pexels kat jayne 568027 scaled

पश्चाताप के आंसू

pexels kat jayne 568027

फिल्म खत्म हो चुकी थी। हाॅल के भीतर की बत्तियां जल उठीं। दरवाजे खुल गये। मैंने बस्ते को कंधे पर लटकाया और सिर झुकाये दरवाजे की ओर खिसकने लगा।
हाॅल में घुसते समय मुझे ऐसा नहीं लगा था कि लोग मुझे घूर रहे हैं पर हाल से निकलते समय न जाने क्यों मैं सिर ऊंचा करके नहीं चल पा रहा था। मैं जल्दी से जल्दी हाल से बाहर निकल जाना चाहता था। काश! इस समय मेरे पंख उग आते तो कितना अच्छा होता। मैं पक्षी की तरह उड़कर हाल के बाहर निकल आता और पल-भर में घर पहुंच जाता।
बस्ता कंधे पर बोझ जैसा लग रहा था। मन कर रहा था कि बस्ते को हाल के अंदर ही सीट के नीचे डाल आऊं। कम-से-कम लोग इस तरह घूर-घूरकर तो न देखेंगे। स्कूल में ही मैंने सोचा था कि बस्ता राजू के जिम्मे कर दूं, ताकि हाल में मुझे देखकर लोग यह न सोचें कि यह लड़का स्कूल से भागकर फिल्म देखने आया है। लेकिन राजू कहां इतना परोपकारी था? बस, इतना ही काफी था कि उसने घर पर मेरे फिल्म देखने की बात न कहने का वचन दे दिया था।
मैं हाल के बाहर निकल आया। सूरज डूब चुका था। पर अभी अंधेरा नहीं फैला था। घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो जाएगा। पिताजी कारखाने से लौट आये होंगे। मुझे न देखकर उन्होंने मेरे बारे में मां से पूछा होगा। मां ने कह दिया होगा कि अभी तक स्कूल से नहीं आया। पिताजी गुस्सा हुए होंगे। उन्होंने कहा होगा-आज भी वह जरूर स्कूल से भागकर फिल्म देखने गया होगा। फिर पिताजी ने मां पर यह दोष लगाया होगा कि उसकी लापरवाही और लाड़-प्यार से ही मैं बिगड़ रहा हॅूं।
फिर पिताजी को अचानक ख्याल आया होगा। उन्होंने मां से पूछा होगा कि क्या तुमने मेरी जेब से दस रूपये निकाले थे। पर मां भला बिना पूछे क्यों निकालती? पिता के दस रूपये चुराने वाला चोर तो में हूं। हो सकता है कि पिताजी अभी घर नहीं पहुंचे हों। सब्जी खरीदने में लगे हों या किसी मित्र के यहां ही चले गये हों । तब उनके पहुंचने से पहले ही मैं घर पहुंच जाता । मां पूछती तो कह देता कि आज एन.सी.सी. की परेड थी। इसलिए देर हो गयी। फिर मैं जल्दी-जल्दी नाश्ता करके खेलने चला जाता। खेलकर देर से लौटता, ताकि किसी को पूछने का ख्याल न रहता। यदि पिताजी दस रूपयों के बारे पूछते भी तो मैं साफ कह देता कि मैंने रूपये नहीं लिए।
मैं यही सब सोचता हुआ तेजी से चला जा रहा था। सोचता था कि जल्दी से जल्दी बाजार से बाहर निकल जाऊं पर दुकानों की कतारें खत्म होने का नाम ही न ले रही थीं। मुझे लग रहा था कि दुकानों पर खड़े लोगों की आंखे मेरे बस्ते पर टिकी हुई हैं। बस चलता तो मैं अदृश्य हो जाता। फिर भला ये आंखें ऐसे घूर-घूरकर मुझे देख पातीं?
खैर, थोड़ा आगे बढ़ा तो देखा कि एक होटल के सामने भीड़ लगी हुई है। शायद कोई दुर्घटना हुई है। मैं तेजी से होटल के पास पहुंचा। आंखों को विश्वास न हुआ। पिताजी! हां, पिताजी ही थे, जो होटल के काउंटर पर चुपचाप सहमे-से खड़े थे। चेहरा सफेद पड़ चुका था। सभी लोग उनकी ओर देख रहे थे। होटल का मैनेजर पिताजी को क्यों डांट रहा है?
‘आपने नाश्ते से पहले अपनी जेबें क्यों नहीं देख ली?‘ मैनेजर चीख रहा था।
‘मै…मेरी जेब में दस रूपये ….।‘ पिताजी मरी-मरी सी आवाज में बोल रहे थे।
‘तो दस रूपये कहां उड़ गये?‘ मैंने तो आपकी पाॅकेट नहीं मारी?‘ – मैनेजर के स्वर में गुस्सा साफ जाहिर हो रहा था।
पिताजी चुप! उनके मुंह से बस ‘मै…मैं..‘ के अलावा कोई शब्द नहीं फूट रहे थे।
पिताजी चुप क्यों हैं? वे क्यों नहीं कह देते कि मेरी जेब किसी ने काट ली? वे क्यों नहीं कह देते कि मेरी जेब मेरे लाड़ले बेटे ने काट ली?
होटल का मालिक जोर-जोर से चिल्ला रहा था। वह बार-बार पिता से पैसे मांग रहा था। भीड़ बढ़ती जा रही थी। अपनी असहाय स्थिति के कारण पिता की आंखे भर आयी थीं। मुझे अचानक लगा कि ये आंखे बीच बाजार में हो रहे खुले अपमान के कारण नहीं, बल्कि मेरे कारण छलक आयीं हैं। इन आंसुओ की हर बूंद में मेरे भविष्य की चिंता समायी हुई है, मेरी करतूत से दुःखी हैं। मैं भीड़ में खड़ा फूट-फूटकर रोने लगा।
तभी पिताजी के सहकर्मी वर्माजी भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े। उन्होंने पिताजी से सारा माजरा पूछा। फिर होटल के मालिक को झाड़ते हुए अपनी जेब से निकालकर उसके रूपये चुकाये। भीड़ छंट गयी।
मैं रोता हुआ घर की ओर चल पड़ा। मेरा मन मुझे धिक्कार रहा था। सोचता था कि किसी गाड़ी के नीचे आ जाऊं या कहीं डूब मरूं।
किसी तरह घर तक पहुंचा। घर पहुंचते ही बिस्तर पर गिरा और तकिये में मुंह छिपाकर रोने लगा। तभी पिताजी घर आ गये। मां ने पूछा ‘क्या बात है? आपका चेहरा काफी उतरा हुआ लग रहा है। तबियत तो ठीक है न?‘
पिताजी ने मरी-सी आवाज में कहा ‘हां ठीक है।‘
फिर उन्होंने मुझे बुलवाया। मैंने सोचा कि पिताजी जरूर मारेंगे। आज खुद मैं बुरी तरह पिटना चाहता था। चाहता था कि पिताजी मुझे खूब मारें…..इतना मारें कि मेरा दम निकल जाए।
मगर पिताजी ने मुझे बिल्कुल डांटा तक नहीं। उन्होंने महज इतना ही कहा-‘बेटा, जेब से बगैर बताये पैसे नहीं निकालना चाहिए। तुम्हे आवश्यकता हो तो मुझसे मांग लिया करो।‘
मैं शर्म से जमीन में गड़ा जा रहा था। आंसू रूकने का नाम नहीं ले रहे थे।