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सफरनामा केसर का | saffron

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‘केसर‘ का नाम सुनते ही मस्तिष्क में एक तस्वीर उभरती है और बेहद उम्दा व मनभावन -सी खुशबू फिजां में घुलती-सी महसूस होती है। हिन्दुस्तानी सभ्यता में लम्बे समय से केसर को एक अहम व महत्वपूर्ण स्थान अर्जित है। पूजा में पवित्रता की परिभाषा ‘केसर‘ के खुशबूदार रंगो से लिखी जाती है।

केसर saffron महज एक फूल

दरअसल वानस्पतिक नजरिए से केसर महज एक फूल है। इसे उर्दू में ‘जाफरान ‘ नाम से जाना जाता है। संस्कृत में इसे ‘कुंकुम‘ कहा जाता है तथा चीनी में ‘कोगयोग‘, तिब्बती में ‘कुमग्राम‘ अंग्रेजी में ‘सेफ्रान‘ कश्मीरी में ‘काम्मीराज‘ कहा जाता है। केसर का पुष्प अपनी सुवासित तासीर के चलते सदियों से शंहशाह से लेकर आम जनता तक के बीच आर्कषण का केन्द्र रहा है। हिन्दू मंदिरों में बहुत प्राचीन-काल से ही देवताओं की पूजा अर्चना में केसर का इस्तेमाल होता रहा है।

केसर saffron में औषधिय गुण भी

ऐसा नही कि केसर की खासियत सिर्फ खुशबू ही हो, बल्कि केसर अपने औषधिय गुणों के कारण भी बहुत उपयोगी वस्तु है। आयुर्वेद में औषधि के रूप में केसर को एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली में प्रायः सभी शक्तिवर्द्धक औषधियों में केसर का इस्तेमाल होता है। न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया के दूसरे मुल्कों में भी शुरू से केसर को बड़े कौतूहल व सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है।

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विदेशों में प्राचीन काल में केसर saffron

आयरलैंड के सम्राट अपने लिबास को केसर से रंगवाते थे। इसके अतिरिक्त उस जमाने के सामन्त और जागीरदार आदि केसर से रंगी कमीजें पहनने में गर्व अनुभव करते थे। एक तरह से केसर के रंगो से रंगे वस्त्र उस युग में एक स्टेटस सिम्बल माने जाते थे। इटली और यूनान के राज दरबारों में सभासदों और आमंत्रित अतिथियों का स्वागत केसर के छिड़काव द्वारा किया जाता था।

सम्राट नीरो के रोम-आगमन के मौके पर बाजारों में खुशबूदार केसर का छिड़काव किया गया। प्राचीन काल में चीन व अरब देशों में प्रचलित चिकित्सा-पद्धतियों के अन्तर्गत केसर द्वारा निर्मित औषधियां उपचार हेतु काम मंे लाई जाती थीं। मनमोहक सुगन्ध और मनोहारी रंग के कारण केसर का इस्तेमाल खाद्य प्रदार्थो में भी निरन्तर होता रहा है। इंग्लैंड में पेस्टी और अन्य मिष्ठानों में केसर मिलाया जाता है। कई देशों में पके हुए चांवलों में केसर डाला जाता है।

केसर saffron की उत्पति कैसे हुई ?


केसर की उत्पति के सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा प्रचलित है, केसर की जिसके अनुसार आयुर्वेदाचार्य बाणभट्ट द्वारा नेत्र-रोग से पीड़ित नागराज तक्षक का सफल उपचार करने क की एवज में बाणभट्ट को तक्षक ने केसर के बीज उपहार-स्वरूप दिए, जिन्हें बाणभट्ट ने पामपुर ( काश्मीर ) में बो दिया और इस प्रकार केसर की खेती की शुरूआत हुई।

वैसे विद्वान केसर के मूल जन्म-स्थान के संबंध में एक मत नहीं हैं l कुछ लोगों की मान्यता है कि केसर एक विदेशी पुष्प है तथा इसके बीज अन्य देशों से भारत पहुंचे। जबकि अधिकांश व्यक्तियों का मानना है कि केसर मूलतः भारतीय पुष्प है। सुप्रसिद्ध चीनी यात्री हृवेनसांग ने अपनी भारत-यात्रा के संस्मरणों में लिखा था कि काश्मीर में केसर की खेती करने का श्रेय बौद्ध भिक्षुक अरहट महमान्तक को जाता है। वह मदान से अपने साथ केसर के बीज लाए थे।

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कश्मीर में दो हजार साल से हो रही केसर saffron की खेती

कई ऐतिहासिक प्रमाणों से यह तथ्य सिद्ध होता है कि कश्मीर में लगभग दो हजार सालों से भी अधिक समय से केसर की खेती होती रही है। महाकवि कालिदास ने अपनी काव्य रचनाओं में केसर का विशद रूप से वर्णन किया है।चीन में केसर का प्रवेश मंगोल आक्रमणकारियों के माध्यम से हुआ, जबकि आज दुनिया के दूसरे केसर-उत्पादक राष्ट्र स्पेन में केसर पहुंचाने का श्रेय अरब आक्रमणकारियों को जाता है। इंग्लैंड तक केसर को पहुंचाने का काम त्रिपोली के एक यात्री ने किया, जो एक खोखली घड़ी में छुपा कर केसर वहां ले गया।

यूरोप में सर्वप्रथम सिलीशिया में केसर की खेती प्रारम्भ हुई। वहां केसर को ‘क्रोकस‘ के नाम से जाना जाता था। पश्चिमी यूरोप में केसर का प्रचार-प्रसार धर्म योद्धाओं द्वारा किया गया। प्राचीन मिस्त्र में इसे एक सुरभित जड़ी-बूटी के रूप में रूप में काम में लिया जाता था। यूनानी लेखकों को होमर व हिप्पोक्रेटीज ने अपने अपने लेखों में केसर के गुणों का वर्णन किया है।

मुगल बादशाहों को बेहद पसंद थी केसर saffron

राजसी स्वभाव के शान-औ-शौकत पसंद मुगल बादशाहों ने केसर को बहुत इज्जत बख्शी। जहांगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुके-जहांगीर‘ में केसर की मोहक खुशबू और खूबसूरती की दिल खोलकर तारीफ की है। इसी तरह ‘आईने अकबरी‘ में अबुल फजल ने लिखा है -‘ केसर के खिले खूबसूरत फूलों का नजारा इतना दिलकश होता है कि मनहूस मिजाज के लोग भी एक बार खुश हो उठते हैं।

‘ अबुल फजल आगे लिखते हैं कि -‘ काश्मीर में केसर की पैदावार के वक्त एक मेला लगता है, सुगंध से भरे इस मेले के नायाब मंजर को देखने दूर-दूर से लोग आते है।’

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स्पेन और भारत में ही केसर saffron की खेत

दुनिया में इस वक्त सिर्फ दो मुल्कों स्पेन और भारत में ही केसर की खेती होती है। भारत में भी काश्मीर के पामपुर के पठारों और जम्मू के किश्तवाड़ में पर्वतीय क्षेत्र के मादा नामक गांव में मुख्य रूप से केसर की पैदावार होती है। मुगलकाल में पामपुर के लगभग दस हजार एकड़ क्षेत्र में केसर की खेती होती थी। लेकिन वर्तमान में पांच हजार एकड़ क्षेत्र में ही केसर की खेती की जा रही है।

केसर saffron की खेती एक नाजुक कला

केसर की खेती एक बहुत ही नाजुक कला है। इसके लिए एक खास किस्म की पठारी भूमि चाहिए, जिसमें पानी नहीं ठहरता हो। उपयुक्त जमीन के चयन के पश्चात् उसकी भली प्रकार जुताई कर आठ फुट लंबी और आठ फुट चैड़ी वर्गाकार क्यारियां तैयार की जाती है। केसर की जड़ो की बुवाई के लिए मार्च-अप्रैल का समय उपयुक्त माना जाता है। बुआई के कुछ समय पश्चात जड़ों से 6 से 9 इंच ऊंचाई के पौधे निकल आते हंै। इन सुन्दर पौधों में गुलाबी रंगत लिए बैंगनी रंग के फूल खिलते हैं l

गर्मी के मौसम की समाप्ति के बाद केसर के फूल खिलने शुरू हो जाते हंै। इन फूलों के बीच में लहसुन की गांठ के आकार की केसर की बौड़ी निकलती है। कार्तिक पूर्णिमा अर्थात सितम्बर-अक्टूबर तक केसर के फूल पूरी तरह तैयार हो जाते हैं। केसर के मुकुलित होते ही चारों तरफ खुशबू और महक का माहौल बन जाता है।

दूर-दूर तक खेतों में पीतारूण व लालिमा युक्त नीले फूल एक सुन्दर गलीचे के मांनिद नजर आते हैं। आम तौर पर एक बौडी से दो से चार ग्राम तक केसर प्राप्त होती है। केसर की एक क्यारी से पहले वर्ष 60 ग्राम, दूसरे वर्ष 100 ग्राम तथा तीसरे वर्ष 180 ग्राम के लगभग केसर प्राप्त होती है केसर एक बेशकीमती फूल है।

इसका मूल्य 15 हजार से 20 हजार रूपये प्रति किलोग्राम तक है। केसर के फूल चुनने में काफी सावधानी व सतर्कता से काम लेना पड़ता है। फूल चुनने के बाद उसे सुखाया जाता है। बाद में इसकी पंखुड़ियों को अलग किया जाता है। पंखुडियों का अगला हिस्सा लाल रंग का होता है, यही असली केसर है। पिछला हिस्सा सफेद होता है। इसे दोयम दर्जे की केसर समझा जाता है।

विश्व में केसर के सर्वाधिक उत्पादन के साथ सर्वाधिक खपत भी भारत में ही होती है। यहां स्पेन से केसर का आयात किया जाता है किन्तु स्पेन की केसर गुणवत्ता में भारतीय केसर का मुकाबला नहीं कर सकती।चंूकि केसर एक मूल्यवान वस्तु है, अतः इसमें मिलावट की जाने की प्रवृति प्रारंभ से ही रही है। प्राचीन काल में केसर में मिलावट करने वालों के प्रति शासन द्वारा कठोर रूख अख्तियार किया जाता था

तथा उनके लिए सख्त सजाओं का प्रावधान था। न्यूरेम्बर्ग में केसर में मिलावट का अपराध करने वालों को मिलावटी केसर के साथ जिंदा जला दिया जाता था। जहां तक असली केसर की पहचान का प्रश्न है, यह एक कठिन बात है किन्तु फिर भी असली केसर की नोक दो भागो में विभक्त होती है।

असली केसर को चूने के साथ मसला जाये तो चूने का रंग केसरिया हो जाता है। इसके अतिरिक्त असली केसर पानी में घुल जाता है।
वर्तमान में शासकीय स्तरपर केसर की खेती को प्रोत्साहन व संरक्षण प्रदान किया जा रहा है, जिसके चलते निकट भविष्य में केसर का उत्पादन बढ़ने की अच्छी संभावनाएं हैं।

Benefits of Patanjali Kesar (Saffron) | केसर के फ़ायदे | Kesar Benefits In Hindi

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