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सरस्वती पूजन

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दक्षिण भारत में बच्चों को पहली बार पाठशाला में भेजने का उत्सव बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। वह पर्व वहां पर विजयादशमी के दिन सम्पन्न होता है।
वस्तुतः दक्षिण भारत में दशहरे के दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है। शिल्पकार उस दिन अपने औजारों की विधिवत पूजा करते हैं। बच्चों को सवेरे उबटन लगाकर मल-मलकर नहलाया जाता है और नये कपड़े उन्हें पहनाए जाते हैं, जो विशेष रूप से पहली बार स्कूल जाने के वास्ते सिलवाए जाते हैं। एक नई स्लेट, पैंसिल, वर्णमाला की किताबें आदि पढ़ने-लिखने की सामग्री एक चमचमाती हुई चैकी पर सजा दी जाती है।
तब सरस्वती की वंदना की जाती है और शिक्षा सफलतापूर्वक पूर्ण करने हेतु आशीर्वाद मांगा जाता है। तब चावल से भरी एक तश्तरी बच्चे या बच्ची के समक्ष रख दी जाती है। यह इस अनुष्ठान का प्रमुख हिस्सा है। संगीत की सुमधुर लहरियों और मंत्रोच्चार के बीच परिवार का मुखिया अथवा सबसे बड़ा सदस्य दीक्षा में प्रवेश लेने वाले बच्चे अथवा बच्ची को वर्णमाला का प्रथम अक्षर अपनी मदद से लिखवाता है।
यह प्रथम दीक्षा संस्कार घर पर ही सम्पन्न होता है। इसके पश्चात् बच्चे को प्राथमिक शिक्षा के वास्ते पास के प्राथमिक स्कूल में ले जाया जाता है। वहां सभी प्राथमिक विद्यालय विजयादशमी के दिन विशेष रूप से खुले रहते हैं, जिससे लोग अपने बच्चे को दाखिले के लिए वहां ला सकें।
धनवान और अभिजात्य वर्ग के लोग इस मौके पर घर से स्कूल तक बैण्ड बाजों के साथ नाचते-गाते हुए अपने बच्चे को ले जाते हैं। यह दृश्य देखकर लगता है, मानों किसी का विवाह हो रहा हो। आम आदमी सादगीपूर्ण तरीके से अपने बच्चे को घर से शाला तक लाते हैं। साथ में परिवार के समस्त सदस्य होते हैं।
शाला में सभी अध्यापक-गण नये-पुराने छात्रों के साथ मिलकर मंत्रोच्चार करते हैं। तब सरस्वती वंदना होती है, जिसका भावार्थ होता है: ‘हे देवी सरस्वती ! मैं तुम्हे सादर प्रणाम करता हूं। मुझे अपना आशीर्वाद दो…. आज मैं शिक्षा के क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ हूँ …..आपसे प्रार्थना है कि मेरी आशाआंे और आकांक्षाओं को पूर्ण करने में मेरी सहायता करें….!‘
विद्यालय में दाखिला पा जाने के बाद बच्चे की विधिवत शिक्षा प्रारंभ हो जाती है।