rekhachitra raja rani 1

पुण्य की कीमत | puny ki kimat

rekhachitra raja rani 1
पुण्य की कीमत

सेनापति के धोखे से हारे

बैसवारा राज्य में त्रिलोकचंद नामक एक राजा थे। उनके एक ही पुत्र था। एक बार उनके राज्य पर पड़ौसी राजा ने आक्रमण कर दिया। राजा त्रिलोकचंद ने शत्रु का सामना किया, परन्तु सेनापति के विश्वासघात के कारण पराजित हो गए।

जंगल में रहने लगे राजा

रानी और पुत्र के साथ राजा अपना राज्य छोड़कर भाग गए। जंगल में कुटी बनाकर रहने लगे। राजा जंगल से लकड़ी काटते। उसे बेचकर रानी और पुत्र का पालन करते।

इसी प्रकार कुछ वर्ष बीत गए। गर्मी की ऋतु थी। एक रात जंगल में भीषण आग लग गई। बचने के लिए राजा को किसी शहर की ओर भागना पड़ा। अब शहर में मजदूरी कर, पेट पालने लगे।

अकाल के कारण आये शहर

दुर्भाग्य से उस वर्ष वर्षा नहीं हुईं। भीषण अकाल पड़ गया। ऐसे में राजा त्रिलोकचंद को काम मिलना बंद हो गया। वह रानी और पुत्र को छोड़कर, मजदूरी की खोज में दूसरे शहर की ओर चल दिए। भटकते हुए अपने ही राज्य में जा पहुंचे।

मजदूरी के पैसो से खरीदी रोटियां की दान

वहां राजा ने पूरे दिन मजदूरी की। शाम को जो पैसे मिले, उनसे आटा  खरीदकर चार रोटियां बनाई। दो खाने के बाद शेष दो सुबह के लिए रख ली। सुबह स्नान के बाद, रात की शेष बची रोटियां खाने चले, तभी एक भिखारी आ गया। गिड़गिड़ाकर रोटियां मांगने लगा। राजा को उस पर दया आ गई। दोनों रोटियां उसे दे दी। स्वयं भूखे ही काम पर चल दिए।

नगर सेठ के यहाँ पहुंचे दान-पुण्य बेचने

रास्ते में उन्होंने देखा, नगर सेठ की कोठी पर भीड़ लगी है। उसका नौकर नगाड़ा पीटते हुए चिल्ला रहा है- यहां दान और पुण्य खरीदा जाता है। अपने किए दान-पण्य बेचो। बदले में अशर्फियां ले जाओ।‘ .

राजा ने नगर सेठ के सेवक से पूछा- क्या मैं भी अपने पुण्य बेच सकता हूं?”

सेवक बोला- हां, हां! आइए, सेठ जी से मिलिए।

राजा उसके साथ कोठी के अंदर गए। वहां देखा, एक बड़ा-सा तराजू टंगा है। उसके एक पलड़े पर लोग अपने किए दान-पुण्य, एक परची पर लिखकर रखते है। परचीं के रखते ही पलड़ा झुक जाता है। सेठ दान-पुण्य की परची उठाकर अपनी थैली में डाल लेता है। पुण्य बेचने वाला उसके वजन की अशर्फियां  लेकर चला जाता है।

राजा ने भी एक पलड़े पर अपने किए एक पुण्य की परची लिखकर रखी, पर पलड़ा झुका नहीं। उन्होनें दूसरी परची पर दूसरे पुण्य का विवरण लिखा, परन्तु पलड़ा ज्यों का त्यों रहा। इस प्रकार उन्होंने लिख-लिखकर कई परचियां डाली, परन्तु पलड़ा रत्ती भर भी नहीं झुका।

सेठ ने परचियों के ढेर लग जाने पर राजा से पूछा- ‘तुम कौन हो? तमाम परचियां लिखकर रख रहे हो, परन्तु पलड़ा टस से मस नहीं हो रहा है?’

राजकोष से दिया दान बेकार

राजा ने कहा- मैं कभी राजा था। मैनें बहुत से दान-पुण्य किए हैं, परन्तु पता नहीं,  पलड़ा क्यों नही झुकता?’

सेठ ने पूछा- दान-पुण्य किसके धन से किए थे?”

राजा ने उत्तर दिया- राज कोष से धन लेकर ही किए थे।

राज-कोष तो जनता का है। उससे किया गया दान-पुण्य तुम्हारा कैसे मान लिया जाए? यदि अपने परिश्रम से धन पैदा कर, कोई दान-पुण्य किया हो,  तो उसको लिखकर देखो।‘ – सेठ ने कहा।

मेहनत के पैसे से किया दान बेशकीमती

राजा ने कहा- राज्य चले जाने के बाद से मैं इस योग्य कहां रह.गया हूं। मगर अभी कुछ देर पहले भिखारी को दो रोटियां दी थी।

उसे ही लिखकर रखो। सेठ ने राजा को सुझाव दिया।

राजा ने एक परची पर वह दान लिखकर रखा। पलड़ा भूमि से जा लगा।

सेठ ने दूसरे पलड़े पर अशर्फियों से भरी एक थैली रखी, पलड़ा ज्यों की त्यों रहा। सेठ बहुत-सी थैलियां रखता गया, परन्तु पलड़े बराकर नहीं हुए। हताश होकर सेठ बोला- परिश्रम से प्राप्त की गई वस्तु के दान का कोई मूल्य नहीं हो सकता। इस पलड़े से जितनी थैलियां उठाकर ले जा सकते हो, ले जाओ।

राजा ने नहीं बेचा अपना पुण्य

राजा कुछ देर मौन खड़े रहे। फिर गम्भीर स्वर में बोले- मैंने राजा के पद से दान-पुण्य किए, पर वे बेकार गए। बड़ी मुश्किल से एक पुण्य प्राप्त हुआ है,  इसे नहीं बेचूंगा।

यह कहकर राजा ने अपनी परची उठा ली और चले गए।

पुण्य का मिला फल

इसी समय उन्होंने देखा, सड़क पर दस-पन्द्रह घुड़सवार तेजी से आ रहे हैं। वे जोर से कह रहे हैं- महाराज त्रिलोकचंद की जय।

घुड़सवार राजा के पास आ गए। राजा ने देखा, वे सब उन्हीं के सैनिक हैं। वह अपने हीं राज्य में हैं। सैनिक उनको पहचान गए। घुड़सवारों के प्रमुख ने घोड़े से उतरकर बताया- महाराज, आपके चले जाने पर हम लोग गुरिल्ला युद्ध करते रहे। शत्रु का समूल नाश कर, हम विजयी हुए। चलिए, सिंहासन को सुशोभित कीजिए।

दूसरे दिन राजा अपनी रानी और राजकुमार के साथ पुनः महल में लौट आए।

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