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सफरनामा-सर्कस-का

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‘सर्कस‘ का नाम सुनते ही जो प्रतिबिंब दिमाग में उभरता है, वह है एक विशालकाय तम्बू में जमा हजारों दर्शकों की भीड़, जगमगाती सर्च लाईटें, जांबाज कलाकारों के हैरत अंगेज करतबों पर बजती तालियों की गड़गड़ाहट, जंगली जानवरों के दिल दहला देने वाले कारनामे और अजीबोगरीब वेशभूषा पहने जोकरों के मसखरी भरे अंदाज! लेकिन सर्कस के कारवां को इस मुकाम तक पहुंचाने से पहले मीलों लम्बा सफर तय करना पड़ा है।
सर्कस का इतिहास बहुत पुराना है। आज से कोई ढाई हजार साल पहले प्राचीन रोम के पेलेटाइन और एक्वंेटाईन नामक पहाड़ियों के बीच स्थित विशाल मैदान में रोमन सम्राट तारकिनियस प्रिक्सक ने मुक्केबाजी और दौड़ की प्रतियोगिताओं का विशाल सार्वजनिक प्रदर्शन आयोजित किया। दरअसल इस आयोजन का मूल उद्देश्य ‘एपियोलस‘ नगर पर कब्जा करने का जश्न मनाना था। इस कार्यक्रम को लोगों ने बेहद पसंद किया। आयोजन की सफलता व लोकप्रियता से प्रभावित होकर सम्राट ने इस स्थान पर स्टेडियम की शक्ल की एक विशाल इमारत बनवा दी और वहां नियमित रूप से ऐसे कार्यक्रम आयोजित किये जाने लगे। इस स्थान का नाम ‘सर्कस मेक्सिमस‘ रखा गया। वह 1857 फुट लम्बाई और 625 फुट चैड़ाई में स्थित था। पश्चातवर्ती सम्राट जूलियस सीजर ने इस कार्य में गहरी दिलचस्पी लेते हुए इसका पुननिर्माण करवाया और इसमें डेढ़ लाख लोगों के बैठने की व्यवस्था करवा दी।
इसी तर्ज पर अन्य कई सर्कस उस युग में बने। ईसा पूर्व 221 में बने सर्कस फेमिनियस, सर्कस नीरोनिस तथा ईसा पूर्व 311 में बने सर्कस मेक्सेटियस उनमें उल्लेखनीय नाम हैं।
अपने शुरूआती दौर में सर्कस महज राजाओं, सम्राटों और सामंतों के वैभव व ऐश्वर्य-प्रदर्शन का माध्यम-भर था, जो किसी शुभ अवसर या जीत का जश्न मनाने के लिए तमाशे के रूप में आयोजित किये जाते थे। कभी-कभी तो यहां होने वाले तमाशे क्रूरता और निर्ममता की सभी सीमाएं लांघ जाते थे। सम्राट हैडियन ने अपने जन्म दिन पर आयोजित तमाशे में एक हजार पशुओं का कू्ररतापूर्वक सामूहिक वध करवाया। सम्राट नीरो अपने ईसाई शत्रुओं को जंगली जानवरों के सामने डलवाकर पाशविक तरीके से आनन्दित होता था। उस समय सर्कस अमीरों के ऐशगाह बन चुके थे और वहां अय्याशी और आनंद का सारा समान मुहैया था। एक रोमन सम्राट प्रति वर्ष सैंकड़ों नग्न सुन्दरियों के नृत्य का कार्यक्रम आयोजित करवाता थां उस दिन खुल कर शराब पी जाती और सभी प्रकार के अनैतिक व्यापार खुलेआम होते थे। एक अन्य सम्राट को सामूहिक संभोग के कार्यक्रम आयोजित करवाने में आनंद आता था। सैंकड़ों जोड़े स्त्री-पुरूष वहां एकत्रित होते और रातभर खुले तौर पर विभिन्न प्रकार से रति क्रियाएं की जाती थीं। इस अवसर पर सम्राट विशेष रूप से उपस्थित रहते थे।
रोम में सर्कस के समानान्तर ‘रोम एम्फीथिएटर‘ नामक संस्था भी विकसित हो रही थी, जहां सशुल्क आदमी और जानवरों का मुकाबला प्रदर्शन के लिए आयोजित किया जाता था। धीरे-धीरे एम्फीथिएटर में सर्कस के तत्वों का समावेश होने लगा। फिलिप एस्टले द्वारा ‘सर्कस एम्फीथिएटर‘ के नाम से आधुनिक व्यावसायिक सर्कस की स्थापना की गयी। अपने व्यावसायिक गुणों और पेशेवर प्रदर्शन के कारण यह सर्कस काफी लोकप्रिय हुआ।
बाद में, एस्टले ने 1782 में ‘रायल सर्कस‘ शुरू किया। इसमें तने हुए रस्से पर चमत्कारिक प्रदर्शन, बाजीगरी, व्यायाम, जादू आदि तत्वों को भी सम्मिलित किया गया। इसके बाद तो सर्कस का जादू एशिया, अमेरिका, यूरोप और दुनिया के तमाम देशों में तीव्र गति से फैलता चला गया। भारत में सर्कस की शुरूआत तकरीबन सवा सौ साल पहले हुई।
आज सर्कस-उद्योग अपने पहले पड़ाव से मीलों आगे है। इस दरमियान सर्कस ने कई आयाम छुए हैं। इस विज्ञान और प्रगति के चलते चक्र से सर्कस भी अछूता नहीं रहा है। समय और युग की मांग के अनुरूप सर्कस में कई प्रयोग किये गये हैं।
सर्कस की लोकप्रियता का भी एक युग रहा है। किंतु इधर सिनेमा, दूरदर्शन और वीडियो क्रांति के चलते सर्कस की लोकप्रियता में काफी गिरावट आयी है और यह संस्था आज लगभग अपने पतन के छोर पर खड़ी है। चूंकि सर्कस के समूचे रख-रखाव में एक बहुत बड़ी राशि खर्च होती है और उस अनुपात में आज दर्शक है नहीं। इसके अलावा यह प्राकृतिक आपदाओं को झेलने के लिए भी अभिशप्त है। यही वजह है कि कई बड़े सर्कस घाटे में चल रहे हैं और बन्द होने की कगार पर हैं, इस जीवंत कला को मरने से बचाने के लिए सरकारी संरक्षण आवश्यक है। प्रशासन के अतिरिक्त सर्कस के प्रति जनसाधारण की रूचि फिर से जगाने के लिए भी प्रयास किये जाने चाहिए, ताकि इस प्राचीन धरोहर को बचाया जा सके।