RAJKUMAR

फिल्मी दुनिया के मुहावरे बदलने वाले राजकुमार

RAJKUMAR


राजकुमार को हमसे अलविदा हुए एक अर्सा बीत गया। उनकी मृत्यु के साथ ही हिन्दी सिनेमा के एक मिथक का अंत हो गया। संवाद-अदायगी की अनूठी शैली ईजाद करने वाले नाटकीय अभिनय के बेताज बादशाह राजकुमार ने कई दशकों तक दर्शको के दिलों पर राज किया। उनका अपना एक अलग दर्शक-वर्ग था, जो उनकी हर अदा का प्रशंसक था और उनके हर संवाद पर सिनेमा हाॅल को तालियों से गूंजा देता था। यह अहसास सचमुच दुखदायी है कि आज वे हमारे बीच मौजूद नहीं हैं।
उन्होंने अपना फिल्मी कैरियर फिल्म ‘रंगीली‘ से शुरू किया। राजकुमार के फिल्मी सफर में फिल्म ‘तिरंगा‘ (1993) तक बेहद रोमांचक उतार-चढ़ाव आए। फिर भी उन्होंने अपना समूचा फिल्मी सफर अपनी शर्तो पर तय किया। पचास से नब्बे के दशक तक आते-आते न केवल फिल्मोद्योग के, बल्कि समग्र समाज के स्थापित जीवन-मूल्यों और तौर-तरीकों में आधारभूत बदलाव आ गया। किन्तु वक्त का यह लम्बा कालखण्ड जीवन-पर्यन्त न तो राजकुमार के अंदाज बदल सका और न उनके तौर-तरीकों में ही कोई फर्क ला सका। राजकुमार आखरी सांस तक सिर्फ ‘राजकुमार‘ रहे, तो यह तथ्य इस बात को रेखांकित करता है कि उनके लिए ‘समय के साथ सब कुछ बदलने‘ या ‘वक्त की हर शै गुलाम‘ जैसे मुहावरे चस्पा नहीं किये जा सकते थे। मुहावरों के मायनों को बदलने की यह फितरत ही शायद राजकुमार की सबसे बड़ी ताकत थी।
अपने संवाद बोलने के अंदाज के दम पर राजकुमार ने दिलीप-राजकपूर-देवानंद की तिकड़ी के स्वर्णिम काल में भी अपने लिए एक खास मुकाम हासिल किया। ‘टेªजेडी किंग‘ के रूप में अपने चर्मोत्कर्ष पर पहुंचे दिलीप कुमार के लिए ‘पैगाम‘ (1959) में राजकुमार की चुनौती इतनी भारी पड़ी थी कि ‘जानी‘ के साथ दिलीप कुमार की दूसरी फिल्म ‘सौदागर‘ (1991) के लिए दर्शकों को पूरे बŸाीस साल तक इंतजार करना पड़ा। दिलीप कुमार से राजकुमार की तुलना सिने-जगत् की एक सनातन परम्परा रही है। उम्र के उस मुकाम पर जहां स्थितियां लगभग स्थिर हो जाती हैं, ऐसे में जब हम निर्लिप्त भाव से पीछे बहुत दूर तक देखने की कोशिश करते हैं, तो पाते हैं कि राजकुमार के अभिनय और अंदाज की आभा अलग व विशिष्ट है, कुछ खास है। राजकुमार किसी भी भूमिका में उतरने के बाद भी सिर्फ और सिर्फ ‘राजकुमार‘ नजर आते थे। ‘नीलकमल‘ के मूर्तिकार ‘चित्रसेन‘, ‘वक्त‘, ‘काजल‘ के शराबी, ‘दिल अपना प्रीत पराई‘ के डाक्टर, ‘पाकीजा‘ के ‘आशिक‘, ‘दिल एक मंदिर‘ के कैंसर-रोगी या ‘तिरंगा के बिग्रेडियर होने से पहले वह ‘राजकुमार‘ थे। यह उनके महिमा-मंडित और आभा-मंडल युक्त व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि कोई भी भूमिका या चरित्र उन पर हावी नहीं हो पाता। दर्शक उन्हें डाक्टर, शराबी, फौजी या अन्य किसी भूमिका में देखने सिनेमा-हाल तक नहीं जाते थे, बल्कि वह सिर्फ ‘राजकुमार‘ को देखने व उनके संवाद सुनने जाते थे।

राजकुमार का दरअसल सवांद-अदायगी के माध्यम से अपने अभिनय का सिक्का जमाने वाले अभिनेताओं की उस श्रृंखला की कड़ी थे, जिसके अन्तर्गत पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी जैसे दिग्गज अभिनेता आते हैं। संवाद-अदायगी की विशिष्ट शैली और ‘मैनरिज्म‘ का अपने अभिनय का अहम् हिस्सा बनाने के अपने खतरे हैं।अति-नाटकीय और लाउड हो जाने के इन खतरों को उठाकर भी राजकुमार ने महज अपनी संवाद-शैली के दम पर जो प्रतिष्ठा और लोकप्रियता हासिल की, वह वाकई हैरतअंगेज कर देने वाली है। ‘वक्त‘, ‘हमराज‘, ‘काजल‘, ‘मर्यादा‘, ‘लाल-पत्थर‘, ‘हीर-रांझा‘, ‘पाकीजा‘….. आदि फिल्मों की एक लम्बी फेहरिस्त है, जिन्हें दर्शकों ने महज राजकुमार के संवाद सुनने के लिए बार-बार देखा । यह राजकुमार का ‘मैनरिज्म‘ ही था कि ‘हमराज‘ फिल्म में दर्शक परदे पर उनक सिर्फ सफेद जूते देखकर सिनेमा-हाल को तालियों से गूंजा देते थे।
राजकुमार के समकालीन नायक जिस समय रोमांटिक छवि में कैद होकर नायिकाओ के साथ बाग-बगीचों में गाने गाकर या विरह-वेदना की गिरफ्त में आकर शराब के प्याले में डूब प्रेम की अभिव्यक्ति कर रहे थे, ठीक उसी समय राजकुमार परदे पर प्रेम की नई परिभाषाएं गढ़ रहे थे। प्रेम की सुकोमल भावनाओं को साकार करने के उनके अंदाज वाकई अनोखे थे। यदि हम राजकुमार की फिल्मों को ध्यान से देखें तो लगेगा कि उन्होंने कभी चाकलेटी और छुईमुई नायक की तरह अपनी मोहब्बत का इजहार नहीं किया। प्यार के प्रदर्शन में उनके व्यक्तित्व के खुरदरेपन ने एक अनोखा सम्मोहन पैदा करने का प्रयास किया। फिर चाहे वह ‘नीलकमल‘ का मूर्तिकार हो अथवा ‘पाकीजा‘ का वन-अधिकारी।
‘मदर इण्डिया‘ (1957) राजकुमार के करियर की एक यादगार फिल्म थी। इस फिल्म में उनकी भूमिका जमींदार से शोषित एक त्रस्त और मजबूर किसान की थी। ‘पैगाम‘ (1959) फिल्म आज भी उनके दमदार अभिनय के लिए याद की जाती है। वैसे तो राजकुमार ने नर्गिस, साधना, वहीदा रहमान से लेकर हेमा मालिनी, लीना चंद्रावरकर, पद्मिनी कोल्हापुरे, योगिता बाली आदि तक कई अभिनेत्रियों के साथ काम किया, किन्तु उनकी सबसे अच्छी ‘ट्यूनिंग‘ मीनाकुमारी के साथ थी, जिनके साथ राजकुमार की ‘काजल‘, ‘दिल अपना प्रीत पराई‘, ‘दिल एक मंदिर‘ और ‘पाकीजा‘ जैसी यादगार फिल्में आईं।
यदि बात राजकुमार की हो और उनकी तिलिस्मी शख्सियत, अक्खड़ तबियत, सनकीपन का जिक्र न हो, तो बात अधूरी-सी लगती है। उनकी तुनकमिजाजी के सैंकड़ों किस्से हवाओं में हैं। कहा जाता है, राजकुमार ने फिल्म ‘जंजीर‘ में काम करने से सिर्फ इसलिए इनकार कर दिया था कि उन्हें निर्देशक द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले तेल की गंध नापंसद थी। एक फिल्म पार्टी के दौरान उस समय फिल्मों में अच्छी-खासी ख्याति अर्जित कर चुकी जीनत अमान को देखकर जानी ने बड़ी मासूमियत से उन्हें फिल्मों में कोशिश करने का सुझाव दे डाला। एक बहुत बड़े बैनर की फिल्म उन्होंने महज इसलिए छोड़ दी क्योंकि उसके निर्माता से हाथ मिलाने पर उन्हें उसका हाथ बेहद ठंडा लगा। ‘जाॅनी‘ राजकुमार का तकिया कलाम था। वह हर व्यक्ति को ‘जानी‘ कहकर सम्बोधित करते थे। यह राज बहुत बाद में खुला कि दरअसल ‘जाॅनी‘ उनके कुŸो का नाम है। ऐसे सैंकड़ो किस्से हैं, जो बाकायदा नमक-मिर्च लगाकर बरसों तक परोसे जाते रहे हैं।

अपने ऊपर सनकी या घमंडी होने के इन आरोपों के बारे में राजकुमार कहते थे- ‘दरअसल में विनोदप्रिय व्यक्ति हूं। इसलिए मेरी प्रतिक्रियाएं अक्सर हास्य-प्रधान हो जाती हैं। उनमें किसी के प्रति कोई दुर्भावना कभी नहीं होती। लेकिन शायद लोगों को हमारी बातें हजम नहीं हो पातीं और वे बुरा मान जाते हैं।‘
राजकुमार खुद स्वीकार करते थे कि वह अंतर्मुखी स्वभाव के एकांतप्रिय व्यक्ति हैं और उन्हें लोगों से मिलना-जुलना पसंद नहीं है। उनका कहना था कि प्रायः उनके आत्म-विश्वास और अंतर्मुखी स्वभाव को घमंड समझ लिया जाता है। जिंदगी से उन्हें कोई शिकवा-शिकायत नहीं रही, गम या अफसोस पालना उनकी फितरत में शामिल में नहीं था।
राजकुमार का असली नाम पंडित कूलभूषण था। उनका जन्म बलूचिस्तान (अब पाकिस्तान) में हुआ तथा शिक्षा क्वेटा, रावलपिंडी, लाहौर और दिल्ली में हुई। वह एक बहुत बड़े सरकारी अफसर के बेटे थे। दिल्ली में पढ़ाई खत्म करने के बाद, आॅक्सफोर्ड जाने की तैयारी के सिलसिले में अपने चाचा के पास मुम्बई आ गए।
इस बीच उनके पिता का निधन हो गया। राजकुमार ने ‘सब-इन्सपेक्टर‘ की नौकरी के लिए आवेदन किया और उन्हें नौकरी मिल गई। अचानक उन्हें फिल्मों में काम करने का आॅफर मिला। वह बड़ी मुश्किल से राजी हुए और वह भी अपनी शर्तों पर।
हर काम अपनी शर्त पर करने की उनकी पुरानी आदत आखिर तक बरकार रही। साल में एक या दो फिल्में ही करते थे। फिल्म फ्लाप हो या हिट, हर बार अपने दाम बढ़ा देते थे। गर्मियों में अप्रैल से जून तक शूटिंग नहीं करते थे। आज जब पूरी फिल्म इंडस्ट्री के तकरीबन सभी सितारे प्रचार और प्रसिद्धि पाने के लिए सुनियोजित रूप से प्रचार अभियान चलाते हैं और उनके पी.आर.ओ. फिल्म पत्र-पत्रिकाओं के चक्कर लगाते हैं, ऐसे में राजकुमार कहते थे कि मैं कोई किराने की दुकान नहीं, जो विज्ञापन या प्रचार के दम पर चलती हो और यह सचमुच हैरतअंगेज बात है कि बिना प्रचार के भी राजकुमार की लोकप्रियता की चमक फीकी नहीं पड़ी। पचास के दशक में उनकी अदाकारी पर फिदा होने वाले लोेगों का एक हुजूम मौजूद था और नब्बे के दशक में भी उनके संवादों पर तालियां बजाने वाले दर्शक वह भी नौजवान पीढ़ी के, अच्छी-खासी तादाद में मौजूद रहे।
राजकुमार ने अपनी व्यक्तिगत अहन्मयता-युक्त जीवन-शैली का बेहद उम्दा तरीके से व्यावसायिक इस्तेमाल किया। उनकी घमण्डी, सनकी और मनमौजी व्यक्ति की छवि का उपयोग परदे पर एक अनोखा चरित्र रचने की चुनौतियों के साथ फिल्मकारों ने किया। अपनी तमाम खामियों, सनकों और शर्तों के बावजूद फिल्मकारों के लिए राजकुमार हमेशा जरूरी रहे क्योंकि राजकुमार का ‘मैनरिज्म‘ का, उनका संवाद-अदायगी का कोई विकल्प दरअसल कभी रहा ही नहीं। एक बेहतर अदाकार तो वे थे ही।
मुहावरों के अर्थ और फिल्मी जगत के व्यावसायिक समीकरणों को अपनी शर्तो पर बदलने वाले राजकुमार की मृत्यु के बाद फिल्म उद्योग इस अनोखे इंसान और अपनी शर्तो पर काम करने वाले अभिनेता से सदैव के लिए वंचित हो गई। राजकुमार का निधन नींद में ही हुआ। इस तरह आरामदेह मौत उन्हें मिली, जो बहुत कम लोगों को नसीब होती है। एक बार उन्होंने कहा था – ‘जब मैं मौत चाहंूगा, तो वही मेरे लिए जीवन होगी।‘