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किस्सा ढाका नहीं, सिरोंज की मलमल का!

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‘ढाका‘ और ‘मलमल‘ का रिश्ता इतना शाश्वत हो चुका है कि हम ‘ढाका‘ की मलमल‘ के अलावा दूसरे स्थान पर मलमल के उत्पादन के विषय में सोच भी नहीं सकते। यह सच है कि मध्यकाल में ढाका की मलमल पूरी दूनिया में मशहूर थी। कहा जाता है कि ढाका की मलमल का पूरा थान एक अंगूठी से निकल जाता था। शायद यह जानना दिलचस्प हो कि मध्यप्रदेश के विदिशा जिले का शहर सिरोंज एक जमाने में छींट और मलमल उत्पादन का विश्व प्रसिद्ध केन्द्र रहा है। सत्रहवीं सदी में भारत यात्रा करने वाले फ्रांसीसी यात्री जीन ट्रेविरनियर अपने यात्रा वृतान्त में लिखा है -‘‘ सिरोंज में एक खास किस्म की मलमल बनाई जाती है, जो इतनी मुलायम व महीन होती है कि उसे पहनने वाले के शरीर को देखने से महसूस होता कि वह कुछ भी पहने हुए नही है। नग्नता को ढकने के लिए इस मलमल की न जाने कितनी परतें पहननी पड़ती है। इसके निर्यात की व्यापारियों को अनुमति नहीं है। गवर्नर द्वारा इस खास मलमल को ग्रीष्म काल में मुगल सरदारो व दरबारियों को तोहफे के तौर पर भेजा जाता है।‘‘
सत्रहवीं शताब्दी में आगरा से सूरत तक का राजमार्ग सिरोंज होकर निकलता था क्योंकि उस युग में सिरोंज व्यापार-व्यवसाय का एक बहुत बड़ा केन्द्र था। ‘आइने अकबरी‘ में अबुल फजल ने भी सिरांेंज के मलमल व छींट के कपड़े का उल्लेख करते हुए पं्रशसा की है।
सन् 1901 में प्रकाशित इम्पीरियल गजेटियर आफ इंडिया में सिरोंज के प्राचीन वैभव का उल्लेख इन शब्दों में किया गया है -‘‘ सिरोंज के मध्य बाजार एवं भवनों के अवशेष इसके वैभवशाली अतीत के मौन साक्षी हंै। मलमल और छींट के उत्पादन में सिरोंज ने विश्व-स्तर पर ख्याति अर्जित की थी। कपड़ो की रंगाई और छपाई यहां का मुख्य उद्योग था। इस कार्य को करने वाले रंगरेज तथा छीपा लोग जंगली फूलों से रंग तैयार करते थे। रंगाई के काम आने वाले पक्के हौज आज भी मौजूद है।
प्रख्यात इतिहासकार डाक्टर रघुवीर सिंह ने भी प्राचीन काल में सिरोंज में बनने वाली बेहतरीन किस्म की छींट के उत्पादन की पुष्टि की है तथा कहा कि सिरोंज की छींट का बड़े पैमाने पर निर्यात होता था।
सन् 1615 से 1619 के बीच भारत भ्रमण करने वाले यात्री सर थामस रो के अनुसार सिरांेज की मलमल की गुणवत्ता अन्य स्थानों की मलमल से अधिक थी।
सन् 1583 से 1591 के बीच भारत आए यूरोपीय सैलानी राल्फफिच ने लिखा कि सिरोंज कपास उत्पादन तथा वस्त्र निर्माण का बहुत बड़ा केन्द्र था।
सिरोंज शायद भारत का इकलौता शहर है, जहां दो मंजिला बाजार है। कहा जाता है कि यहां से गुजरने वाले घोड़े तथा ऊंचे ऊंटों के काफिले पर सवार होकर लोग उपर की मंजिल की दुकानों से खरीददारी करते थे तथा पैदल चलने वाले ग्राहको के लिए नीचे की मंजिल की दुकानें थीं।
व्यापार-व्यवसाय के उन्नत केन्द्र और अपनी उŸाम क्वालिटी की मलमल और छींट के उत्पादन के लिए विख्यात सिरोंज के भाग्य का सितारा औरंगजेब के शासनकाल में डूबने लगा। औरंगजेब व बुन्देलखण्ड के योद्धा छत्रसाल के बीच निरन्तर संघर्ष चला। बाद में पेशवा बाजीराव सिरोंज पर काबिज हुए। सन् 1798 में होल्कर ने यह क्षेत्र पिंडारी सरदार अमीर खान को दे दिया। उसके वंशजो का स्वतंत्रता-प्राप्ति तक सिरोंज पर आधिपत्य रहा पर राजनैतिक अस्थिरता के चलते सिरोंज का उद्योग चैपट हो गया।
ढाका की मलमल के दीवाने शायद जानते तक नहीं कि सिरोंज की मलमल किसी भी रूप में ढाका की मलमल से कम नहीं रही हैं।