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छींक: शुभ या अशुभ

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(Sneezing lucky or unlucky)

छींक आना एक स्वाभाविक क्रिया है। रोने की तरह छींकना भी बिल्कुल सामान्य बात है। कभी-कभी तो सर्दी-जुकाम से पीड़ित होने पर जब छींक नहीं आती, तो लोग नाक में सींक, सुंघनी आदि डालकर जबरन छींकने का प्रयत्न करते हैं।
भारत में छींक को अशुभ ही माना जाता है। कुछ लोग बाईं और ऊपर की ओर से आने वाली तथा पीठ पीछे की छींक को अशुभ मानते हैं। भारत के केरल प्रांत के कुछ अंचलों में तो छींक की आवाज को ही भयानक अपशकुन माना जाता है। चाहे वह झूठ-मूठ केवल किसी को छेड़ने के लिए की गई हो। किसी कार्य के आरंभ में अथवा किसी यात्रा पर जाते समय अपनी स्वयं की छींक को भी लोग बहुत बुरा मानते हैं।
कहते हैं-‘अपनी छींक महा दुखदायी- ऐसी छींक विचारो भाई।‘ भारत में छींक के प्राकृतिक रूप को अशुभ मानते हैं। किसी साधन से अथवा सर्दी आदि के कारण होने वाली छींक को यहां तटस्थ रूप से देखा जाता है। किसी वाद-विवाद के समय यदि कोई छींक दे, तो जिसके बोलते समय यह छींक होती है, उसी की बात को सच व प्रामाणिक मान लिया जाता है। इस प्रकार हमारे देश में छींक साक्षी का काम भी करती है।
पश्चिम एशिया के मुसलमान छींकने के पश्चात् ‘परवरदिगार‘ या ‘अल्लाह‘ बोलते हैं। उनकी धारणा है कि शैतान छींकने वाले व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करना चाहता था, परंतु छींक ने उसे ऐसा नहीं करने दिया। रोमन लोग छींकने के बाद ‘‘ओबस्टी ओमन‘‘ (अशुभ घटना न हो) कहते हैं। उनका विश्वास है कि छींकने वाले व्यक्ति के आस-पास भूत-प्रेतों का वास होता है। सन् 589 ई0 में रोम मे भीषण प्लेग फैला था, तब पोप ग्रेगरी सप्तम् ने यह फरमान निकाला था कि किसी के भी छींकने के पश्चात् ‘‘ओबस्टी ओमन‘‘ कहा जाए। इससे छींक का प्रभाव नष्ट हो जाएगा।
जर्मन लोगों की मान्यता है कि छींकने से मनुष्य की आयु कम होती है। इस कारण छींकने के पश्चात् लोग बोलते हैं-‘‘ आप के स्वास्थ्य के लिए।‘‘ ऐसा कहकर मित्र-सम्बन्धी छींकने वाले की दीर्घायु की कामना करते हैं। अफ्रीका की ‘झुलू‘ जाति के लोग छींक आने पर समझते हैं कि रोगी की दशा में सुधार हो रहा है। इसी कारण वहां के चतुर हकीम किसी भी बीमारी का इलाज इस दृष्टि से करते हैं कि रोगी को जल्दी-जल्दी छींक आने लगे।
स्पेन व फ्रांस में भी छींक को शुभ-अशुभ माना जाता है। अतः छींकने वाले व्यक्ति के लिए लोग बोलते हैं-‘‘तेरी इच्छा पूरी हो।‘‘ जापान में छींकने पर ऐसा समझा जाता है कि कहीं उस छींकने वाले व्यक्ति को प्रशंसा की जा रही है। लगातार दो बार छींकने पर छींकने वाले व्यक्ति की कहीं निंदा होने की कल्पना की जाती है। किन्तु एक साथ तीन छींके आने पर लोग यह मान लेते हैं कि छींकने वाला व्यक्ति निकट भविष्य में बीमार पड़ने वाला है।
डाक्टरों का मत है कि छींकों की बीमारी माता-पिता से भी बच्चों को मिलती है। छींक के फोटो खींचने में भी वैज्ञानिकों ने सफलता प्राप्त कर ली है। चाल्र्स वाहन नामक एक अमरीकी डाॅक्टर का मत है कि छींकते समय छाती में दबाव बहुत अधिक हो जाता है, जिससे दिल की धड़कन रूकने लगती है। अतः स्वाभाविक ढंग से छींकना ही स्वास्थ्य के लिए हितकर है। छींकते समय न तो होंठ बंद करके रोकने का प्रयत्न किया जाना चाहिए, और न ही नाक पकड़ कर छींक को टालने की कोशिश करना उचित है। पालथी मारकर बैठने की स्थिति में छींकना भी रीढ़ की हड्डी पर बुरा प्रभाव डालता है।
डाॅक्टर के मतानुसार छींक के साथ ही एक बार में गंदगी के लगभग 4600 तक कण तेजी से हवा में उछलते हैं। इन कणों की गति 150 से 300 फीट प्रति सैकंड तक होती है। छींकने के पश्चात् ये कण हजारों की संख्या में आधे घंटे तक हवा में बने रहते हैं। इन कणों में रोग के कीटाणु भी हो सकते हैं। एक बार छींक में 19000 तक कीटाणु मंुह के बाहर आ जाते है। फ्लू जैसे रोग छींक के कारण बड़ी तेजी से फैलते हैं, क्योंकि छींक के समय लगभग 200 कि0मी0 प्रति घंटे की गति से हवा श्वास नली का मुंह खोलकर बाहर आती है। तभी तो कीटाणुओं को हवा में फैलने से रोकने के लि छींकते समय मुंह के सामने रूमाल लगा लेना आवश्यक होता है।
छींक आती क्यों है ? छींक मन के किसी भारी भ्रम के कारण भी आने लगती है। हमारे यहां यह भी विश्वास किया जाता है कि लगातार छींक आने का अर्थ है, कोई प्रियजन इस समय हमें बेहद याद कर रहा है। नाक या कपाल में किसी चीज के फंस जाने से भी छींक आने लगती है। जोर से छींक आने के साथ ही वह चीज भी तेजी से बाहर निकल जाती है। जुकाम के समय तो छींक आती ही इसी कारण है।
सचमुच छींक एक महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर गहन अनुसंधान और शोध की आवयकता है, ताकि इसके पीछे छुपे रहस्य सामने आ सकें।