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वैद्य का राज

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बहुत पहले केरल में नाम्पी नामक एक मशहूर वैद्य रहा करता था। नाम्पी अंधविश्वासों और रूढ़ियों से मुक्त एक सुलझे हुए विचारों का समझदार वैद्य था। वैद्यक नाम्पी का पुश्तैनी धंधा था।
ईश्वर-भक्त नाम्पी अपने कुल की परंपरा से कुछ भिन्न था। वह रोगियों की सेवा करना अपना धर्म मानता था। वह पैसा कमाने के लिए वैद्य का धंधा नहीं करता था।
नाम्पी अत्यधिक बुद्धिमान था। चिकित्सा-कार्य में उसने जल्दी ही काफी यश हासिल कर लिया। लोगों को यह भरोसा हो गया कि नाम्पी जिस रोगी को जवाब दे दे, वह किसी भी सूरत में बच नहीं सकता।
एक बार एक खूबसूरत ब्राह्मण युवक कोढ़ का शिकार होकर नाम्पी के पास आया। नाम्पी ने उसकी गहन परीक्षा की और बताया कि यदि वह पाईथन सांप (यह सांप विषहीन होता है) का एक लीटर तेल निकाल कर पी ले तो वह रोगमुक्त हो सकता है। इसके सिवाय इस रोग का कोई इलाज नहीं है।
युवक ब्राह्मण था। पाईथन सांप को मारकर उसका तेल निकालने की बात तो सोच भी नहीं सकता था। वह निराश हो घर लौट आया। उसने जीवन की आशा छोड़ दी क्योंकि नाम्पी के बाद किसी और वैद्य के पास जाना व्यर्थ था।
एक दफा उस युवक ने कहीं पढ़ा कि मनुष्य का शरीर रोगों का घर है। गंगा-जल परम औषधि है। वैद्य ईश्वर ही है। उसने सोचा कि अब ईश्वर में ध्यान लगाना ही ठीक होगा। प्रार्थना-उपासना से ईश्वर प्रसन्न हुआ तो वह रोग-मुक्त हो जाएगा।
युवक के गांव के पास ही ‘चमरावत्तम‘ नामक एक पवित्र स्थान था। वहां एक प्रसिद्ध मंदिर था। लोग विश्वास करते थे कि वहां भक्ति-पूर्वक पूजा करने से भंयकर से भंयकर रोग भी दूर हो जाता है। सैंकड़ो लोग मंदिर जाकर पूजा करते, तपस्या का जीवन बिताते और रोग-मुक्त हो जाते थे।
युवक के हृदय में भी आस्था जागी और वह मंदिर जा पहुंचा। वहां वह श्रद्धा और आस्थापूर्वक ईश्वर की आराधना में लग गया।
मंदिर के साथ ही एक नदी बहती थी। नदी का पानी स्वच्छ और आरोग्यवर्द्धक था। युवक उसमें नित्य स्नान करता और उसके किनारे बैठकर ध्यान करता। कभी-कभी नदी के किनारे ही रात को विश्राम करता। मंदिर में न जाता।
आधी रात बीत चुकी थी। नदी के नीले स्वच्छ जल में चांद तैरता नजर आता था। पर युवक का ध्यान इस प्राकृतिक सौंदर्य की ओर न था। वह परम पिता के ध्यान में मग्न था। सहसा उस लगा, मानो कोई कह रहा हो – ‘युवक डरो नहीं, तुम रोग-मुक्त हो जाओगे। चालीस दिन तक प्रतिदिन तीन अंजलि भरकर नदी का पानी पियो। तपस्या जारी रखो।‘
इस आवाज ने युवक के मन में निराशा मिटा दी। जीवन की नई आशा उत्पन्न हुई। उसने चालीस दिन का व्रत ले लिया। पूरी श्रद्धा के साथ उसने व्रत का पालन किया। उसने देखा, धीरे-धीरे उसका रोग कम हो रहा है। वह प्रतिदिन मंदिर में जाता और शिवजी के चरणों में मस्तक नमाता! परमात्मा के प्रति उसकी भक्ति दृढ़ हो गई। चालीस दिन तक वह प्रतिदिन नदी में स्नान कर नदी का पानी पीता रहा। चालीस दिन बाद उसने देखा कि उसका कोढ़ जाता रहा है। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। इस आनंद में भी वह नाम्पी को अपने स्वस्थ होने की सूचना देना न भूला।
युवक नाम्पी के पास पहुंचा। उसको रोग-मुक्त देखकर नाम्पी को बहुत हर्ष हुआ, किंतु आश्चर्य भी कम न हुआ। युवक को उसने अच्छे होने पर बधाई दी। फिर उसने पूछा कि उसने क्या और किसका इलाज करवाया है? युवक ने सविस्तार उसे सारी बात बताई।
नाम्पी को बड़ी जिज्ञासा हुई। वह उस युवक को साथ लेकर ‘चमरावत्तम’ मंदिर पहुंचा। वह मंदिर देखा जहां बैठकर युवक ध्यान लगाता, वह स्थान देखा। जिस जगह नदी का पानी पीता, वह जगह भी देखी। नाम्पी उस स्थान से नदी के किनारे-किनारे ऊपर तक गया। लगभग आधा मील चलने के बाद उसने देखा कि एक विशालकाय पाईथन सांप मरा पड़ा है। उसका आधा शरीर पानी में है। सांप का शरीर विकृत हो गया था। नाम्पी समझ गया कि ब्राह्मण युवक ने इसी सांप का तेल नदी के पानी के साथ पिया है। वह वास्तव में उस सांप का तेल पीकर ही स्वस्थ हुआ था। उसकी बताई दवा ही सही निकली। नाम्पी ने ब्राह्मण युवक को मरा सांप दिखाया। उसके शरीर से निकला तेल पानी में मिलकर जाता हुआ दिखाया। फिर कहा – ‘ तुम अच्छे हुए हो, पाईथन सांप का तेल पीकर ही। इन 40 दिनों में तुमने एक लीटर से ज्यादा तेल पिया है। ‘ ब्राह्मण युवक यह देख-सुन अवाक् रह गया।