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सावधान ! खतरनाक है रैबीज़ |Rabies Information in Hindi

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Rabies Information in Hindi

परिचय – रैबीज के बारे में जानकारी

रैबीज़ एक जानलेवा खतरनाक बीमारी है, जो जंगली मांसाहारी स्तनपायी पशुओं को होती है। भेड़ियों, सियारों, नेवलों, और भालूओं में होने वाली यह बीमारी सबसे खतरनाक रूप से कुत्तो द्वारा फैलती है। जब किसी कुत्तो को रैबीज से ग्रस्त किसी जानवर द्वारा काट लिया जाता है, तो जख्म के जरिये वायरस कीटाणु कुत्तोके शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं। बीस से साठ दिन की अवधि में कुत्तोमें रैबीज के लक्षण प्रकट होने लगते है।

कुत्तो में दो प्रकार की रैबीज़ होती है – उत्तेजक तथा मूक ।उत्तेजक जक रैबीज़ से ग्रस्त कुत्ता बिना किसी कारण भौंकता तथा दौड़ता रहता है। अकारण हमलावर हो जाता है तथा लकड़ी, मिट्टी, घास आदि खाने लगता है। यह लक्षण प्रकट होने के अधिकतम पांच दिन की अवधि में कुत्तो की मृत्यु हो जाती है। मूक रैबीज़ में कुत्तो अनमना-सा हो जाता है और किसी अंधेरे और एकांत स्थान पर अर्द्ध-चेतन अवस्था में पड़ा – पड़ा तीन-चार दिन में मर जाता है। रैबीज़ के वायरस मुख्यतः कुत्तो की लार में पाए जाते हैं।

रैबीज कुत्तो में दो प्रकार से

भारत में 98 प्रतिशत के लगभग रैबीज़ के रोगी कुत्तोद्वारा काटे जाने के कारण रोग-ग्रस्त होते हैं। मनुष्य के शरीर में रैबीज़ के विषाणु कुत्तो की लार द्वारा प्रविष्ट होते हैं। कुत्तोके काटने के अलावा किसी कटे अथवा छिले हुए घाव पर उसकी लार पड़ने अथवा वायु-संक्रमण से भी यह रोग हो सकता है। इस रोग के वायरस की आकृति अति सूक्ष्म होती है। ये केवल ‘अल्ट्रा‘ सूक्ष्म दर्शक यंत्र की मदद से ही देखे जा सकते हैं।
किसी रैबीज-ग्रस्त पागल कुत्तोके काटने पर उसकी लार में व्याप्त विषाणु वायरस जख्म में होकर शरीर में घुसते हैं तथा नाड़ी-संस्थान के माध्यम से ‘स्लाईवरी‘ नामक ग्रंथि में जमा हो जाते हैं। रक्त के प्रवाह के जरिए तंत्रिकाएं इन्हें मस्तिष्क तक पहुचाती हैं।

कुत्तोके काटने का जख्म मस्तिष्क के जितना पास होगा, रोग के लक्षण उतने ही अधिक जल्दी प्रकट होंगे। रोगी के थूक और लार में भी वायरस पैदा हो जाते हैं। अतः इस संबंध में सावधानी बरतनी आवश्यक हैं।
मनुष्य में रैबीज़ के लक्षण एकाएक प्रकट नहीं होते। इसमें एक से तीन महीने तक का समय लग सकता है। इस रोग के प्रारंभिक लक्षणों में बुखार, सिरदर्द, तथा बदन का अकड़ना शामिल है। ज़ख्म के स्थान पर असहनीय पीड़ा होती है। नाड़ी तेज गति से चलने लगती है। शरीर के तापमान में वृद्धि हो जाती है, जो निरंतर बनी रहती है। उसके बाद दौरे पड़ने, हाथ-पांव अकड़ने तथा पुतलियों के फैल जाने की शिकायत होती है। रोगी के मुंह से थूक और फेन निकलने लगता है।

रैबीज़ के लक्षण

रैंबीज़ के रोगी का सबसे महत्वपूर्ण तथा घातक लक्षण है पानी के प्रति उसके मन में भय का संचार होना। पानी गले में जाते ही गला भिंच जाता है। पानी देखते ही रोगी भय से कांपने लगता है। इसे ‘जलातंक‘ अथवा ‘हाइड्रोफ़ोबिया‘ कहा जाता है। इसके कारण आदमी का खाना-पीना छूट जाता है। वह क्रोध, चिड़चिड़ेपन और मौत के डर का शिकार होकर बुरी तरह छटपटाता है। दो-तीन दिनों तक यह पीड़ा भुगतने के बाद अन्ततः रोगी की मृत्यु हो जाती है।
ये लक्षण प्रकट होने के बाद मृत्यु लगभग निश्चित ही होती है। किन्तु यदि समय पर निरोधात्मक कदम उठाए जाएं तथा रोगी का तुरंत उपचार करवाया जाए तो रोगी के बचने की संभावना बढ़ जाती है।

कुत्तो के काटने पर तुरन्त बिना विलंब किए घाव को साबुन का पानी लगाकर कई बार अच्छी तरह धोना चाहिए। चिकित्सक की सहायता मिलने तक जख्म को धोकर उस पर कोई एंटिसेप्टिक क्रीम लगा देनी चाहिए। यदि संभव हो तो घाव को साफ करके उस पर कार्बोलिक एसिड लगा दें।
काटने वाले कुत्तोपर नजर रखंे। यदि कुत्तो पालतू है तो उसके मालिक से जानकारी प्राप्त करें कि उसे रैबीज़ का टीका लगा हुआ है या नहीं? यदि काटने वाले कुत्तो की मृत्यु दस दिनों के अन्दर हो जाती है या उसमें रैबीज़ के लक्षण प्रकट होते हैं तो फौरन डाॅक्टर को बताएं और इलाज प्रारंभ करवाएं।

यदि इन दिनों में कुत्तो की मृत्यु नहीं होती तो अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।मनुष्यों तथा कुत्तो, दोनों के लिए रैबीज़-रोधी टीके उपलब्ध हैं। भारत में इनका निर्माण राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान, कसौली तथा भारतीय पाश्चूयर संस्थान कुनूर में होता है। मांग की अपेक्षा इन टीकों का उत्पादन काफी कम है। इस कारण यह टीके सरलता से उपलब्ध नहीं हो पाते। इनका उत्पादन बढ़ाए जाने के प्रयास जारी हैं।
टीके के अलावा एन्टीरेबिक सीरम का भी उपयोग किया जाता है। इसके एक इंजेक्शन का मूल्य करीब सवा सौ रूपये होता है। इसके कुछ इंजेक्शन लगावाने से लगभग शत-प्रतिशत प्रतिरक्षण हो जाता है। सीरम का प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक मामलों में किया जाता है।

टीके का असर होने में एक से दो सप्ताह का समय लगता है, जबकि सीरम तुरन्त प्रभाव दिखाता है।‘संसर्गजन्य रोग राष्ट्र संस्थान‘ की एक रिपोर्ट के अनुसार रैबीज़ भारत का एक स्थायी रोग है, जो अंडमान-निकोबार और लक्ष्यद्वीप को छोड़कर पूरे देश में व्याप्त है। इस रोग से प्रतिवर्ष करीब पच्चीस हजार लोगों की मृत्यु होती है और कुल मिलाकर 42 लाख मानव दिवस प्रति वर्ष इस रोग के कारण नष्ट होते है।
वस्तुतः रैबीज़ का पूर्ण उन्मूलन असंभव है, इसको केवल नियंत्रित किया जा सकता है क्योंकि प्राणी जगत में रैबीज़ के जहरीले वाॅयरस व्यापक रूप में मौजूद हैं। मनुष्य समेत गर्म खून वाले सभी पशु इस बीमारी के संवाहक हैं।

रैबीज़ के नियंत्रण में उपचार के अतिरिक्त निरोधात्मक उपायों का भी पर्याप्त महत्व है। पालतू कुत्तो को रैबीज़-रोधी टीका लगवाया जाना अनिवार्य बना दिया जाना चाहिए। इसके लिए पर्याप्त मात्रा में टीके उपलब्ध कराना सरकार का उत्तरदायित्व है। आवारा, लावारिस कुत्तो की तेजी से वृद्धि होती संख्या पर नियंत्रण करना भी आवश्यक है। आवारा कुत्तो की समस्या का निराकरण स्थानीय स्तर पर नगरपालिका और नगर निगम अधिक दक्षता से कर सकते हैं।