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Perfume | इत्र 7

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सौंदर्य और सुगन्ध हमेशा से आदमी की कमजोरी रही है। फिजां में  फैली भीनी-भीनी महक किसी के भी तन-मन को प्रफुल्लित व रोमांचित कर सकती है। शायर अपनी महबूबा की घनेरी जुल्फों मे खुशबुओं का खजाना बताते  हुए कहते हैं –

“जरा-सी जुल्फ खोल दो,

फिजां में इत्र घोल दो।“

    जी हां, यह इत्र ही है, जो सदियों से इस गंधहीन धरती के दामन में सुगन्धों के महकते फूल भरता रहा है। आइए, आज हम इत्र के अतीत की महकती  वादियो में चलें।

इत्र का इतिहास

     वैसे तो मानव सभ्यता की शुरूआत के साथ ही आदमी ने एक सुगंधित संसार की परिकल्पना कर ली थी। भारत, चीन और ईरान की अति प्राचीन तहजीबों में इस बात के सबूत मिलते हैं कि उस दौर में लोगों ने खुशबुओं के साथ जीना सीख लिया था। भारत की वैदिक संस्कृति में समस्त धार्मिक क्रिया-कलापों व हवन यज्ञ आदि में सुगंधित पदार्थों का उपयोग अनिवार्य माना  जाता था।

“अग्नि पुराण”  तथा “श्री वाराह पुराण” जैसे प्राचीन ग्रन्थों में विभिन्‍न  प्रकार के कई सुगंधित पदार्थों का उल्लेख मिलता है। सुगंधित जल, उबटन, मुख-शोधक, सुगंधित चूर्ण आदि का उपयोग हमारी प्राचीन सुगंध संस्कृति के प्रमाण हैं। जहां तक इत्र का सवाल है, विशेषज्ञों की ऐसी मान्यता है कि कई आधारभूत आविष्कारों की तरह इत्र भी मिस्र की महान सभ्यता की देन है।

     दुनिया को सुगन्ध का यह नायाब तोहफा आज से साढ़े तीन हजार साल पहले  नील नदी की घाटी मे पनपी मिस्र सभ्यता ने दिया। महान पिरामिड़ो के देश में पिरामिडों में सुरक्षित रखे गए सम्राटों के शवों के साथ प्राप्त हुए सुगन्धित प्रसाधन  इस धारणा की पुष्टि करते हैं कि उस युग में लोगों को सुगंध शास्त्र का पर्याप्त   ज्ञान  था। वहां के निवासी वायुमण्डल को स्वच्छ व रोगाणु मुक्त बनाने के लिए  “इत्र ‘ की तरह के किसी सुगंधित द्रव्य का इस्तेमाल किया करते थे।

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इत्र के आविष्कारक हिप्पोक्रेटस्‌

     यूरोपीय राष्ट्र वैज्ञानिक रूप से इत्र की सर्वप्रथम खोज करने का श्रेय  हिप्पोक्रेटस्‌” को देते हैं, जिसने इत्र के वैज्ञानिक आधार की खोज की और बताया कि इत्र में कई प्रकार के रोग निवारक तत्व मौजूद होते हैं। वैसे अधिकांश लोगो की मान्यता है कि सबसे पहले इत्र की ईजाद अरब देशो में हुई। आठवीं सदी में अल्कोहल बनाने कीं विधि की खोज के बाद, इसमें रेजिन,  सुगंधित तेल  आदि कई पदार्थ मिलाकर दुनिया का पहला इत्र बनाया गया।

     चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में साम्राज्ञी एलिजाबेथ के निर्देश पर हंगरी मे  सुगंधित जल (सेंटेड वाटर) का निर्माण शुरू हुआ। इसने काफी लोकप्रियता हासिल की तथा चार सौ सालों तक यह पश्चिमी राष्ट्रों में अभिजात्य शिष्टाचार का प्रमुख अंग बना रहा। फ्रांस की महारानी पोम्पेडोर ने सुगंधित जल के  कारोबार को अत्यधिक प्रोत्साहन दिया l उसके प्रयासों से पूरा फ्रांस महकने लगा। आज भी फ्रांस को सारे संसार में सुगंध की राजधानी माना जाता है।

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मुगलकाल के दौरान इत्र का विकास

     सत्रहवीं शताब्दी में भारत में मुगलकाल के दौरान इत्र के निर्माण और विकास की प्रक्रिया काफी तेज हो गई। मुगल सम्राट जहांगीर ने अपनी आत्मकथा (सन्‌ 1612) मे उल्लेख किया है कि नूरजहां की मां सलमा सुल्ताना ने गुलाब के  इत्र की ईजाद की। इसका नाम “इत्र-ए-जहांगीरी’ रखा गया। बाद में नूरजहां ने  चंदन के तेल पर आधारित विभिन्‍न सुगंधों के इत्र विकसित किए। मुगल-सम्राटों  ने इत्र की खोज और निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। शौकीन मुगल बादशाह सुगंधित हम्मामों में स्नान करते थे तथा बेहतरीन किस्म के खूशबुदार इत्र  लगाया करते थे।

कृत्रिम इत्र के निर्माण का श्रेय डब्ल्यू.एच. पार्किन्स को

     कृत्रिम इत्र के निर्माण का श्रेय डब्ल्यू.एच. पार्किन्स को जाता है। उन्होंने सन्‌ 1868 में क्यूमेरिन नामक वनस्पति से दुनिया के पहले कृत्रिम इत्र का निर्माण किया। इस खोज को आधार बनाकर बाद में वेनीला आदि अन्य वनस्पतियों से  भी कृत्रिम इत्र बनाए गए।  कृत्रिम इत्र का निर्माण एक श्रम साध्य तथा जटिल  प्रक्रिया है।

     कृत्रिम सेंट बनाने के लिए सैंकड़ों प्रकार की विभिन्‍न गंधो का सही अनुपात में मिश्रण करना पडता है। इस इत्र के बनाने में कुछ विशेष कार्बनिक यौगिक प्रयुक्त होते हैं। फिनाइल इथाइल एल्कोहल से गुलाब की,  बीटा नेफ्थाल  इथर से नारंगी की,  डाइ इथाइल इथर से रातरानी की सुगंध प्राप्त की जाती है।

अब तक दो हजार से भी अधिक सुगंधों वाले सेंट

     अब तक दो हजार से भी अधिक विभिन्‍न सुगंधों वाले सेंट तैयार किए जा चुके हैं। कोई भी नया सेंट तैयार करना काफी माथापच्ची का काम है। कुछ सेंटो के निर्माण में तो पांच सौ से अधिक विभिन्‍न पदार्थ मिलाने पडते हैं। इन पदार्थों में बिल्ली के शरीर से निकाला गया काइवट, व्हेल मछली के शरीर का एम्बरग्रीस  और पुरूष का पसीना जैसी चीजें शामिल है। विश्व के सबसे मंहगे और महकते इत्रो में ‘एलड्यूटेंव’, ‘बाल अ वसाईल’, “ओपियम’,  ‘ज्वाय मिल्सोको’,  ‘डायोरिसीमो’ आदि किस्में उल्लेखनीय हैं।

     फ्रांसीसी कम्पनी ने ‘यू-जेब” नामक एक अत्याधुनिक इत्र बनाया है। यह एक ठंडक व ताजगी प्रदान करने वाला इत्र है। दिन में एक बार लगाने के बाद यह  बीस से अधिक विभिन्‍न इत्रों की खुशबू देता रहता है।  जैसे ही एक सुगंध मद्धम हुई,  अपने आप दूसरी सुगंध महकना शुरू कर देती है। इत्रों की दुनिया मे यह अपनी तरह का अनूठा इत्र है।

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सुगंध व्यवसाय आज विज्ञान

     सुगंध व्यवसाय आज मात्र एक कला नहीं रह कर विज्ञान में तब्दील हो चुका है। भारत में सुगन्ध व्यवसाय बहुमूल्य विदेशी मुद्रा प्राप्ति का महत्वपूर्ण साधन बना हुआ है। एक जमाना हुआ करता था,  जब इत्र जैसी सुगंधित व महंगी  वस्तुओं का इस्तेमाल राजा- महाराजा और अभिजात्य वर्ग के लोग ही कर सकते थे और इत्र को विलासिता की वस्तु माना जाता था,  किन्तु अब इत्र की महकती  सुगंध लहरियां आम आदमी की पहुंच के दायरे में आ चुकी हैं।      अतीत में अभिजात्य वर्ग के मंहगे शौक से शुरू हुई इत्र की यह महकती विकास यात्रा कई घुमावदार पडावों से गुजरती हुई आज दुनिया के सामने  फिजाओं में खुशबू बिखराती खड़ी है।

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