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ताजमहल का अनोखा दीपक|Unique Taj Mahal Deepak in hindi

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ताजमहल का अनोखा दीपक

एक शताब्दी से अधिक समय से जल रहा है !

इस समय ताजमहल में शाहजहां और मुमताज के समाधि-स्थल पर जो अलौकिक दीपक अपनी भव्य आभा बिखेर रहा है, उसका इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। यह दीपक 18 फरवरी, 1909 को लार्ड कर्जन द्वारा प्रज्ज्वलित किया गया था। इसके बाद से निरंतर लगभग एक शताब्दी से यह अद्भुत चिराग अपनी उदास रोशनी बिखेरता हुआ मानो शाहजहां और उसकी प्रेयसी मुमताज को अपनी मौन श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।

पहले समाधी स्थल पर भी जलता था दीपक

पहले मुमताज बेगम, फिर बादशाह शाहजहां को ताजमहल में समाधि स्थल पर दफनाने के बाद उन दोनों कब्रों पर एक बेहद खूबसूरत दीपक निरंतर जलता रहता था। किंतु बाद में, जब भरतपुर के जाटों ने आगरा पर आक्रमण किया, तो ताजमहल के स्वर्ण-द्वारों को तोड़कर जाने के अलावा समाधि-स्थल पर जलने वाला दीपक भी उखाड़कर नष्ट कर दिया गया। जैसे-तैसे अधिक नुकसान होने से पूर्व आक्रमण पर नियंत्रण पा लिया गया। किंतु समाधि स्थल पर जलने वाला दीपक वहां नही रहा और उसके स्थान पर साधारण दीपक जलाए जाने लगे।

कला प्रेमी लार्ड कर्जन ने देखा ताज

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कला प्रेमी लार्ड कर्जन ने देखा ताज

20वीं सदी की शुरूआत में, जब अंग्रेज भारत पर अपना नियंत्रण मजबूत कर चुके थे, 1906 में लार्ड कर्जन एक पर्यटक की हैसियत से आगरा का ताजमहल देखने आये तो वह इस धवल श्वेत भव्य कलाकृति को देखकर सम्मोहित-से हो गए। ताज की खूबसूरती से अभिभूत हो कला-प्रेमी लार्ड कर्जन ने जब समाधि-स्थल पर टिमटिमाते साधारण दीपकों को देखा तो उन्हें लगा कि ये साधारण दीपक ताज की भव्यता के अनुरूप नहीं हैं। बस, उन्होंने तय कर लिया कि जैसा दीपक यहां पहले था, वैसा ही फिर-से बनवाकर यहां लगवाएंगे।

लार्ड कर्जन के कला प्रेम का प्रतिक दीपक

लार्ड कर्जन उसी दिन से इस मिशन में जुट गए। उन्होंने तुंरत आगरा के सर्वश्रेष्ठ कारीगर को दीपक निर्मित करने के लिए अनुबंधित किया। काफी मेहनत और लगन के बाद उसने जो दीपक तैयार किया, वह लार्ड कर्जन की कल्पनाओं के अनुरूप नहीं निकला। इसके बाद लार्ड कर्जन ने हिन्दुस्तान-भर में ताज की सुंदरता में अभिवृद्धि करने वाले दीपक की तलाश करवाई, किंतु कोई नतीजा नहीं निकला। कहीं भी कर्जन को अपनी पसंद का दीपक नहीं मिला।

तब लार्ड कर्जन ने उपयुक्त दीपक की तलाश में अपने छः कला मर्मज्ञ दूतों को अरब, अफगानिस्तान, मिस्त्र आदि देशों में भेजा। उनका ख्याल था कि मुस्लिम देशों के शाही महलों और संग्रहालयों में शायद ऐसा नायाब दीपक मिल सके, जो ताज की खूबसूरती से मेल खाता हो। लेकिन कर्जन के दूत काहिरा, दश्मिक, बगदाद, आदि जगहों से निराश खाली हाथ लौट आए।

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सन् 1905 ई0 में लार्ड कर्जन खुद काहिरा गए, वहां उन्होंने अपनी कल्पना के मुताबिक दीपक की तलाश की। असफल रहने पर उन्होंने लंदन, पेरिस आदि यूरोपीय देशों के शहरों के पुरातत्व संग्रहालयों को छान मारा। लेकिन दीपक नहीं मिलना था सो नहीं मिला।
लार्ड कर्जन अब निराश हो चले थे कि एक दिन उन्हें किसी ने बताया कि काहिरा का तोदरस अदिर

नामक कारीगर उनकी कल्पना को साकार कर सकता है। कर्जन ने इसे भी आजमाने का निश्चय किया। उन्होंने दीपक के निर्माण का काम काहिरा के इस मशहूर कारीगर तोदरस को सौंप दिया। तोदरस पूरी तन्मयता से लार्ड कर्जन के ख्वाब को साकार करने में जुट गया। निर्माण कार्य के दौरान लार्ड कर्जन निरंतर तोदरस के सम्पर्क में रहे और व्यक्तिगत रूचि ले समय-समय पर उसे अपने सुझाव देते रहे।

आखिर दो वर्ष के अथक प्रयासों के बाद जो अलौकिक दीपक बनकर तैयार हुआ, उसे देखकर लार्ड कर्जन की आंखों में गहरी आत्म संतुष्टि की झलक उभर आई। वास्तव में वह दीपक कला का अद्वितीय नमूना था। मूलतः यह दीपक कांसे का बना हुआ था, जिस पर सोने-चांदी की अत्यंत सुंदर, आकर्षक, बारीक व कलात्मक नक्काशी की गई थी।

पंद्रह हजार रु. लागत का दीपक

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उस जमाने में इसकी लागत पन्द्रह हजार रूपए से अधिक आई थी। इस दीपक पर फारसी भाषा में लिखा गया – ‘1906 ई0 में लार्ड कर्जन की जानिब से ताज को यह तोहफा….!’ यह अनोखा दीपक स्वयं वायसराय लार्ड कर्जन ने दिनांक 18 फरवरी 1906 को शाही मकबरों के सामने प्रज्ज्वलित किया, जो उस दिन से लेकर आज तक सतत रूप से जल रहा है। इन सालों में एक क्षण के लिए भी यह बुझा नहीं। लार्ड कर्जन के कला-प्रेम का एक अहम प्रतीक बन चुका है, यह दीपक!