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सफरनामा प्लास्टिक

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आज हम प्लास्टिक विहीन संसार की कल्पना तक नहीं कर सकते। प्लास्टिक का नाम लेते ही आंखो के आगे एक स्वप्निल संसार तैर-सा जाता है, जिसमें आकर्षक लुभावने रंगों की हल्की-फुल्की पर बेहद मजबूत सैंकड़ो वस्तुएं नजर आने लगती हैं। अब तो दैनिक उपयोग की किसी ऐसी वस्तु का नाम याद करने में देर लगती है, जिसमें प्लास्टिक का उपयोग नहीं हुआ हो। खिलौनों बर्तन, बाल्टियों से लेकर कुर्सियों, परदे और खेल सामान तक तथा दिल के नकली वाल्व, नकली हड्डियों से लेकर अंतरिक्ष यात्रियों के सूट तक, हर जगह प्लास्टिक का एक-छत्र साम्राज्य छाया हुआ है। दरअसल इक्कीसवीं सदी को ‘प्लास्टिक सदी‘ कहना अधिक उपयुक्त होगा। अब तो शुद्ध प्लास्टिक के मकानों के निर्माण की बात चली रही है। इस तरह मानव सम्भ्यता का इतिहास पाषाण-युग से होता हुआ प्लास्टिक युग तक आ पहुंचा है।
प्लास्टिक की खोज उन्नीसवी शताब्दी के सातवें दशक में अमेरिका में हुई। दरअसल उन दिनों बिलियार्ड अमेरिका का सबसे लोकप्रिय खेल हुआ करता था। उसकी गेंद हाथी-दांत से बनाई जाती थी। अचानक हाथी-दांत का अभाव हो जाने के कारण अमेरिकी उत्पादकों ने हाथी दांत का विकल्प खोजने वाले को दस हजार डालर का इनाम देने की घोषणा की। इस बड़ी इनामी राशि के प्रलोभन में एक वैज्ञानिक जाॅन वैंसली व्हाट ने विभिन्न पदार्थो और रसायनों के मिश्रण कर प्रयोग किए। एक बार सन् 1869 में व्हाट ने इन प्रयोगों के दौरान ‘सैलुलाइड‘ नामक पदार्थ की खोज कर डाली। यही विश्व का पहला व्यावसायिक प्लास्टिक था। ‘सेलुलाईड‘ बिलियार्ड की गेंदांे के लिए तो उपयोगी सिद्ध नहीं हो सका किन्तु इसका उपयोग कंघों खिलौनों, फोटो-प्लेटों आदि उत्पादनों में होने लगा। सेलुलाइड की मुख्य खामी इसका ज्वलनशील होना तथा शीघ्र न ढल पाना थी।
इसके पश्चात डेढ़ वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद 6 फरवरी 1909 के दिन बेल्जियम निवासी डाक्टर लियो हेनरिक बैकलैंड ने ‘बेकलाईट‘ नाम एक नये पदार्थ की खोज की। ‘बैकलाईट‘ का रासायनिक नाम ‘आक्सीबैंजाइल मिथालेंजली कोलेन हाइड्राइड‘ है। यह पदार्थ वास्तव में आधुनिक प्लास्टिक का मूल पूर्वज है। बेकलाइट एक मजबूत, अघुलनीश, अदाह्यय पदार्थ है, जिस पर अम्लो का भी असर नहीं होता। बेकलाइट के आविष्कार के साथ ही संश्लेषित प्लास्टिक उद्योग की शुरूआत हुई। टेलिफोन-यंत्रों, इलेक्ट्रिक इन्सुलेटर्स, बटनों तथा अन्य व्यावसायिक उत्पादो मे इसका प्रयोग होने लगा।
बेकलाइट पहला कृत्रिम ‘पोलिमर‘ है, जो छोटे-छोटे अणुओ को जोड़कर बनाया गया बड़ा अणु या अणुओं का समूह हैं। बैंकलैंड की मान्यता थी कि लगभग चालीस उद्योगों में बेकलाइट का इस्तेमाल हो सकेगा। किन्तु आप तकरीबन प्रत्येक उद्योग में इसका इस्तेमाल हो रहा है।
लगभग दो दशकों तक बेकलाइट के उत्पादन पर बैकलैंड की कम्पनी का एकाधिकार रहा। इसके पश्चात् 1933 तक तीस कम्पनियों ने विभिन्न नामों से इसका उत्पादन करना शुरू कर दिया। आगामी दस वर्षो में सन् 1943 तक बाजार में प्लास्टिक की पांच हजार से अधिक किस्में आ चुकी थीं। आज तो प्लास्टिक-परिवार के सदस्यों की संख्या बहुत बड़ी हो चुकी है क्योंकि विविध मूल पदार्थ उपलब्ध है तथा उन में अनेको संयोजन संभव है।
आज प्लास्टिक परिवार में बैकलाइट के अलावा पालिथीन, नाइलाॅन, टेरिलीन, पोलिस्टरीन, पोलिविनाइल आदि प्रमुख सदस्य शामिल हैं।
मानव सम्यता की कहानी की शुरूआत पत्थर युग से होती है, इसके बाद आता है धातु युग। कांस्य ओर लौह-युग की बातें भी हम इतिहास की किताबों में पढ़ते आए हैं, फिर इस्पात युग आया। अब बढ़ती हुई प्लास्टिक-संस्कृति को देखकर लगता है कि शायद इतिहास की किताबों में लिखा जाएगा कि बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्थ में ‘प्लास्टिक युग‘ की शुरूआत हुई। कार, हवाई जहाज, अंतरिक्ष यान से लेकर कृषि यंत्रो, सिंचाई के पाइपों तक प्लास्टिक, पेन, पपेरवेट से लेकर बिजली के तार और स्विच तक प्लास्टिक, मग, बाल्टी, जग से लेकर साबुनदानी कंघा, चश्मा, टेलीफोन, टेलीविजन, रेडियो तक प्लास्टिक गर्ज यह कि कहां नही है प्लास्टिक की यह मायावी दुनिया?
प्लास्टिक की इस बेपनाह लोकप्रियता के कारणों की छानबीन की जाए तो बात साफ हो जाती है। दरअसल यह एक अत्यन्त सस्ता और मजबूत पदार्थ है। इसे कई रंग-रूपांे में आसानी से ढाला जा सकता है। रंगीन और टिकाऊ होने के साथ इसकी दूसरी खासियत है टूट-फूट जाने पर यह दुबारा आसानी से बिक सकता है।
देश की उपभोक्ता संस्कृति में प्लास्टिक गहरे तक अपनी जड़ें जमा चुका है भारत का प्लास्टिक उद्योग आज दुनिया के किसी भी देश की तुलना में उन्नीस नहीं है। चार हजार से ज्यादा इकाइयां एक-से-एक बेहतरीन प्लास्टिक सामग्री के उत्पादन में जुटी हैं। छोटे और घरेलू उद्योग के रूप में 6 हजार से अधिक इकाइयां कार्यरत हैं, प्लास्टिक उद्योग 7 से 8 लाख लोगो को रोजगार मुहैया कराता है। इस उद्योग की वर्तमान विकास दर 20 प्रतिशत वार्षिक है। पांच लाख टन से भी अधिक कच्चे माल की खपत प्रतिवर्ष भारतीय प्लास्टिक उद्योग की है। उत्पादन का साठ प्रतिशत भाग निर्यात किया जाता है और इस प्रकार 75 करोड़ रूपये मूल्य से अधिक की विदेशी मुद्रा की प्राप्ति में प्लास्टिक उद्योग महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है। भारतीय प्लास्टिक उद्योग के उत्पादनो का निर्यात जापान, फ्रांस, अमेरिका, सीरिया, इराक, जार्डन, कुवैत आदि देशो को किया जाता है। जहां तक घरेलू खपत का प्रश्न है, वह 9 लाख टन है। इस उद्योग में बिजली और इधन की खपत अपेक्षाकृत बहुत कम होती है। इसकी तुलना में इस्पात उद्योग में तीन गुना अधिक, और एल्यूमिनियम उद्योग में सात गुना अधिक बिजली की खपत होती है। यह तथ्य भी प्लास्टिक उद्योग की दिन-दूनी रात चैगुनी वृद्धि में सहायक है। भारतीय प्लास्टिक उद्योग को इथाइल, अल्कोहल, बेनजीन जैसा कच्चा माल आयात करना पड़ता है। यही एक मात्र समस्या इस उद्योग के साथ है। भारत जैसे विकासशील देश में प्लास्टिक उद्योग की प्रगति का विशेष महत्व है। इस ओर पर्याप्त घ्यान दिया जाना चाहिए।
आगामी वर्षो में प्लास्टिक का उपयोग और अधिक बढ़ने की संभावनाएं है क्योंकि एक तरफ स्टील मंहगा होने के कारण आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है, तथा दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण के कारण लकड़ी की उपलब्धि भी सरल नही रही है। इसके अतिरिक्त संयुक्त परिवारों का विघटन, छोटे परिवारों का चलन महानगरीय संस्कृति तथा तेज रफ्तार जिन्दगी जैसे तत्व प्लास्टिक के उपयोग को अपरिहार्य बनाते है।