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राष्ट्रकवि रामधारीसिंह ‘दिनकर’

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राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारीसिंह ‘दिनकर‘ को आमतौर पर एक प्रखर राष्ट्रवादी एवं ओजस्वी कवि के रूप में जाना जाता है। किंतु वस्तुतः दिनकर का व्यक्तित्व बहु-आयामी था। कवि के अतिरिक्त वह एक यशस्वी गद्यकार, निर्लिप्त समीक्षक, मौलिक चिंतक, श्रेष्ठ दार्शनिक, सौम्य विचारक और सबसे बढ़कर एक बहुत ही संवेदनशील इंसान भी थे।
दिनकर की सृजनशीलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि कई ‘वादों‘ और ‘खेमों‘ के दौर से गुजरती हुई उनकी सृजन-यात्रा न तो किसी ‘वाद‘ में बंधी और न ही किसी खास पड़ाव पर ठहरी। दिनकर की कविता का मुख्य स्वर आदि से अंत तक केवल मानवतावादी रहा । छायावाद, प्रयोगवाद और प्रगतिवाद का अभ्युदय उस दौर की धमाकेदार घटनाएं थीं। किंतु दिनकर इन सबसे न केवल अप्रभावित रहे, बल्कि तटस्थ भाव से सृजन को एक सर्वथा नई दिशा देते रहे। दिनकर छायावादोत्तर काल के बाद सबसे के महत्वपूर्ण, प्रतिभा-सम्पन्न तथा विचारशील कवि थे। मैथिलीशरण गुप्त, पंत, निराला, प्रसाद, महादेवी वर्मा, बच्चन, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल‘ और नरेंद्र शर्मा जैसे कवियों की श्रंृखला में दिनकर ने अपने रचना-धर्म से एक विशिष्ठ स्थान बनाया।
वस्तुतः दिनकर की कविता एक पौरूष काव्य है, जिसे पढ़-सुनकर अंदर एक आग-सी धधकने लगती है, उनकी कविता में ठुमक-ठुमककर चलने की नजाकत नहीं है, बल्कि एक रफ्तार है, जो जीवन को गति देती है। दिनकर ने हिंदी कविता को नारी-सौंदर्य, फूल, तितलियां, आकाश में जगमगाते सितारे, सावन की फुहारें आदि के शाब्दिक स्वप्न-लोक से बाहर निकालकर पौरूष के सिंह-नाद की गर्जन से भरे नए मुहावरे दिए। ठंडी शीतल और स्निग्ध हिंदी कविता के आंचल में उन्होनें जिंदगी की सच्चाईयों के धधकते अंगारे रख दिए। दिनकर के शब्दों के तेज, ओजस्विता, प्रखरता और साहस ने हिंदी कविता को एक नई छवि और गरिमा दी।
सामाजिक दायित्व-बोध की प्रेरणा हमेशा दिनकर के साथ रही। कविता को आम आदमी की जरूरतों और समस्याओं का आइनेदार बनाना दिनकर की लेखनी का धर्म बना रहा। उनकी कविता के सामान्यजन की पीड़ा को शब्द दिएः
‘रोटी दो, मत गीत दो,
जिसको भूख लगी है,
भूखों में दर्शन उभारना
छल है, दगा है, ठगी है।
रोटी और वसन
ये जीवन के सोपान प्रथम हैं।‘
दिनकर की रचना-धर्मिता में उभरा सतत संघर्ष का भाव कहीं से भी ओढ़ा हुआ नहीं लगता। कवि बनना उनके अभावग्रस्त और संघर्षशील जीवन का यथार्थ था। उनका जन्म 23 सितम्बर, 1908 को मुंगेर जिले के सिमरिया घाट नामक एक छोटे-से गांव में हुआ। उन्होंने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष संकटों से जूझते हुए गुजारे। 1924 में सोलह वर्ष की आयु में उनकी प्रथम रचना प्रकाशित हुई। बाद में किशोर-वय में रचित दिनकर की रचनाओं का संकलन ‘रेणुका‘ नाम से प्रकाशित भी हुआ। उस युग की रचनाओं में देश की तात्कालीन परिस्थितियों के प्रति किशोर-मन का आक्रोश और कुछ न कर पाने की निराशा साफ झलकती हैः

‘युग-युग होता जाएगा,
अभिनय यह हास-रूदन का,
कुछ मिट्टी से ही होगा,
नित मोल मधुर जीवन का।‘
1932 में दिनकर ने एक शिक्षक के रूप में अपने जीवन का आंरभ किया। इसके बाद आप बिहार सरकार के अधीन सब रजिस्ट्रार पद पर पदस्थ हुए तथा 1952 तक वहां कार्यरत रहे। इसके बाद आपको राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया। 1964 में राज्य सभा से त्यागपत्र देकर आप भागलपुर (बिहार) विश्व-विद्यालय के उप-कुलपति बने।
दिनकर कहीं भी रहे, किंतु उनकी सृजनशीलता में कभी कोई अवरोध नहीं आया। उनकी तीन दर्जन से अधिक प्रकाशित पुस्तकें स्वयं उनकी सतत सृजनशीलता का उदाहरण हैं। उनकी काव्य-कृतियों में रेणुका, हुंकार, रसवंती, रश्मिरथी, कुरूक्षेत्र और उर्वशी उल्लेखनीय हैं। लेखक के रूप में दिनकर अन्वेषक और एक मौलिक सूक्तिकार हैं। पंत, प्रसाद और मैथिलीशरण,’ ‘अर्द्धनारीश्वर‘, ‘वेणुबन‘, ‘वटपीपल‘ आदि कृतियांे में हमें दिनकर एक प्रखर चिंतक, प्रतिभाशाली समीक्षक और गंभीर अध्येता के रूप में नजर आते हैं।
‘उर्वशी‘ दिनकर की सर्वाधिक लोकप्रिय रचना रही है, जिसे भारतीय मनीषा का गौरव-ग्रंथ कहा जा सकता है। जहां ‘कुरूक्षेत्र‘ दिनकर का विचार-काव्य था, वहीं ‘उर्वशी‘ कविता संपूर्ण दार्शनिकता का वहन करने बावजूद शुद्ध कविता है। उर्वशी में दिनकर के दर्शन का स्पष्ट प्रभाव होने के बावूजद वह सरल बोधगम्य रही तो यह केवल दिनकर की निजी प्रतिभा का ही चमत्कार है। ‘उर्वशी‘ का प्रकाशन सन 1961 मंे हुआ, तो हिंदी साहित्य-जगत में यह बहुत चर्चित हुई। इसके प्रकाशन पर डा0 हरिवंशराय बच्चन ने कहा था – ‘खड़ी बोली हिंदी कविता की क्षमता जिस चरम-बिंदु को छू सकती थी, उसे ‘उर्वशी‘ ने छू लिया है और ‘न भूतो‘ में निःसंकोच कहना चाहंूगा। हिंदी के उज्जवल भविष्य की कल्पना मेरे मन मे न होती तो कहता – न भविष्यति!‘
जैसा कि स्वाभाविक था, ‘उर्वशी‘ को भारतीय साहित्य के सर्वोत्कृष्ट पुरस्कार ‘भारतीय ज्ञान पीठ पुरस्कार‘ से सम्मानित किया गया। इस कालजयी कृति के रचियता रामधारी सिंह दिनकर ने ज्ञानपीठ द्वारा आयोजित समारोह में कहा था –
‘लगता है, इस धरती पर आने से पूर्व जब मैं भगवान को प्रणाम करने गया, तब वे कलाकारों के बीच छैनी, टांकी, कंूची, हथौड़ी, और रंग बांट रहे थे। लेकिन भगवान ने मुझे छैनी, टांकी, हथौड़ी नहीं दी, जो पच्चीकारी के औजार हैं। उनके भंडार में एक हथौड़ा पड़ा हुआ था। वहीं उठाकर मुझे दे दिया कि जा, तू इस हथौड़े से चट्टान को तोड़ेगा और तोड़े हुए अनगिनत पत्थर भी काल के समुद्र में फूल के समान तैरेंगे। लगता है, जब मैं हथौड़ा लेकर चला, तो छैनी और टांकी की ओर मुड़-मुड़कर लोभ से देख रहा था। यह लोभ मुझे जीवन-भर सताता रहा है और मैं जीवन-भर असमंजस में पड़ा रहा कि कविता का वास्तविक प्रयोजन क्या है?‘
वस्तुतः दिनकर का अंर्तद्वंद यह था कि मैं काव्य को सौंदर्य की रस धाराओं से सींचूं या इसकी शिराओं को गर्म लहू से भर दूं। कभी दिनकर कहते हैंः
‘अमृतगीत तुम रचो कलानिधि,
बुनो कल्पना की जाली,
तिमिर ज्योति की समर-भूमि का
मैं चारण वेताली!‘
या कभी दिनकर आत्मविश्वास की मुद्रा में सहजता से कहते हैं:
‘उर्वशी, अपने समय का सूर्य हूं मैं!‘