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विनोबा भावे की जीवनी | essay on vinoba bahve in hindi

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गांधीवादी परम्परा के सच्चे, सतत और यथार्थवादी प्रहरी के रूप में विनोबा भावे एक अत्यंत प्रामाणिक नाम है। खादी, ग्रामाद्योग, नई तालीम, अस्पृश्यता-निवारण जैसे रचनात्मक कार्यो की गांधीवादी श्रृंखला को विनोबा भावे ने न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि ‘भूदान-यज्ञ‘ जैसे अभिनव प्रयोग के माध्यम से उन्होंने लाखों भूमिहीनों को भूमि दिलवाई।

आज से पांच दशक वर्ष पूर्व आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था – ‘ आज संसार के सभी प्रभावशाली व्यक्ति सतताधीश हैं। आइजन हावर, ख्रश्चेव, नेहरू, नासिर, टीटो आदि का अपना व्यक्तित्व नहीं, वरन सत्ता के कारण ही उनका प्रभाव है, किन्तु समाज-निर्माण की सतत प्रक्रिया में सत्ताधीश नहीं, बल्कि सत्ता निरपेक्ष तटस्थ व्यक्ति ही सहायक होते हैं। माक्र्स, टालस्टाय, गांधी, रवीन्द्रनाथ आदि ने समाज और संसार को जो स्वरूप दिया, वही शाश्वत रहेगा। सत्ता द्वारा परदतत्व स्वरूप नित्य परिवर्तनशील रहता है। आज के युग में विनोबा भावे एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जो सत्ता-निरपेक्ष होते हुए भी अपना प्रभाव रखते हैं तथा समाज-निर्माण की प्रक्रिया से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। आज मात्र विनोबा भावे ही इस युग की आशा हैं।’

अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी होने के बावजूद कतई महत्वाकांक्षी नहीं होना विनोबा के चरित्र की एक अनोखी विशेषता थी। अपनी अदम्य लगन, दृढ़ संकल्प-शक्ति तथा समर्पण की अटूट भावना से उन्होंने गांधीजी का विश्वास जीत लिया था। गांधीजी का विनोबा के प्रति स्नेह किसी से छुपा नहीं था।

जन्म

महाराष्ट्र के कोलवा जिले के एक छोटे से गांव गागोड़ में 11 सितम्बर 1895 को एक धार्मिक परिवार में विनोबा का जन्म हुआ। बचपन में पिता उन्हें विनायक और माता विनय के नाम से पुकारती थीं। उनका नाम ‘विनोबा’ कैसे पड़ा? इसके बारे में ज्ञात है कि नाम उन्हें महात्मा गांधी द्वारा दिया गया। विनोबा भावे को संस्कारवान व्यक्ति बनाने में उनकी माता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक बार उनकी मां ने कहा -‘विनय, यदि तुम विवाह कर लो तो यह केवल अपने माता-पिता पर उपकार होगा, लेकिन यदि तुम आजीवन अविवाहित रहे तो तुम कई पीढ़ीयों का उद्धार कर सकोगे। विनोबा ने उसी क्षण आजीवन बह्मचर्य-व्रत का संकल्प ले लिया। उन्होंने अपना पूरा जीवन पीड़ित मानवता की सेवा में अर्पित कर दिया।

विद्यार्थी जीवन और शिक्षा

विनोबा अपने विद्यार्थी-जीवन में सदैव एक प्रतिभाशाली छात्र रहे। स्कूल व काॅलेज की समस्त परीक्षाएं उन्होने हमेशा उच्चतम अंकों के साथ उत्तीर्ण की। भावुक विनोबा ने एक दिन शिक्षा-प्रणाली की निस्सारता का अनुभव करते हुए अपनी समस्त डिग्रियां अपनी मां के सामने अग्नि के हवाले कर दी और सत्य की खोज में हिमालय की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लिया।

विनोबा का गांधी जी से परिचय

हिमालय की कन्दाराओं में जाने से पूर्व विनोबा बनारस गए। यह सन् 1916 की घटना है। वहां संयोग से बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी में वायसराय की अध्यक्षता में हो रहे सम्मेलन में महात्मा गांधी भी पधारे थे। वहां गांधीजी ने अपने अत्यंत मार्मिक उद्बोधन में देश के अमीर-सम्पन्न वर्ग से निर्धन वर्ग के लिए काम करने की अपील की। गांधीजी के इस उद्बोधन ने युवा विनोबा के मन-मस्तिष्क को झकझोर डाला। उन्होंने तुरंत साबरमति आश्रम जाने और देश के सामाजिक, आर्थिक कल्याण व मानवता की सेवा में अपने जीवन को समर्पित करने का निर्णय ले लिया।

पहले सत्याग्रही के रूप में गांधीजी द्वारा विनोबा

विनोबा ने मेहनत मजदूरी करके अपने जीवन निर्वाह करने के साथ गांधीजी के मार्ग दर्शन में समाजसेवा का बीड़ा उठाया। इस बीच उन्होंने अर्थशास्त्र, राजनीति, आदि विषयों का गहन अध्ययन किया। जिज्ञासु प्रवृति के विनोबा ने देश-विदेश की अनेकों भाषाओं का भी अध्ययन किया। गांधीजी ने अपने इस निष्ठावान शिष्य में अपार क्षमताएं देखीं तथा उनकी प्रतिभा को रचनात्मक मार्ग-दर्शन दिया। सन् 1940 में वैयक्तिक सत्याग्रह के पहले सत्याग्रही के रूप में गांधीजी द्वारा विनोबा का चयन उनके अटूट विश्वास को रेखांकित करता है। गांधीजी ने अपने पत्र ‘हरिजन’ में लिखकर विनोबा को सविनय अवज्ञा आंदोलन का पहला सत्याग्रही घोषित किया। इस क्रम में दूसरा स्थान पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्राप्त हुआ।

विनोबा जी का कारावास

सन् 1942 में अंग्रेज सरकार के खिलाफ शुरू हुए ‘भारत छोड़ो आंदोलन‘ में भाग लेने पर विनोबा को तीन वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई, जब आजादी के बाद गांधीजी नहीं रहे तो युग की मांग विनोबा को एकान्त साधना से लोगों के बीच खींच लाई। उन्होंने विभाजन के दंगों में विस्थापित हुए लोगो के लिए जी-जान से काम किया।

विनोबा का ‘भूदान आंदोलन’

विनोबा जी के कार्यों के मूल्यांकन के लिए ‘भूदान आंदोलन‘ का उल्लेख अत्यंत आवश्यक है। सन् 1951 में तेलंगाना (आंध्र प्रदेश) के एक गांव पोचम पल्ली में हरिजनों ने विनोबा जी से कहा कि उनके पास कोई जमीन नहीं, कोई धंधा नहीं है अतः वह उन्हें जमीन दिलाएं ताकि वह खेती कर अपना पेट पाल सकें।

विनोबा ने रामचन्द्र रेड्डी नामक एक जमींदार से उन्हें भूमिदान देने की अपील की, जिसे स्वीकार कर उसने 100 एकड़ जमीन दान कर दी। विनोबा ने यह भूमि तुरंत भूमिहीन हरिजनों में वितरित कर दी और इस प्रकार विश्व में अपने ढंग के अकेले भू-दान आंदोलन की शुरूआत हुई। भू-दान आंदोलन के सम्बन्ध में आचार्य विनोबा भावे का कहना था कि मेरी श्रद्धा थी कि जिस प्रकार ईश्वर ने बच्चे के पेट में भूख का निर्माण किया है उसी प्रकार माता के पास दूध के कलश का भी प्रबन्ध किया है। यह तथ्य मुझे लोगों से भूमि मांगने की पे्ररणा देता है। मै समझता हूं कि हवा, पानी, आकाश और प्रकाश की तरह जमीन भी सबको मिलनी चाहिए।

विनोबा ने निरन्तर तेरह वर्षो तक पूरे देश में पैदल यात्राएं की और झोली फैलाकर भूपतियों से भूमि दान में प्राप्त कर भूमिहीनों को बांटी। अपनी पद यात्राओं के दौरान उन्होंने बैंगलौर में विश्व नीड़ आश्रम, पठानकोट में प्रस्थान आश्रम, बोध गया में समन्वय आश्रम, असम में मैत्री आश्रम, पवनार में ब्रह्म विद्या मंदिर तथा इंदौर में विश्वार्जन आश्रम की स्थापना की। कालान्तर में भू-दान आंदोलन से ग्राम-दान, सम्पतिदान, जीवन-दान आदि रचनात्मक सामाजिक आंदोलन भी विनोबा के नेतृत्व में चले और वह देश के कोने-कोने में अहिंसक सामाजिक क्रांति का अलख जगाते रहे।

सार

आचार्य विनोबा भावे न केवल संत परम्परा के दिव्य पुरूष थे बल्कि वह प्रकांड विद्वान, संस्कृति और संस्कृत के सजग प्रहरी, उच्च कोटि के भाषा शास्त्री, महान लेखक अनुपम वक्ता, गांधीजी तथा गांधीवाद के प्रमाणिक व्याख्याता, सभी धर्मो का समान रूप से आदर करने वाले धार्मिक पुरूष, समाज-सेवी तथा प्रखर चिंतक व दार्शनिक थे।

आचार्य विनोबा भावे के अनमोल विचार

  • “मनुष्य जितना ज्ञान में घुल गया हो उतना ही कर्म के रंग में रंग जाता है।”
  • “जिस राष्ट्र में चरित्रशीलता नहीं है उसमें कोई योजना काम नहीं कर सकती।”
  • “ऐसे देश को छोड़ देना चाहिए जहाँ न आदर है, न जीविका, न मित्र, न परिवार और न ही ज्ञान की आशा।”
  • “स्वतंत्र वही हो सकता है जो अपना काम अपने आप कर लेता है।”
  • “विचारकों को जो चीज़ आज स्पष्ट दीखती है दुनिया उस पर कल अमल करती है।”
  • “कलियुग में रहना है या सतयुग में यह तुम स्वयं चुनो, तुम्हारा युग तुम्हारे पास है।”
  • मौन और एकान्त, आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं।