images 1 1

सबसे बड़ा आलसी

images 1

बहुत दिन हुए, जापान में चियांग चिंग नामक एक राजा राज्य करता था, राजा कुछ सनकी था, सो वह अपने राज्य में अक्सर कुछ अजीब प्रतियोगिताएं करवाया करता था। ऐसे ही एक बार उसने पूरे राज्य में आलसियों की प्रतियोगिता करवाने की घोषणा की। घोषणा में कहा गया कि इस प्रतियोगिता में जो आलसी सबसे अव्वल दर्जे का आलसी साबित होगा, उसे एक हजार सोने की मोहरें तथा राज्य की ओर से ‘आलस्य सम्राट‘ की उपाधि से सम्मानित किया जाएगा।
राजा की यह घोषणा सुनते ही राज्य की राजधानी में देश के कोने-कोने से बड़ी तादाद में आलसी आना शुरू हो गये। नतीजा यह हुआ कि देश भर के निठल्ले और बेकार लोगों से नगर भर गया। शहर में नागरिकों का रहना दूभर हो गया।
प्रतियोगिता वाले दिन बड़े सवेरे ही सभी आलसियों को राजा ने आज्ञा दी कि वे नगर के बाहर खुले मैदान में लेट जाएं। सभी आलसियों ने राजा की आज्ञा का पालन किया और मैदान में जाकर लेट गये। गर्मियों के दिन थे। सूरज के चढ़ने के साथ-साथ ही गर्मी बढ़ने लगी। जो लोग आलसी होने का स्वांग कर रहे थे, वह गर्मी के बढ़ने के साथ-साथ उठकर भागने लगे। दोपहर तक एक चैथाई लोग मैदान में रह गये। नगर के लोग उनकी हिम्मत की दाद दे रहे थे।
दूसरे दिन राजा ने बचे हुए उन चैथाई आलसियों आदेश दिया कि वह कूड़े के ढेर जाकर सो जाएं। सभी बड़े आराम से कूड़े के ढेर पर लेट गए। मक्खियां उनके शरीर पर भिनभिना रही थीं। लेकिन क्या मजाल कि उनका हाथ उन्हें, उड़ाने के लिए तनिक भी हिल जाए। जिस आलसी का हाथ मक्खियां उड़ाने के लिए हिल जाता तो उसे तत्काल उठा कर भगा दिया जाता। इस तरह उनमें से आधे आलसी उठाकर भगा दिये गये। तीसरे दिन बचे हुए आलसियों को एक बड़े हाॅल में लिटा दिया गया। अब राजा ने सैंकड़ो विषहीन सांप उस कमरे में छुड़वा दिए। आलसियों में इससे खलबली मच गयी और वे उठकर भागने लगे। इस बार केवल दस आलसी लेटे रहे।
अगले दिन राजा ने इन दसों आलसियों को महल के एक कमरे में सुलवा दिया। राजा का विचाार था कि इनमें से जो सबसे बाद में जागेगा, उसे ‘आलस्य सम्राट‘ घोषित कर एक हजार स्वर्ण मुद्राएं भेंट कर दी जाएंगी, लेकिन कोई भी आलसी दूसरे दिन शाम तक भी नहीं जगा ओर न ही किसी के जगने के आसार दिखाई दिए। तब राजा ने उनकी अगल-बगल में पैने कांटे बिछवा दिए ताकि करवट बदलने पर कांटे चुभने से जाग जाएं। लेकिन उनमें से किसी भी आलसी ने करवट तक नहीं बदली।
राजा ने यह सोचकर कि ये लोग कई दिनों से भूखे हैं, उनके आसपास मिठाईयों के थाल रखवा दिये। राजा ख्याल था कि भूख से परेशान होकर वे मिठाई खाने लगेंगे और इन्हें निकालकर बाहर कर दिया जाएगा। लेकिन किसी ने मिठाई को छुआ तक नहीं।
अंत में, राजा को एक कारगर उपाय सूझा। उसने कमरे में फूस और लकड़ियां भरवाकर आग लगवा दी। आग की गर्मी नहीं सह पाने से आलसी तत्काल उठ खड़े हुए ओर अपने को अधिक झुलसने से बचाने के लिए उठकर भागने लगे।
लेकिन भागकर बाहर आने वालों की संख्या नौ थी। अभी भी एक भीतर ही था। राजा ने पहले से तैयार सैनिकों को फौरन आग बुझाने की आज्ञा दी। तब राजा खुद उस एक मात्र बचे आलसी के पास गया और सिपाहियों की मदद से उठाकर गले लगा लिया। वह कुछ-कुछ जल गया था। फौरन मरहम पट्टी की गयी।
इसके बाद राजा ने एक भव्य सम्मान-समारोह में उसे बड़े आदर से एक हजार स्वर्ण मुद्राएं व ‘आलस्य-सम्राट‘ की उपाधि प्रदान की।