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बहुमुखी प्रतिभा के धनी : डॉ राधाकृष्णन

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बहुमुखी प्रतिभा के धनी: डा0 राधाकृष्ण भारतीय संस्कृति तथा प्राचीन धर्म-ग्रंथों में ‘गुरू महिमा‘ का बखान पर्याप्त मात्रा में मिलता है। राजा-महाराजा अपनी संपूर्ण शासन-व्यवस्था के संचालन में अपने गुरूजनों के दिशा-निर्देश व प्रेरणा को अत्यधिक महत्व देते थे। भारत के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली डा0 राधाकृष्णन् भी एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने केवल शिक्षक परंपरा को अपने चरमोत्कर्ष तक बढ़ाया। वास्तव में डा0 राधाकृष्णन् केवल शिक्षक नहीं थे, बल्कि वह सर्वतोन्मुखी प्रतिभा से सम्पन्न एक अत्यंत विराट व्यक्तित्व के स्वामी थे। महान दार्शनिक, श्रेष्ठ तत्व चिंतक, निपुण शिक्षा शास्त्री, आदर्श शिक्षक एवं विलक्षण प्रज्ञावान डाक्टर राधाकृष्णन् विश्व के उन महान लोगों की श्रेणी में थे, जो शिक्षक होते हुए राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए। ऐसे व्यक्तियों में अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, चेकोस्लोवाकिया के राष्ट्रपति जान मेसरिक, आयरलैंड के राष्ट्रपति डा0 वेलरा आदि थे, जो पेशे से शिक्षक थे।
इस महान दार्शनिक एवं शिक्षा शास्त्री का जन्म 5 सितम्बर 1888 को तात्कालीन मद्रास प्रांत के चित्तूर जिले में तिरूतनि नाम के देहात में हुआ। इनके पिता सर्वपल्ली वंश के धार्मिक प्रवृति के एक निर्धन आंध्र ब्राह्मण थे। इनके पिता को आर्थिक स्थिति भले ही साधारण थी किंतु उनकी धर्म के प्रति आस्था वास्तव में असाधारण थी। इसी कारण राधाकृष्णन् को धार्मिक संस्कार बाल्यकाल से प्राप्त हुए।
बालक राधाकृष्णन् के जीवन के प्रारंभिक बारह वर्ष तिरूŸानि तथा तिरूपति जैसे धार्मिक महत्व के स्थानों पर व्यतीत हुए। उनकी प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर की शिक्षा तिरूपति के लथुरन मिशन हाई स्कूल में सम्पन्न हुई। इसके पश्चात राधाकष्णन् ने वेल्लोर के बूरहीज कालेज तथा मद्रास के क्रिश्चियन कालेज में उच्च शिक्षा प्राप्त की। विद्यार्थी – जीवन में उनकी कुशाग्र बुद्धि का लोहा सभी मानते थे।
डा0 राधाकृष्णन् की अधिकांश शिक्षा ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित स्कूल-कालेज में हुई, जहां आमतौर पर हिंदू-धर्म को रूढ़िवादी होने से आरोपित किया जाता था। हिंदू धर्म में अगाध श्रृद्धा रखने वाले राधाकृष्णन् ने एम. ए. की परीक्षा में अपना शोध-प्रबंध (थीसिस) ‘दी एथिक्स आफ वेदांत‘ विषय पर लिखी। इस विस्तृत निबंध में उन्होंने हिंदू धर्म और वेदांत की विशद व्याख्या बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत की। इस शोध-प्रबंध को पढ़कर प्रोफेसर हांग ने कहा था – ‘इसमें दर्शन शास्त्र के न केवल मुख्य सिद्धांतों का विवेचन किया गया है, बल्कि उसे आत्मसात भी कर लिया गया है। जटिल व गंभीर मुद्दों को सहज ढंग से अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता और अंग्रेजी भाषा में अधिकारपूर्ण प्रवाह से अपनी बात कहने में यह प्रंबध आशातीत सफलता प्राप्त कर सका है।‘
इस प्रकार डा0 राधाकृष्णन् अपनी प्रथम रचना ही से लेखन के क्षेत्र में पहचाने जाने लगे। अप्रेल, 1909 में मद्रास के प्रेसीडेसी कालेज में दर्शन शास्त्र के व्याख्याता के रूप में नियुक्त हुए। फिर 1916 से 1921 तक मैसूर विश्व विद्यालय में तथा 1921 से 1931 तक कलाकार विश्वविद्यालय में किंग जार्ज प्रोफेसर रहे। इसी बीच वह दो बार विदेश यात्राओं पर भी गए। पहली बार मेनचेस्टर कालेज आक्सफोर्ड के निमंत्रण पर तुलनात्मक धर्म के अप्टन लेक्चरर के रूप में तथा दूसरी बार हिबर्ट लेक्चरार के रूप में। सन् 1931 से 1935 तक वह आंध्र विश्व विद्यालय, वाल्टेयर (आंध्रप्रदेश) के उपकुलपति रहे। सन 1936 में उनकी नियुक्ति पुनः आक्सफोर्ड में स्पाल्डिंग प्रोफेसर आफ ईस्टन रिलिजन्स एंड एथिक्स के रूप में हुइ तथा वह 1952 तक इस पद पर रहे। 1939 में 1948 तक वह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे। 1946 से 1950 तक उन्होंने यूनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया। 1948 में उन्हें उच्च शिक्षा तथा देश के विश्वविद्यालयों की गतिविधियों की जांच हेतु नियुक्त आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। सन् 1949 में डा0 राधाकृष्णन् सोवियत रूस में भारतीय राजदूत के रूप में नियुक्त किए गए तथा सन् 1952 तक उन्होनें इस पद पर कुशलतापूर्वक कार्य किया।
सन् 1952 में वह भारत के उपराष्ट्रपति चुने गये तथा लगातार दो कार्य कालों तक 1962 तक इस पद बने रहे। इस दौरान 1953 में अमेरिका के राष्ट्रपति के विशेष आमंत्रण पर उन्होंने पश्चिमी राष्ट्रों का व्यापक दौरा किया। सन् 1962 से 1967 तक वह भारत के राष्ट्रपति बने रहे और अंततः 24 अप्रेल, 1975 को 87 वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हो गया।
उपर्युक्त संक्षिप्त विवरण से डाक्टर राधाकृष्णन् के गतिशील एवं घटनाप्रधान जीवन की एक झलक मिलती है। किंतु यह घटना चक्र ही उनके अत्यंत महत्वपूर्ण एवं सार्वजनिक तथा बहुमुखी व्यक्तित्व की एकमात्र पहचान नहीं है। उन्हें कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सम्मान हासिल हुए। ‘भारत रत्न‘, मास्टर आॅफ विज्डम, ‘पूरला फेरिते‘ ‘गोएटे प्लाकेटे‘ (जर्मनी) तथा इंग्लैण्ड की सम्राज्ञी द्वारा प्रदान ‘आर्डर आफ मेरिट‘ उनमें प्रमुख हैं।
डा0 राधाकृष्णन् एक उच्च कोटि के लेखक भी थे। दर्शन शास्त्र तथा हिंदू धर्म से संबंधित उनके कई लेख ‘इंटरनेशनल जर्नल आफ एथिक्स‘, ‘हिब्बर्ट जर्नल‘ आदि सुविख्यात अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे। ‘मनोविज्ञान के प्रमुख सूत्र’, ‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर का दर्शन‘, ‘कल्कि‘, ‘समकालीन दर्शन में धर्म का शासन‘, ‘जीवन का हिंदू दृष्टिकोण‘ ‘भगवद गीता का अनुवाद‘, ‘ब्रह्मसूत्र‘ ‘धर्म और समाज‘ आदि उनकी अत्यंत विद्वतापूर्ण पुस्तकें हैं।
शिक्षा एवं शिक्षक विषय पर उनके विचार अत्यंत स्पष्ट, मौलिक व आदर्शवादी थे। उनके अनुसार -‘शिक्षक वह है, जो स्वयं के और मानव के भविष्य के प्रति विश्वास के साथ समर्पित है। केवल उत्सर्ग की भावना रखने वाले व्यक्ति ही इस देश को महान बना सकते हैं।’ वह अक्सर कहा करते थे कि आत्मा का विकास व मुक्ति ही जीवन का उद्देश्य है। शिक्षक के लक्ष्य और कर्तव्य में अधिकतर नहीं हो सकता। एक वास्तविक शिक्षक होना आवश्यक है।‘
तात्कालीन शिक्षा पद्धति के प्रति रोष प्रकट करते हुए डा0 राधाकृष्णन् ने कहा था – ‘ऐसी शिक्षा मानवता के कटे हुए फूल के समान है, जिसकी जड़ें नहीं होती। यह शिक्षा पद्धति मनुष्य को गुलाम बनाती है।‘
विनोदवृद्धि सभी महान आदमियों का एक सामान्य गुण होता है। राधाकष्णन् भी इसके अपवाद नहीं थे। अपने धीर गंभीर व्यक्तित्व के बावजूद उनके विनोदी स्वभाव का पहलू जब-तब उभर ही आता है। ऐसे असाधारण व्यक्ति ने हमारी संस्कृति और अस्मिता को भारत में और भारत के बाहर नई उंचाईयां प्रदान कीं। पं0 जवाहरलाल नेहरू ने उनके बारे में कहा था – ‘यह भारत की खुशकिस्मती है कि एक बड़ा दार्शनिक, एक बड़ा शिक्षक और एक बड़ा मानवतावादी हमारा राष्ट्रपति है।‘
विश्वविख्यात पाश्चात्य दार्शनिक बट्रेंड रसेल ने डा. राधाकृष्णन् के 75वें जन्मदिवस के अवसर पर कहा – ‘हमारे समय में स्वतंत्र विचारों तथा मौलिक सृजनात्मक शक्तिवाले लोग अकेले पड़ते जा रहे हैं। उन्हें ठीक से समझा नहीं जा रहा है, स्वीकार नहीं किया जा रहा है। शक्ति ऐसे लोगों के हाथों में केंद्रित हो गई है, जिनमें ये गुण नहीं हैं। वे मानवता को सर्वनाश की ओर ले जा रहे हैं। ऐसी स्थितियों में डा0 राधाकृष्णन् का भारत के सर्वोच्च पद पर आसीन होना भरोसा देता है कि भारत इस शताब्दी में विश्व-शांति को बहुत कुछ देगा।‘
इसी अवसर पर अमेरिका के प्राच्यविद् नार्मन ब्राउन ने अपने उद्गार इन शब्दों में प्रकट किए – ‘भारत ने एक दार्शनिक को राष्ट्रपति बनाकर ऋग्वेद की इस उक्ति को सार्थक किया है – ‘सत्येनोत्थमिता भूमिः‘ अर्थात यह पृथ्वी सत्य से ही स्थिर है।
देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचकर भी राधाकृष्णन् अपने व्यक्तिगत जीवन में असाधारण रूप से साधारण बने रहे। राष्ट्रपति बनने के उपरांत वह प्रतिदिन सांय 5 पांच बजे जन-साधारण से मिलकर उनके दुःख-सुख में हिस्सेदारी करते थे तथा यथांसभव उनकी समस्याओं के समाधान हेतु प्रयास करते थे।
उनका ज्ञान इतना बहुआयामी था कि उनकी तुलना चलते-फिरते विश्वकोष से की जाती थी। उन्होंने शिक्षक के गौरव व अस्मिता को नए आयाम दिए। हमारे सांस्कृतिक गौरव को डा0 राधाकृष्णन् ने पुर्नस्थापित कर विदेशियों द्वारा फैलाई दूषित धारणाओं का पुरजोर खंडन किया। उनका असाधारण व्यक्तित्व व कृतित्व भारतीय ज्ञान-राशि का ऐसा प्रकाश स्तंम्भ है, जिसकी ज्योति युगों तक समस्त विश्व का प्रथ-प्रदर्शन करती रहेगी।

भवानीमण्डी (राज0) 326502