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मंदिर

( temple )

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एक था राजा। एक दिन ढिंढोरा पिटवाकर उसने नगर के बढ़इयों के दस सुपुत्रों को दरबार में बुलवाया।
दरबार में राजा ने कहा ‘‘देखो बच्चों, तुम होनहार कलाकार हो। मैं तुम्हारी कारीगरी का कमाल देखना चाहता हूं। तुममें से हर एक को कल शाम तक एक सुंदर और छोटा-सा लकड़ी का मंदिर बनाकर मेरे सामने प्रस्तुत करना होगा। सबसे अच्छा मंदिर बनाने वाले को आकर्षक उपहार दिया जाएगा।‘‘
आज्ञा सुनकर वे दसों सुपुत्र अपने-अपने घर लौट गए। दूसरे दिन शाम को राजा के सामने दरबार में सिर्फ नौ छोटे-छोटे लकड़ी के मंदिर पेश किए गए। बढ़ईयों के नौ ही सुपुत्र दरबार में मौजूद थे। अंतिम क्षणों में दसवां सुपुत्र भी आया, लेकिन खाली हाथ! सब बच्चे उसकी मजाक बनाने लगे।
राजा ने सबको शांत रहने की आज्ञा दी और फिर दसवें को आगे आने को कहा। वह निर्भीक होकर राजा के सामने आकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर आत्म-विश्वास की चमक थी और वह अपनी मजाक से जरा भी परेशान न हुआ था।
‘‘बेटा, तुम मंदिर क्यों नहीं लाए?‘‘ राजा ने बड़ी विनम्रता और आत्मीयता भरे स्वर में पूछा।
‘‘माफ करें महाराज, कल यहां से विदा होने के बाद दोपहर को औजार निकालकर काम करना शुरू करना प्रारंभ किया ही था कि इतने में मेरे घर के सामने से जाने वाला एक बूढ़ा राहगीर चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ा। बेचारा बूढ़ा बेहद कमजोर व बीमार था। मैंने दौड़कर उसे सहारा दिया। उसके मुंह पर पानी छिड़का। उसने आंखे खोली। उसके पैरों में शक्ति नहीं थी। मैंने उसे सहारा देकर अपने घर के भीतर ले लिया। मैंने उसकी सेवा की। वह चाहता था कि कोई उसके सिरहाने बैठा रहे। मैंने उसकी इच्छा पूरी की। अभी कुछ समय पहले वह बूढ़ा अपने घर चला गया, तब कहीं जाकर मैं यहां उपस्थित हो पाया हूं।‘‘
राजा कुछ नहीं बोला। उसने नौ मंदिरों का निरीक्षण किया।

फिर कहा ‘‘ तुम सबके मंदिर बहुत सुंदर हैं। अब मैं कुछ सवाल पूछता हूं। तुम उत्तर दो और स्वयं निर्णय करो। ‘‘
राजा ने हरेक से सवाल किया ‘‘ क्या तुम्हारे घर के सामने कोई वृद्ध आया था? ‘‘
इस प्रश्न के जवाब में सबने हां भरी। वास्तव में उन सबके घरों के सामने भी बूढ़ा आया था। चक्कर खाकर गिरा भी था। किंतु सही समय पर मंदिर बनाकर उपहार प्राप्त करने के लालच में किसी ने इस घटना की ओर ध्यान न दिया था।
राजा ने उन मंदिरों का पुनः निरीक्षण कर बच्चों की ओर देखकर कहा – ‘‘बच्चों, मंदिर किस चीज को कहते हैं?‘‘
‘‘ जहां भगवान निवास करते हैं।‘‘ सभी का एक ही जवाब था।
राजा ने मुस्कराते हुए कहा ‘‘ ठीक है, भगवान हम सबके मन में रहता है। सच है न? तो हम मन को क्या कहेंगे?‘‘
‘‘मंदिर।‘‘ समवेत स्वर में सभी ने कहा।
‘‘अब तुम ही बताओ बच्चों, सर्वोतम मंदिर कौन लाया है?‘‘ राजा का सवाल था।
सभी बच्चों ने जवाब दिया – ‘‘ महाराज, हमारी भूल है। हमने तो लकड़ी के मंदिर बनाकर प्रस्तुत किए हैं। किंतु इसने मन के मंदिर को सजाया-संवारा है। उपहार इसे ही मिलना चाहिए।‘‘
प्रसन्न मन से राजा ने दसवें लडके को बुलाकर खूबसूरत व कीमती उपहार दिया तथा बधाई देते हुए कहा – ‘‘बेटा, वृद्ध आदमी का वेश बनाकर मैं स्वयं सभी के घरों के सामने गुजरा व चक्कर खाकर गिरा था। लकड़ी के मंदिर कलात्मक तो होते हैं, किंतु सबसे पहले मन के मंदिर को संवारना चाहिए। तुमने लकड़ी का मंदिर नहीं बनाया किंतु लालच से दूर रहकर बूढ़े को सहारा दिया। अतः उपहार पर तुम्हारा ही हक है। इन बच्चों का भी यही निर्णय है।‘‘
दसवें बच्चें ने सभी को प्रमाण किया।