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सावधान! चिंता चिता समान है

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इन दिनों रोगों और रोगियों की संख्या में दिन-ब-दिन अधिकाधिक वृद्धि होती चली जा रही है। अस्पतालों और चिकित्सकों का तेजी से विस्तार हो रहा है। नित नई औषधियों के आविष्कार भी सामने आ रहे हैं। इतने पर भी बीमारियों पर अंकुश लगने जैसे के सरकारी अस्पताल में दौरा करके इन रोगियों से जो पूछताछ की, इससे इस सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ है कि कैन्सर का सबसे बड़ा कारण मानसिक उद्वेग है।
टैक्सास हैल्थ साइन्स विश्व विद्यालय के प्रो0 माइके लस्टर्न ने अपनी खोजों में बढ़ते हुए रोगों को औद्योगिक समाज की देन कहा है। कुछ समय पूर्व हृदय रोगों में से मात्र 25 ही मरते थे पर अब जिन्हें यह रोग पकड़ता है, उनमें से 55 प्रतिशत की जान लेकर ही छोड़ता है। अमेरिका में इन दिनों हर वर्ष 10 लाख नये हृदय रोगियों की वृद्धि होती चली जा रही है।
वल्र्ड हैल्थ आर्गनाइजेशन के अनुसार, समृद्ध प्रमुख देशों में आधी मौतें हृदय रोग से होने लगी हैं। इस बढोŸारी में साधनों की कमी या परिस्थितियों की विपन्नता उतना बड़ा कारण नहीं है जितना कि मनुष्य का खिन्न व उद्विग्न रहना। खीझ और उदासी आदमी को तोड़ कर रख देती है और वह कभी भी हृदय रोग जैसी किसी विपत्ति में फंस सकता है।
कैलीफोर्निया के मनोरोग विशेषज्ञ डा0 हिल्स का कथन है कि चिन्ता के कारण तो अनेकों हो सकते है, पर उनका दबाव समझदारी नासमझी के आधार पर कम या अधिक किया जा सकता है। एक दूसरे विशेष मार्मर ने इस अभिमत की पुष्टि की है। वे कहते हैं कि – चिन्तित रहना एक बुरी आदत है, जिसे दुर्बल प्रकृति के लोग अपने स्वभाव का अंग बना लेते हैं। इसके लिए कारण भी उन्हें कुछ न कुछ मिल ही जाते हैं। सुखी समझे जाने वाले लोगों को भी कोई न कोई कारण ऐसा लगा रह सकता है, जिसमें उन्हें चिन्ता करनी पड़े। इसलिए वैसे कारणों को समाप्त करना कठिन है। दृष्टिकोण सुधारने पर ही यह हो सकता है कि तनावों के बीच रहते हुए भी मनुष्य हलका मन रखे रहे और हंसते-हंसते समय गुजारें।
डाॅ0 फाक्स के अनुसार चिन्ता करना एक थकाने वाले गति चक्र में भ्रमण करते रहना है। चिन्ता करना चिंतक का मस्तिष्क का उपहृत होना- उद्विग्न मस्तिष्क द्वारा कारण और समझाना समझ न पाना – गतिरोध में खीझ उपजना और फिर चिन्ता का वेग और दुना चैगुना बढ़ जाना। यही है थकाने वाला गतिचक्र जिसमें अनेकों को घूमते देखा जाता है। वे ऐसे दलदल में फंसे रहते हैं, जिसमें से दृष्टिकोण के सुधार परिवर्तन के अलावा, अन्य बाहर निकलने का और कोई उपाय है नहीं।
चिन्ता का वास्तविक कारण उतना जटिल नहीं होता जितना कि व्यक्ति समझता है। दृष्टि दोष से कई बार बड़ी चीजें छोटी और छोटी चीजें बड़ी दिखाई पड़ती हैं। कुछ लोग छोटी को बड़ी बनाकर देखने के आदी होते हैं। उन्हें आशंकाएं दिखती रहती हैं और आगत संकट की कल्पना बढ़ा-चढ़ाकर करने के कारण वे पर्वत जैसी विशालकाय प्रतीत होती हैं। ऐसे लोग तनिक-सा अंधेरा होते ही झाड़ी को भूत की शक्ल में देख लेते हैं। आशंकाओं पर कल्पना का समर्थन पुट चढ़ाते रहने पर वे तिल से बढ़कर ताड़ बन जाती है। इसके विपरीत बड़ी चीज को हल्की करके देखने से नशा उतर जाता है और चिन्ता का वास्तविक कारण रहते हुए भी निर्भय से जी सकने योग्य मनोबल मिल जाता है।
वनवासी लोग छोटी-छोटी झोंपड़ियों में बिखरे हुए रहते हैं। उस क्षेत्र में हिंसक पशुओं के झुण्ड घूमते रहते हैं। सर्प बिच्छूओं की भी कमी नहीं रहती। इतने पर भी वे गहरी नींद सोते और दिन भर भोजन की तलाश में अकेले दुकेले घूमते रहते हैं। पीढ़ियों से इसी दिनचर्या को अपनाये हुए हैं। उन्हें डर नहीं लगता कि इन हिंसक पशुओं के बीच रहते हुए किस प्रकार गुजारा होगा। निर्भयता, और निश्चिन्तता अच्छे स्वभाव का चिन्ह है। जिसे अपनाकर वास्तविक कठिनाइयों के बीच भी सरलतापूर्वक रहा और जिया जा सकता है। इसके विपरीत डरपोक तो सपने में भी भूत देखकर हड़बड़ाते और चीख पुकार करते देखे गये हैं। सर्प, सिंह आदि की कल्पना जितनी डरावनी है उतनी उसकी समीपता नहीं सपेरे और सरकस वाले उन्हीं के साथ रहकर जिंदगी गुजार देते हैं।
दार्शनिक कवि उमर खय्याम ने अपने एक शेर में कहा है – ‘‘भूत को भूल जाओ क्योंकि वह मर चुका, अब फिर कभी लौटने वाला नहीं है। भविष्य से रंगरेलिया न करो क्योंकि अभी उसके जन्मने तक में देर है। मात्र वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करो, क्योंकि उसी का सदुपयोग करने पर वैसा कुछ मिल सकता है, जिसकी चाहत है।‘‘
चिन्तित वे रहते हैं, जो अपने को एकाकी अनुभव करते हैं। उन्हें लगता है कि कठिनाईयों का पर्वत मुझे अकेले ही उठाना पडे़गा, जबकि बात वस्तुतः वैसी है नहीं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसने प्रगति मिल-जुलकर की है। एक दूसरे को सहारा देने का विचार अपनाकर ही परिवार और समाज का व्यवस्था क्रम चलता है। ग्राहक और दुकानदार के सहयोग से व्यवसाय होता है। एक घर की लड़की दूसरे घर में जाकर नया परिवार बसाती है। यह सब सघन सहयोग के सहारे ही सम्भव होता है। इस तथ्य पर विश्वास रखा जाना चाहिए कि जब हम अपनी खुशियां बांटते रहते हैं तो दूसरे भी कठिन समय आने पर सहायता करेंगें। बोझ बंटाने वाले सहयोगी भी कहीं न कहीं से निकल ही आयेंगे।
अच्छा हो, चिन्तित व्यक्ति दूसरे समझदारों से अपनी घुटन खोले और उनसे निराकरण सम्बन्धी परामर्श मांगे। यों गिरे को गड्डे में धकेलने वाले भी कम नहीं है पर अभी यह दुनिया समझदारों से रहित नहीं हुई है, जिनसे परामर्श प्राप्त किया जा सके। ऐसे विश्वस्त लोगों से सम्पर्क सध सके और विचार विनिमय बन पड़े तो ऐसे परामर्श मिल सकते हैं, जिनसे कुकल्पनाओं से पीछा छूटे और जो सम्भव है, उसे करने के लिए रास्ता मिले। एकाकी खीझते रहने और जाल में फंसते, चलने से कोई बात बनती नहीं। यह स्पष्ट समझा जाना चाहिए कि गलती जहां से आरंभ होती है, सुधार वहीं होना चाहिए। पानी जहां से रिसता है, छेद बंद करने के लिए उसी स्थान तक पहुंचा जाना चाहिए।