृद्धों के अकेलेपन, उपेक्षा, अपमान और निरर्थकता-बोध को कम करने के लिए उन्हें समुचित सुरक्षा पर्यावरण उपलब्ध कराना न केवल सरकार की बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। उनके लिए संस्थाएं, मनोरंजन गृह आदि की स्थापना कर इनमें उनकी ऊर्जा का सार्थक इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस समय देश में करीब डेढ़ सौ स्वैच्छिक संस्थाएं कार्यरत हैं, जो निराश्रित बूढ़ो की देखभाल व इलाज आदि मानवीय कार्यो में संलग्न हैं। इनमें मद्रास की फे्रन्डस-इन नीड सोसायटी, लिटिल सिस्टर्स आफ द पुअर (कलकत्ता) और ‘हैल्पेज इंडिया‘ आदि प्रमुख हैं। सातवी पंचवर्षीय योजना में वृद्धों के कल्याण के लिए स्थापित कार्यदल ने सरकार से वृद्धावस्था पर अलग से राष्ट्रीय नीति बनाने की सिफारिश की थी। उसके अनुसार ग्रामीण व शहरी वृद्ध लोगों की अलग-अलग आवश्यकता को देखते हुए उनकी समस्या पर एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण होना आवश्यक है। सरकार को भी वरिष्ठ जनों के प्रति अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वाह करना चाहिए।
दरअसल बुढ़ापा जीवन की शाम है, दिन-भर की जी-तोड़ मेहनत के बाद एक शांति व विश्राम भरी शाम हमारे बुर्जुगों का अधिकार है।े वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है कि वह उन्हें एक तनाव रहित, आरामदेह और सार्थक शाम मुहैया कराए।
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 कैलाश जैन
एडवोकेट
34, बंदा रोड़ भवानीमण्डी (राज0)