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पलाश के फूल

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‘पलाश‘ और ‘फागुन‘ का रिश्ता बड़ा मादक है। फागुन के अलमस्त और रंगीले महीने में पलाश के खूबसूरत और रंगीन फूलों से ढके-लदे पेड़ जैसे फागुन की मदमाती ऋतु को और ज्यादा अल्हड़ बना देते हैं । टेसू के सुर्ख लाल फूल दहकते अंगारों का-सा आभास देते है । बसंत ऋतु में पलाश के पेड़ का श्रृंगार करते ये रंग-बिरंगे फूल किसी दुल्हन के परिधान की तरह लगते हैं।
‘पलाश‘ अथवा ‘टेसू‘ बहुत जाना-पहचाना पौधा है। वनस्पति शास्त्र की भाषा में इसे ‘ब्यूटिया मोनोस्पर्मा‘ कहा जाता है तथा इसे मटर-कुल ( पेपिलियोनेसी ) के अंतर्गत माना जाता है। संस्कृत साहित्य में पलाश को किंशुक, पर्ण, यज्ञिक, रक्त-पुष्पक, क्षार-श्रेष्ठ, ब्रह्मवृक्ष समिद्धर आदि नामों से सम्बोधित किया गया है। इसके अलावा पलाश को गुजराती में ‘खाखरा‘ बंगाली में ‘पलाश गांछ‘, मराठी में ‘पलस‘, तमिल में ‘परशन‘ और अंग्रेजी में ‘ब्यूटिया पार्किफ्लोरा‘ के नाम से जाना जाता है।
पलाश के पेड़ का आकार मध्यम होता है। इसकी ऊंचाई औसतन तीन से साढे तीन चार मीटर तक होती है। इनकी औसत आयु 50 से 75 वर्ष तक होती है। ये वृक्ष आमतौर पर भूरे रंग की छाल से ढंके होते हंै। पलाश की पत्तियां बहुत स्निग्ध, सपाट तथा तीन फलक वाली होती हैं। पत्तियांतीन पत्तियां के एक समूह में होती हैं। इस समूह में बीच वाली पत्तियां एक लम्बी डंडी से बाहर निकली होती है तथा आसपास दो पत्तियां और होते हैं। शायद इसी स्वरूप के कारण ‘ढाक के तीन पात‘ वाली कहावत प्रचलित हुई।पत्तियां का पृष्ठ भाग खुरदरा होता है। ये पत्तों काफी मजबूत होते हैं। पत्तियां का उपयोग बंगाल, तमिलनाडु आदि क्षेत्रों में बीड़ी बनाने के लिए किया जाता है। अपनी चिकनी सतह की वजह से यह पत्तियां-दोने बनाने में भी प्रयुक्त होते है। पलाश के पत्तों पर लाख के कीड़ो को भी पाला जाता है। ये पत्तियां पशु-आहार के तौर पर भी काम मे आतेे हैं। इन पत्तोंके रस से त्वचा-रोगो का उपचार भी किया जाता है।
जनवरी के प्रारंभ से फरवरी के अंत तक पलाश के वृक्ष की सारी पत्तीयां झड़ जाती हैं और बसंत के आगमन के साथ ही पलाश के पेड़ लाल-नारंगी रंग के फूलों से ढक जाते है। इनके फूल गुच्छों में लगते हैं। पलाश के फूल में पांच पंखुड़ियां होती हैं तथा फूल सुग्गे चोंच की तरह एक तरफ मुड़े होते हंै। जंगल में पलाश के पेड़ों पर लगे अनगिनत फूलों का रंग इतना चटख होता है कि दूर से देखने पर ऐसा आभास होता है, मानो जंगल में आग लग गई हो, इसलिए इसे अंग्रेजी में ‘फ्लेम आॅफ द फारेस्ट‘ कहा गया है।
टेसू के इन रंग-भरे खूबसूरत फूलों की विडम्बना यह है कि अपनी तमाम खूबसूरती के बावजूद ये पूर्णतः गंधहीन होते है। इनमें कोई खुशबू नहीं होती। ‘हितापदेश‘ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में पलाश के फूलों की इसी कमी को लक्ष्य करके एक श्लोक कहा गया है, जिसका अर्थ है – ‘‘ जिस प्रकार उच्च कुलीन होने पर भी गंधहीन किंशुक (पलाश) सम्मान का पात्र नहीं, उसी प्रकार उच्च कुल में पैदा होने के बाद भी विद्याहीन व्यक्ति आदर नहीं पा सकता।‘‘
अपनी गंधहीनता के बावजूद पलाश के फूल सदियों से आदमी के वास्ते बेहद उपयोगी रहे हैं। इसके फूलों से उत्कृष्ट किस्म के पीले और केसरिया रंग बनाए जाते है। पहले जब रंग और गुलाल नहीं थे तब टेसू के फूलों के प्राकृतिक रंग ही हमारी होली को रंगीन बनाते थे। ग्रामीण क्षेत्रों में तो आज भी पलाश के फूलों से बने रंगों से होली खेली जाती है। पलाश के पेड़ पर मैना, बुलबुल आदि पक्षी रहना अधिक पंसद करते हैं क्योंकि इसके फूलों में पराग अधिक मात्रा में पाया जाता है।
अप्रेल के आखिर और माह की शुरूआत में पलाश के पुष्प झरना शुरू हो जाते हैं और उसके पेड़ पर फल आना प्रारंभ हो जाता है। इसके फल फली के आकार में चपटे होते हैं तथा सामान्यतः इनकी लम्बाई दो-तीन इंच होती है। ये फल कोमल व सघन रोमों से ढंके होते हैं। इन फलों में ताम्बे के सिक्के की तरह हल्के कत्थई रंग का एक बीज निकलता है।
पेट के कीड़ो को नष्ट करने के लिए पलाश के बीजों का काढ़ा बनाकर सेवन किया जाता है। इसके बीज को ताजा नीबू के रस में मिलाकर लगाने से दाद-खाज आदि त्वचा रोगों मे लाभ होता है। इन बीजों में प्रोटीन तथा एंजाइम प्रचुर मात्रा मेेें पाया जाता है।
पलाश के वृक्ष का तकरीबन प्रत्येक भाग हमारे लिए उपयोगी है। इसकी जड़ों से रस्सियां बुनी जाती हैं। कुछेक आदिवासी क्षेत्रों में तो पलाश की जड़ो को खाने के काम में भी लिया जाता है। पलाश की लकड़ी न सिर्फ इमारती चोखट व ईधन तथा चारकोल के रूप में काम लाई जाती है बल्कि इसे पवित्र व शुद्ध मानकर हवन यज्ञ आदि में भी इस्तेमाल किया जाता है। पलाश की छाल से एक गाढ़ा लाल रंग का लिसलिसा द्रव प्राप्त होता है, जिसे ‘लाल गोंद‘ कहा जाता है। यह गोंद ‘टेनिन‘ नामक पदार्थ से सम्पन्न होने के कारण अतिसार रोग में एक कारगर औषधि के रूप में प्रयुक्त होता है। पलाश के वृक्ष में सूखा व पाला बर्दाश्त करने की अद्भुत क्षमता होती है। आजकल इन वृक्षों का उपयोगी क्षारीय लवण-युक्त भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए किया जा रहा है। कई आयुर्वेदिक औषधियों में भी पलाश के विभिन्न भागों का उपयोग होता है। गर्मी के जलते-तपते दिनों में हरे-भरे रहकर फूलों से लदा रहने वाला पलाश-वृक्ष आदमी के लिए सचमुच बेहद उपयोगी हैं।