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सचमुच महान कलाकार थे गुरुदत्त

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गुरुदत्त एक भावुक और अत्यंत संवेदनशील कलाकार थे। आज उनकी मौत के छ : दशक से ज्यादा के समय बाद भी फिल्म-जगत में उनकी उपलब्धियों को आदर के साथ याद किया जाता है और सराहा जाता है। यों तो गुरुदत्त ने कई फिल्मों में अभिनय किया, किंतु फिल्म ‘प्यासा‘ गुरुदत्त के कैरियर की सर्वाधिक महत्वाकांक्षी फिल्म थी।
गुरुदत्त को सिने-जगत में प्रवेश सन् 1945 में मिला, जब उन्होंने ‘लाखा रानी‘ नामक फिल्म में एक सहायक भूमिका अदा की । गुरुदत्त ने अपनी कला के सृजन का जो सपना बचपन में देखा था, उसे पूरा करने के लिए जब उन्हें ‘सेल्यूलाइड‘ का विराट कैनवास मिला, तो उन्होंने इसका भरपूर लाभ उठाया। बंबई के सिने-जगत के वातावरण के अनुकूल गुरुदत्त ने फिल्म-माध्यम में एक बीच का रास्ता खोज निकाला, जो फिल्मोद्योग की परंपरागत व्यावसायिक शर्तो को पूरा करते हुए भी अपनी कला के खूबसूरत प्रदर्शन की मंजिल तक पहुँच सकता था।
गुरुदत्त की पहली सफल फिल्म थी – ‘बाजी‘, जिसका उन्होंने निर्देशन किया। यह फिल्म बाॅक्स आफिस पर सुपर हिट साबित हुई। ‘बाजी‘ की सामान्य-सी कथा को गुरुदत्त ने अपनी कल्पना-शक्ति के बल पर चैंका देने वाले ‘ट्रीटमेंट‘ दिया। ‘बाजी‘ फिल्म के माध्यम से गुरुदत्त ने हिन्दुस्तानी सिनेमा के नायक की ‘देवदासनुमा‘ छवि को खंडित किया, जो प्यार में असफल होने पर खुद को शराब में डुबो देता है। ‘बाजी‘ का नायक अपनी महबूबा के पिता द्वारा अपमानित करने पर पलायनवादी नही हो जाता, उसकी दुनिया इतनी छोटी नहीं है कि एक झटके में सिमटकर शराब की बोतल में उतर आए। इसके बाद सन 1952 में गुरुदत्त के निर्देशन में एक फिल्म ‘जाल‘ आई, जिसमें ईसाई-चरित्र व समुद्र-तटी लोगों की जीवन-शैली को गुरुदत्त ने कैमरे की आंख से देखने का प्रयास किया।
सन् 1953 में गीताबाली की बहिन द्वारा निर्मित फिल्म ‘बाज‘ नायक के तौर पर गुरुदत्त की प्रथम फिल्म थी, जो सोलहवीं सदी की एक प्रेमकथा पर आधारित थी। सन् 1945 में गुरुदत्त की फार्मूला फिल्म ‘आर-पार‘ रिलीज हुई, जो ओ.पी.नैयर के मादक संगीत एवं नृत्य शैली के अनोखे प्रयोग के कारण चर्चित हुई। यह फिल्म एक अपराध-कथा पर आधारित थी।
गुरुदत्त के अनवरत फिल्मी सफर के दौरान सन 1955 में उनकी एक काॅमेडी फिल्म ‘मिस्टर एण्ड मिसेज‘ आई, जो व्यंग्य के माध्यम से विवाह संस्था, तलाक तथा महिलाओं की समस्या को छूती थी। सन 1956 में गुरुदत्त की दो फिल्में क्रमशः ‘सी.आई.डी.‘ और ‘सैलाब‘ आई।
‘प्यासा‘ गुरुदत्त की सबसे महत्वपूर्ण एवं सफलतम फिल्म थी। यह 1957 में रिलीज हुई। अपने निर्देशन में बनने वाली इस फिल्म में गुरुदत्त बतौर नायक दिलीपकुमार को लेना चाहते थे। किंतु समयाभाव के कारण जब दिलीप साहब ने इंकार कर दिया तो स्वयं गुरुदत्त ने इस फिल्म के नायक शायर विजय की भूमिका अभिनीत की और इस खूबी से की कि शायर विजय की भूमिका को अमर कर दिया। यह फिल्म एक ऐसे कोमल हृदय कवि की संघर्ष गाथा थी, जो सारी दुनिया से अकेले संघर्ष करता है, चुपचाप, बिल्कुल खामोश तरीके से। जिसने टूटने की हद तक गरीबी को बर्दाश्त किया, फिर महबूबा की बेवफाई को झेला, ‘प्यासा‘ का वह कुंठित कवि उन हालात में भी क्रान्ति की मशाल नहीं थामता, उसका उद्देश्य मात्र जन-चेतना जागृत करना है। इस फिल्म में गुरुदत्त ने मानवीय संवेदना को बहुत दक्षता के साथ पर्दे पर उकेरा है। ‘प्यासा‘ की सफलता में अबरार अलवी के भावुक और सशक्त संवादों एवं साहिर की जज्बाती शायरी का भी अपना योगदान रहा। एस.डी.बर्मन की मधुर धुनों का योगदान भी उल्लेखनीय रहा। ‘प्यासा‘ ने जहां गुरुदत्त को एक भावुक व परिपक्व फिल्मकार के रूप में स्थापित किया, वहीं इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि उनकी इस देश की सामाजिक जीवन-शैली एवं पारिवारिक मर्यादाओं पर बहुत मजबूत पकड़ है। सन 1958 में गुरुदत्त की एक और औसत फिल्म ‘12 ओ ब्लाक‘ आई। इसके पश्चात 1959 में गुरुदत्त ने ‘कागज के फूल‘ नाम से भारत की पहली सिनेमा-स्कोप फिल्म पेश की। कहा जाता है कि फिल्म ‘कागज के फूल‘ में गुरुदत्त ने अपनी आत्मकथा का फिल्माकंन किया था। यह फिल्म बाॅक्स आफिस पर बुरी तरह पिटी, जिसके कारण गुरुदत्त आर्थिक व मानसिक रूप से टूट गए।
सन 1960 में गुरुदत्त की एक और कामयाब संगीत-प्रधान फिल्म ‘चैदहवीं का चांद‘ आई। यह एक जज्बाती नवाब के असफल प्रेम की करूण कथा थी, जिसका झरने की तरह पवित्र प्यार सामाजिक रूढ़िवाद का शिकार होकर रह जाता है। फिल्म का नायक अंत में अंगूठी का हीरा चूसकर आत्मघात कर लेता है।
सन 1962 में ‘साहब, बीवी और गुलाम‘ के रूप में गुरुदत्त ने जो फिल्म पेश की वह निर्माण के क्षेत्र में आज भी ऐतिहासिक दस्तावेज है। विमल मित्र के बंगला उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में 19वीं शताब्दी के सांमती माहौल का फिल्माकंन किया गया। छोटी बहू की भूमिका में मीनाकुमारी का वह विद्रोही अभिनय देखते ही बनता है। इस फिल्म में गुरुदत्त ने भूतनाथ की भूमिका की थी। औरत और शराब में डूबे छोटी बहू के पति का प्यार जब छोटी बहू को नहीं मिल पाता है, तो वह बगावत करती है और उसकी बगावत शराब के प्यालों तक आ पहुंचती है।
इसके बाद सन 1962 में गुरुदत्त की ‘सौतेला भाई‘ फिल्म आई। सन 1963 में क्रमशः ‘बहूरानी‘ व ‘भरोसा‘ व 1964 में क्रमशः ‘सांझ और सवेरा‘ तथा ‘सुहागन‘ आई। गुरुदत्त जहां एक कुशल निर्माता, निर्देशक व अभिनेता थे, वहीं एक भले इंसान भी थे। उन्होंने अपनी निर्माण संस्था ‘गुरुदत्त फिल्म्स‘ के माध्यम से कई नए प्रतिभावान कलाकारों को अपनी फिल्मों में अवसर प्रदान किया। वहीदा रहमान, जानी वाॅकर, और रहमान को उन्होंने अनुबंधित किया।
गुरुदत्त जब ‘बाजी‘ बना रहे थे, तब गीताराय के संपर्क में आए और उनसे विवाह कर लिया। बाद में, जब वहीदा रहमान से गुरुदत्त के जज्बाती रिश्ते बढ़ गए, तो उनके वैवाहिक जीवन में दरार पड़ गई। इसी मानसिक परेशानी व तनाव के दौर में गुरुदत्त बेहताशा शराब पीने लगे व नींद की गोलियां खाने लगे 1962 में नींद की गोलियां अधिक खा लेने के कारण उनकी हालत गंभीर हो गई। किंतु डाक्टरों के अथक प्रयासों से वह चमत्कारिक ढंग से बचा लिए गए। लेकिन जब यही हादसा 1964 में दोहराया गया तो लाख प्रयासों के बावजूद उनकी जीवन-रक्षा न की जा सकी व 10 अक्तूबर, 1964 को इस महान प्रतिभाशाली फिल्मकार का 39 वर्ष की अल्पायु में देहावसान हो गया। गुरुदत्त एक हरफनमौला अदाकार थे, जो तेज रफ्तार के हामी थे।