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पिटाई पत्नी की

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प्रकृति ने स्त्री पुरूष दोनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में उत्पन्न किया है। जहां उसने पुरूष को पौरूष व बल प्रदान किया है, वहीं नारी को कोमलता एवं सौंदर्य दिया है। इस तरह कुदरत ने दोनों को समानता के साथ एक दूसरे के साथी के तौर पर प्रेम से रहने का अवसर दिया। लेकिन पुरूष ने अनादि-काल से अपने प्रकृति प्रदत्त बल का दुरूपयोग किया है और उसने हर स्तर पर नारी का शोषण किया है।
सृष्टि के प्रारंभ से ही पुरूष ने अपनी ताकत के बल पर नारी का शारीरिक उत्पीड़न शुरू कर दिया और वह हिंसक परंपरा पति द्वारा बात-बेबात पत्नियों को पीटे जाने के रूप में आज भी जारी है। ऐसा लगता है कि इससे पुरूषों के अहम को तुष्टि मिलती है।
पति द्वारा पत्नियों को पीटे जाने की इस परंपरा पर हम विचार करें तो पाएंगे कि बेचारी नारियां पिछली कई शताब्दियों से यह उत्पीड़न बर्दाश्त करती आ रही है। गोस्वामी तुलसीदास के प्रसिद्ध दोहे ‘ढोल, पशु, गंवार और नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी‘ द्वारा उस युग के पुरूषों की नारी के प्रति मानसिकता प्रतिबिंबित होती है। स्त्रियों को हमेशा दूसरे दर्जे का नागरिक समझा गया है और मनमाने तरीके से उनके साथ बदसलूकी की गई।
ऐसा नहीं है कि यह समस्या केवल हमारे देश में ही रही हो, बल्कि दुनिया के तमाम देशों में पत्नियां अपने पतियों द्वारा बिना वजह पिटती रही हैं। प्रख्यात रूसी लेखक ‘मक्सिम गोर्की‘ द्वारा अपनी आत्मकथा में अपने पिता द्वारा अपनी मां तथा दादा द्वारा दादी की निर्ममतापूर्वक पिटाई किए जाने का बड़ा दारूण वर्णन किया है। ‘मक्सिम गोर्की‘ के विश्वविख्यात उपन्यास ‘मां‘ में भी नायक के पिता द्वारा कम दहेज लाने के कारण अपनी पत्नि को अमानुषिक तरीके से पीटने का जिक्र है यूरोपीय राष्ट्रों में भी बहुत पहले से पुरूष की स्त्रियों पर मनमानी की कहानियां सुनाई जाती रही हैं।
इसी संदर्भ में अपने देश की वर्तमान स्थिति की बात करने से पूर्व राष्ट्र पिता महात्मा गांधी की आत्मकथा के एक अंश का उल्लेख करना उपयोगी होगा, जिसमें महात्मा गांधी जी ने आत्म-स्वीकृति करते हुए लिखा है कि जब वह दक्षिण अफ्रीका में रहते थे, तो एक रोज उनकी पत्नी कस्तूरबा ने घर आए एक अतिथि का शौचालय साफ करने से इंकार कर दिया। इस पर गांधी जी ने क्रुद्ध होकर कस्तूरबा की पिटाई की और उन्हें घर से निकाल दिया। यह घटना इस तथ्य को रेखांकित करती है कि गांधी जी सरीखी महान एवं सुशिक्षित शख्सियत यह कार्य कर सकती है, तो आम आदमी की क्या स्थिति होगी?
पत्नी पर हाथ उठाना वस्तुतः एक मानसिक बीमारी है। जो लोग स्त्री के विषय में गलत तरीके से सोचने के आदी हो जाते हैं, या बिना वजह शंका करना जिनका स्वभाव हो जाता है, वे लोग इस प्रकार की हिंसा में विश्वास करते हैं।
पतियों द्वारा पत्नियों को पीटा जाना एक गंभीर बात है और हमारे देश के कानून प्रावधानों के अनुसार, क्रूरता के आधार पर पत्नी तलाक तक प्राप्त करने का अधिकार रखती है। हमारी दंड संहिता की धारा 125 में प्रावधान है कि यदि पति पत्नी के साथ मारपीट करता है तो पत्नी क्रूरता के आधार पर उससे अलग रहकर पति से मासिक-निर्वाह खर्च प्राप्त कर सकती है। लेकिन हमारे देश में महिलाओं की सामाजिक स्थिति व आर्थिक पराधीनता के चलते बहुत कम महिलाएं इस कानून का लाभ उठा पाती हैं।
एक सर्वेक्षण के अनुसार यह समस्या शिक्षित लोगों की अपेक्षा निर्धन और बिना पढ़े-लिखे वर्ग में अधिक व्याप्त है। इस वर्ग के लोग अपनी गरीबी व आर्थिक परेशानियों से त्रस्त रहते हैं और अपनी नाकामी का गुस्सा बीवी को पीटकर निकालते हैं। इसका अर्थ यह कदापि नहीं निकाल लिया जाना चाहिए कि उच्च वर्ग के शिक्षित लोग बिल्कुल साफ-पाक हैं। सुशिक्षित, अच्छे पदों पर आसीन, सुदृढ़ आर्थिक आधार वाले लोग भी इस मनोविकार से सर्वथा सर्वथा मुक्त नहीं हैं बल्कि कई बार इनकी हिंसा केवल पिटाई तक ही सीमित नहीं रहती।
अखबारों में कई बार ऐसी खबरें प्रकाश में आती हैं, जिनमें उच्च वर्ग के लोगो द्वारा अपनी पत्नी की हत्या का जिक्र होता है। नैना साहनी, मधुमिता हत्याकांड आदि इस बात के ज्वलंत प्रमाण हैं। जाहिर है, पत्नियों को पीटने की यह कुप्रथा कमोबेश पूरे समाज में विद्यमान है।
मुंबई की एक संस्था ‘फोरम अगेन्स्ट आप्रेशन आफ विमेन‘ ने एक सर्वे द्वारा पत्नियों की पिटाई के कारणों की छानबीन की तो मुख्य रूप से मायके वालों से पैसे की मांग, ईष्र्या, औरत के चरित्र पर संदेह, घरेलू कार्य, शराब, पत्नी का आत्म सम्मान, बच्चों के कारण होने वाले झगड़े इत्यादि कारण सामने आए। दरअसल पति अपनी पत्नी को पीटने के बहाने येन केन प्रकारेण खोज ही लेता है।
आमतौर पर पत्नियों के साथ होने वाली मारपीट साधारण होती है, जैसे थप्पड़, घंूसे, लातें आदि मारना। लेकिन कुछ पति निर्दयता की समस्त सीमाओं को लांघकर लकड़ी, सरिये आदि से पिटाई करते हैं। कुछ पति तो मारते-मारते पत्नि को लहूलुहान तक कर डालते हैं। बालों को पकड़कर सिर दीवाल या फर्श पर पटकते हैं। कई दफा तो स्थिति पत्नी को अस्पताल तक पहुंचाने की हो जाती है। पत्नी मानसिक प्रताड़ना सहती है, सो अलग।
इस स्थिति के वास्ते हमारा सामाजिक व पारिवारिक परिवेश भी उŸारदायी है। हमारे समाज में प्रारंभ से ही लड़की को दबाकर रखा जाता है। लड़के के मुकाबले उसे सोचने-समझने और अपने फैसले खुद करने की आजादी तक नहीं दी जाती। ऐसी स्थितियों मेें स्त्री आर्थिक और मानसिक तौर पर पराधीन ही रहती है और उसके लिए अत्याचारी और अपने खिलाफ व्यवस्था के विरूद्ध बगावत करना कतई मुमकिन नहीं होता। असल में, हमारे पुरूष प्रधान समाज में स्त्री को व्यक्तित्व विकास के पर्याप्त अवसर ही मुहैया नहीं हो पाते।
इस विषम स्थिति को बदलने के वास्ते हमें अपने समूचे सामाजिक ढांचे में बदलाव करना होगा। बच्चों की परवरिश में पक्षपातपूर्ण व्यवस्था को खत्म करना होगा। लड़के और लड़की को समानता से देखना होगा। लड़की को मानसिक रूप से सुरक्षा प्रदान करने के वास्ते उसके आत्म-सम्मान का समुचित ख्याल रखा जाना जरूरी है। जो सुविधाएं आप अपने पुत्र को मुहैया कराते हैं, वही पाने की हकदार आपकी पुत्री भी है। आर्थिक आत्म-निर्भरता भी स्त्रियों के आत्म-बल को बढ़ाने के लिए एक अनिवार्य तत्व है। पतियों को अपने सोचने के तौर तरीकों में भी बदलाव लाना चाहिए। उन्हें अपनी पत्नियों की भावनाओं का समुचित आदर करना चाहिए।
आधुनिक समाज में पत्नियों की पिटाई एक कोढ़ है, जिससे समाज को मुक्ति दिलाये जाने की दिशा में सभी सार्थक, रचनात्मक और कारगर उपाय पूरी ईमानदारी से किए जाने की सख्त जरूरत है।