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सदियों से आदमी का दोस्त है कबूतर |pigeon Information in hindi

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक कबूतरों का अनोखा और आश्चर्यजनक व्यवहार सभी का मन मोहता आ रहा है। कबूतर के बारे में हम आपको जानकारी देते हैं !

कबूतर -इतिहास के आईने में

राज-रजवाड़े, बादशाहों-नवाबों का कबूतरों के प्रति स्नेह बहुत चर्चित रहा। विभिन्न नस्लों के कबूतरों को पालना, बढ़िया दाना चुगाना, कबूतर दौड़ाना और लड़ाना-ये सब बादशाहों और नवाबों के मनोरंजन के साधन थे। मगर कबूतर केवल ‘गुटर-गूं‘ ही नहीं करते वे एक कुशल डाकिए, एक बढ़िया जासूस, प्रेमियों के मध्यस्थ, एक अच्छे गुप्तचर और कुशल कारीगर तथा अखबारों के संवाददाता भी रहे हैं डाकिए के रूप में कबूतरों की ख्याति सब जानते हैं।

सम्राट अशोक के समय में भी कबूतरों द्वारा डाक पहुंचायी जाती थी। चंद्रगुप्त मौर्य के महामंत्री , महान राजनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य ने भी अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र‘ में लिखा है कि कुशल राजाओं के शत्रु के क्रिया-कलापों और गतिविधियों की खोज-खबर लेने के लिए संदेशवाहक कबूतर पालना चाहिए, जो एक स्वामीभक्त सेवक का कार्य करें।
इसी तरह बाणभट्ट की पुस्तक ‘कांदबरी‘ में भी उल्लेख मिलता है कि राजा ‘तारापीठ‘ ने अपने राजमहल की छतों और दीवारों पर कबूतरों के लिए शरण-स्थल और छतरियां बनाई थीं। ‘आईने-अकबरी‘ के रचयिता अबुल-फजल ने भी लिखा था कि बादशाह अकबर के पास भी हजारों ऐसे प्रशिक्षित कबूतर थे, जो संदेश वाहक का कार्य करते थे, और बादशाह स्वयं उन्हें दाना चुगाते थे। ऐसा माना जाता था कि संदेश ले जाने के लिए ‘हूमर‘ प्रजाति के कबूतरों को प्रशिक्षित जाता था और जो लगभग 100 से 120 किमी की रफ्तार से उड़ सकते थे। कबूतरों ने ही शहजादे ‘सलीम‘ और ‘मेहरून्निसा‘ के बीच प्रेम जागृत किया था।

इसी तरह दिल्ली के राजा ‘आलम‘ ने भी अपने स्वामीभक्त कबूतरों की सहायता से अपने और अपनी प्रेमिका के बीच दीवार को गिरवाया और उसे निरंतर देखने का सुख पाया। एक कबूतर ने तोप के गोले के टुकड़े की चोट लगने के बावजूद भी अपने कर्तव्य को पूरा किया और गुप्त संदेश पहुंचाए। ऐसा अनुमान है कि दोनों विश्व युद्धों में कबूतरों द्वारा करीब पांच लाख संदेशों का आदान-प्रदान हुआ था। योद्धा ‘जूलियस सीजर‘ ने अपनी ‘गाॅल‘ पर विजय का समाचार कबूतर के माध्यम से ही रोम तक पहुचाया था। संदेशवाहक कबूतरों का जिक्र हो और विश्व समाचार समिति ‘रायटर‘ की बात न हो, यह भला कैसे संभव है? 1850 में दुनिया की प्रथम विश्वव्यापी समाचार एजेंसी ‘रायटर‘ की स्थापना हुई थी।

डाकिये भी कबूतर

पाॅल जूलियस रायटर नाम के एक जर्मन थे, जिन्होंने ‘आचेन‘ (जर्मनी) में इस समाचार एजेंसी के लिए ‘ब्रसेल्स‘ और ‘आचेन‘ (जर्मनी के दो नगर) के मध्य कबूतरों द्वारा डाक भेजने का काम किया और वो भी इतनी सफलतापूर्वक कि कबूतरों द्वारा डाक और संदेश रेलगाड़ी से भी छः-सात घंटे पूर्व ही पहुंच जाया करते थे। संवाददाता कबूतरों से जुड़ी एक घटना 1972 के ओलपिंक की भी है। उस वक्त ओलंपिक खेलों के समय तमाम देशों के पत्रकार और कैमरामैन अपने-अपने अखबारों के लिए आधुनिकतम साधनों के जरिये समाचार जुटाने में व्यस्त थे, पर एक कैमरा मैन केवल कबूतरों की मदद ले रहा था। वह अपने कैमरे से खेलों की फिल्म उतारता और पूरी होने पर उसे कबूतर के गले में बांधता और वह कबूतर सीधा उड़कर जा पहंुचता अखबार कार्यालय में ।

संवादाता कबूतर

इसी तरह ‘न्यूयार्क इविनिंग पोस्ट जनरल‘ के संवाददाताओं में एक कपोत दल भी है, जो गले में माइक्रो कैमरा लटकाकर 75 किमी. प्रति घंटे की रफ्तार से उड़कर युद्ध, भूकंप जैसी आपदाओं की त्वरित रिपोर्ट अपने कार्यालय तक पहुंचाते हैं। इन कबूतरों को हुनरमंद बनाने में भी हजारों डाॅलर और बहुत श्रम तथा समय खर्च किया जाता है।
संसार में दक्षिण ध्रुव को छोड़कर हर महाद्वीप में पाए जाने वाले इस कबूतर की इस अनोखी आदत का क्या कारण है? वह क्या बात है, जिसकी वजह से ये मार्ग का निर्धारण इतनी कुशलता से कर पाते हैं? आइए, अब जरा इसकी भी खोज करें। कबूतर मनुष्य की तुलना में, आठ गुनी शक्तिशाली नजरों से संसार को देखते हैं। इनकी आंखें भी अधिक रंग-संवेदी होती है और उनकी परीधीय दृष्टि भी बेहतर होती है।

बहुमुखी प्रतिभा है कबूतर में

कबूतर पराध्वनी सुन भी सकते हैं तथा परागंध भी सूंघ लेते हैं।
इस अनोखे पक्षी की गुण-गाथा का अंत अभी नहीं है। यह एक कुशल कारीगर का भी काम करता है और मशीनी पुरजों में से खराब और अच्छे पुर्जे ढूंढ सकता है और बिना रूके प्रति घंटे चार हजार पुरजों को देख और जांच सकता है। कबूतरों की बीट भी जख्मों के लिए दवा का काम करती है और पौधों के लिए अच्छी खाद का भी। इन्हीं गुणों के कारण इस पक्षी को अमन और शांति का प्रतीक बनाया गया है, ताकि ये उड़कर संदेश चारों दिशाओं में फैला सकें।