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पुरुषोतमदास टंडन

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आज जब हर तरफ राष्ट्र नेतृत्व के संकट से मुखातिब है, तब हमें स्वाधीनता आंदोलन याद आता है, जिसने देश को एक-से-एक प्रखर, तेजस्वी, सेवाभावी, राष्ट्रवादी तथा त्यागी नेता प्रदान किए। जीवन के हर क्षेत्र में गुणवŸाा से भरा जो सर्वश्रेष्ठ नेतृत्व उन दिनों देश में उभरा, वह सचमुच अद्वितीय है। आजादी की लड़ाई के उसी दौर में राष्ट्र-सेवा के साथ-साथ राष्ट्र-भाषा हिंदी की सेवा के प्रति समर्पित व्यक्त्वि के रूप में श्री पुरूषोŸामदास टंडन ने देश को नेतृत्व प्रदान किया। पुरूषोŸामदास टंडन ने अपना सम्पूर्ण जीवन देश की आजादी तथा राष्ट्रभाषा हिंदी को समुचित स्थान दिलवाने हेतु होम कर दिया। टंडन जी मूलतः एक उच्चकोटि के समाज-सुधारक थे, जिसे परिस्थितिवश राजनीति में भाग लेना पड़ा।
इलाहाबाद में श्री सालिगराम टंडन के घर में पहली अगस्त, 1882 को बालक पुरूषोŸामदास टंडन का जन्म हुआ। सावन के महीने में जन्म लेने के कारण उनका नाम ‘पुरूषोŸाम दास‘ रखा गया। टंडन जी बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली विद्यार्थी रहे। बारह वर्ष की आयु में मिडिल तथा चैदह वर्ष की अवस्था में मेट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण करने के बाद 1899 में इंटर का इम्तिहान भी उन्होंने अव्वल दर्जे में उतीर्ण किया। अपनी शिक्षा जारी रखते हुए टंडन जी ने म्योर कालेज से 1904 में स्नातक की परीक्षा उतीर्ण की। परिवार वालों के आग्रह पर उन्होंने वकालत की पढ़ाई आरंभ की और 1906 में एल.एल.बी. की डिग्री हासिल की। टंडन जी को शिक्षा के प्रति इतना लगाव था कि उन्होंने इतनी डिग्रियां प्राप्त करने के बाद भी अपना अध्ययन जारी रखा तथा 1907 में एम0 ए0 की उपाधि हासिल की। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद से प्रकाशित ‘अभ्युदय‘ नामक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन भी किया।
अपने विद्यार्थी जीवन के दौरान टंडन जी पूरी संवेदनशीलता के साथ राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े रहे। 1906 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल के विभाजन (बंग-भंग) के विरोध में उन्होंने चीनी का उपयोग छोड़ दिया। इसी प्रकार 1907 में वह चमड़े के जूते छोड़कर खड़ाऊ पहनने लगे।
इतनी शिक्षा प्राप्त करने पश्चात तात्कालीन ब्रिटिश भारत में पुरूषोŸामदास टंडन को आसानी से अच्छी-खासी नौकरी मिल सकती थी। किंतु सिद्वांतवादी टंडन जी ने अंग्रेजो के अधीन नौकरी करना स्वीकार नहीं किया। अंततः जीविका हेतु वकालत को पेशे के तौर पर चुना। नैसर्गिक प्रतिभा कहीं नहीं छुपती। शीघ्र ही पुरूषोŸामदास की गणना इलाहाबाद के उच्चकोटि के वकीलों में की जाने लगी। उन्होंने अपने वकालत-जीवन में कभी भी झूठा मुकदमा नहीं लिया। वह हमेशा सत्य व न्याय के लिए संघर्षरत रहे। अपने इस सिद्धांत के कारण उन्हें अत्यधिक आर्थिक हानि उठानी पड़ी। किंतु उन्होंने कभी भी इस बिंदु पर समझौता नहीं किया।
वकालत करते हुए वह निरंतर स्वाधीनता आंदोलन व सामाजिक गतिविधियों से जुड़े रहे। इस दौरान टंडन जी प्रखर राष्ट्रवादी महामना पंडित मदनमोहन मालवीय के सम्पर्क में आए। मालवीय जी उन दिनों राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए थे। 1910 में वाराणसी में देशभर के हिंदी-प्रेमियों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें टंडनजी ने सक्रिय रूप से हिस्सेदारी की। इसी सम्मेलन में आज के सुप्रसिद्ध ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन‘ की रूपरेखा तैयार की गई। टंडनजी ने इसकी स्थापना कर राष्ट्रभाषा के लम्बे समय से अवरूद्ध विकास को गति प्रदान की। सन 1918 में उन्होंने इलाहाबाद में ‘हिंदी विद्यापीठ‘ नामक संस्था का गठन किया। इसके एक वर्ष उपरांत ही वह इलाहाबाद नगरपालिका के अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
1921 में गांधीजी के आह्यान पर पर टंडन जी स्वाधीनता-आंदोलन में पूर्णतः कूद पड़े तथा गांधीजी के निकटतम सहयोगी के रूप में उनके कार्यो में हाथ बंटाने लगे। राष्ट्रसेवा और राष्ट्र-भाषा हेतु अधिक समय निकालने के उद्देश्य से उन्होनें अपने वकालत के पेशे को भी तिलांजलि दे दी तथा संपूर्ण रूप से देश-सेवा में संलग्न हो गए। 1923 में आप कांग्रेस के गोरखपुर अधिवेशन के सभापति चुन गए। सन 1929 में वह पंजाब केसरी लाला लाजपतराय द्वारा संचालित ‘लोक सेवा मंडल‘ के अध्यक्ष बनाए गए। टंडनजी उŸारप्रदेश की प्रांतीय धारा सभा के अध्यक्ष भी रहे। सन 1930 में उन्होेंने किसान-संघ की स्थापना की। वस्तुतः टंडन जी का व्यक्तित्व इतना बहुआयामी था कि वह एक ही समय में कई कामों को एक साथ बिना किसी दुविधा के सम्पन्न कर सकते थे।
श्री पुरूषोŸामदास टंडन की जीवन-शैली इतनी सरल व सादगी पूर्ण थी कि कोई भी व्यक्ति उन्हें देखकर उनके महान व्यक्तित्व का अनुमान नहीं लगा सकता था। वह हमेशा हाथ से बुनी खादी के वस्त्र पहनते और अत्यंत साधारण किस्म का भोजन करते थे। अपना सारा काम वह स्वयं अपने हाथों से करते थे।
सन 1946 में वह पहली बार उŸारप्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गये। उनके जीवन की सादगी और कार्यो की महानता से प्रभावित होकर 15 अप्रैल, 1948 को सरयू नदी के किनारे एक विशाल समारोह में संत देवरहवा बाबा द्वारा उन्हें ‘राजर्षि‘ की उपाधि से सम्मानित किया गया। इसके बाद वह ‘राजर्षि पुरूषोŸादास टंडन‘ के नाम से विख्यात हुए। सन 1950 में उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष चुना गया।
राजर्षि टंडन जी ने जीवन-भर अपने मूल्यों व सिद्धांतों के लिए सतत संघर्ष किया। हिंदी भाषा के प्रति तो उनका आग्रह इतना जर्बदस्त था कि इस प्रश्न पर उन्होंने गांधीजी के अनुरोध को भी अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपना समूचा जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया।
टंडन जी की अद्वितीय सेवाओं तथा राष्ट्र के प्रति उनकी समर्पण-भावना के प्रति सम्मान प्रदर्शित करते हुए सन् 1960 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्रप्रसाद ने उन्हें इलाहाबाद में ‘राजर्षि टंडन अभिनंदन ग्रंथ‘ भेंट किया, जिसमें उनकी सभी सेवाओं का ससम्मान उल्लेख किया गया था।
1961 में राजर्षि टंडन को राष्ट्र के सर्वोच्च अलंकरण ‘भारत-रत्न‘ से विभूषित किया गया। वस्तुतः वह इस सम्मान के सही हकदार थे। इस अलंकरण से टंडन जी को विभूषित कर पूरे देश ने स्वयं को गौरवान्वित महसूस किया। यह एक कृतज्ञ राष्ट्र का अपने महान महान सपूत के प्रति सम्मान का श्रेष्ठतम प्रदर्शन था।
अपना ‘सब कुछ‘ और ‘सर्वश्रेष्ठ‘ राष्ट्र को दे चुकने के बाद एक जुलाई 1962 को भारतमाता के इस लाड़ले सपूत ने हमेशा के लिए अपनी आंखे मूंद लीं। किंतु उनकी धवल कीर्ति आज भी अमर है और हमेशा रहेगी।
राजर्षि पुरूषोŸामदास टंडन सत्य, न्याय, निष्ठा और त्याग की प्रतिमूर्ति थे। वह एक उच्चकोटि के साहित्यकार, मनीषी, हिंदी के अनन्य उपासक, प्रखर राष्ट्रभक्त, समाज सुधारक, दार्शनिक, चिंतक तथा एक आदर्श राजनेता थे। राष्ट्र सदा उनकी सेवाओं के प्रति उनका ऋणी व आभारी रहेगा।
ऽ कैलाश जैन
एडवोकेट
34, बंदा रोड़ भवानीमण्डी (राज0)