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ओलिम्पिक के मसीहा: कुबर्तिन

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विश्व के सर्वाधिक विशाल, आकर्षक और दिलचस्प खेल समारोह ओलिम्पिक का अपना एक इतिहास है गौरवमयी परम्पराओं का। बेहद दीर्घ स्वस्थ स्पर्धा की पावन भावनाओं से खेले जाने वाले इन खेलों की शुरूआत ईसा से आठ सदी पहले यूनान से हुई थी। वर्षो से यह खेल जारी रहे और फिर 394 ईसवी में रामेन सम्राट थियोडोरियस की आज्ञा से ओलिम्पिक मशाल बुझा दी गई। एक अच्छा सिलसिला यकायक ठहर गया। सदियों बाद इस अभाव को अनुभव किया-फ्रांस के महापुरूष बोर्न पियरे द कुबर्तिन ;ठंतवद च्मततम क्म ब्वनइमतजपदद्ध ने । कुबर्तिन के लगातार प्रयासों का ही परिणाम है कि आज ओलिम्पिक खेल जीवित हैं। ओलिम्पिक खेलों के पुर्नआयोजन में कुबर्तिन की विशिष्ट और महत्वपूर्ण भूमिका रही है और इसलिए उन्हें आधुनिक ओलिम्पिक का जनक कहा गया है।
1863 की पहली जनवरी को पेरिस में जन्मे कुबर्तिन कुलीन वंशी थे और शायद इसीलिए उन्हें शिक्षा के लिए सेंट सायर की प्रख्यात सैन्य अकादमी भेजा गया। सैन्य अकादमी से कुबर्तिन अपना रिश्ता नहीं जोड़ पाए। जाहिर है क्षेत्र उन्हें अपने अनुकूल नहीं लगा। शिक्षा तो लेनी ही थी, इसलिए उन्होंने राजनीति विज्ञान को अध्ययन के लिए चुना। शिक्षा समाप्त करने बाद यायावर कुबर्तिन ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य देशों की लगातार यात्रा पर रहे। ठीक इन्हीं दिनों उत्साही जर्मन पुराविदों का एक दल यूनान के प्राचीन नगर ‘ओलिम्पिया‘ में उत्खननरत था। इस दल को पर्याप्त सफलता मिली और ‘पुरातन ओलिम्पिक‘ (776 ईसा पूर्व से 394 ईसवी तक) के ढेर सारे अवशेष खोज निकाले गए। कुबर्तिन ने भी ओलिम्पिया की यात्रा की। इस यात्रा से कुबर्तिन को अत्यधिक पे्ररणा मिली और उन्होंने मन ही संकल्प लिया – गरिमामय ओलिम्पिक खेलों के पुर्नआयोजन का। कुबर्तिन ने सोचा और महसूस किया कि ओलिम्पिक आयोजन, अशांत और युद्धग्रस्त विश्व मंे शांति का सुदृढ़ आधार सिद्ध हो सकता है। अपने इस महत्वाकांक्षी विचार को व्यावहारिक रूप देने के लिए कुबर्तिन ने प्रयास शुरू किए। 1892 में उन्हें एक सुअवसर मिला। पेरिस में ‘एथलेटिक स्पोर्ट्स यूनियन‘ के पांचवें अधिवेशन में ओलिम्पिक की नई शुरूआत का विचार रखते हुए कुबर्तिन ने दृढ़ स्वर में कहा – ‘हमें अब नाविकों, दौड़ाकों और तलवारबाजों का निर्यात करना चाहिए। यही आने वोल समय मुक्त व्यापार का है और जिस दिन यह घटना घटेगी, शांति का उद्देश्य नया और शक्शिाली संबल पाएगा‘। कुबर्तिन के इस प्रभावी भाषण का केवल एक यही परिणाम बरामद हुआ – लोग ‘ओलिम्पिक‘ खेलों के प्रति गम्भीरतापूर्वक सोचने लगे। हालांकि अभी भी वे पूर्णरूपेण तैयार नहीं थे लेकिन दृढ़प्रतिज्ञ कुबर्तिन भी कहीं से निराश नहीं था।
लगभग दो साल बाद पुनः पेरिस में दुनिया भर के खेल वाले जमा हुए । अवसर था – अंतर्राष्ट्रीय एथलेटिक कांग्रेस का। यहां इस कांग्रेस में विदेशी प्रतिनिधियों से कुबर्तिन ने गहन विचार-विमर्श किया और ओलिम्पिक आयोजन की जोरदार वकालात की। इस बार सब कुछ कुबर्तिन के अनुकूल था, न केवल उनके विचार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली अपितु 24 जून 1894 को अंतर्राष्ट्रीय ओलिम्पिक समिति भी गठित हो गई। ओलिम्पिक आयोजन के सभी पक्षों पर सुविचारित निर्णय लिए गए। यह तय पाया गया कि प्रथम ओलिम्पिक खेल यूनान में आयोजित किए जाएं। यह फैसला निस्सन्देह विवेकपूर्ण था। कोरोबस और मिलो जैसे महान खिलाड़ियों ने ही दुनिया को ओलिम्पिक की महान परम्परा दी थी और इसीलिए ओलिम्पिक के नवारंभ के लिए यूनान के एंथेंस नगर का चयन बिल्कुल सही और सटीक था।
कुबर्तिन अपने ‘एकल अभियान‘ में सफल रहे थे। यह उनकी संघर्षशील प्रवृति और जीवटता का प्रमाण था, लेकिन अभी परेशानियों का अंत कहां हुआ था? आयोजन के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा थी – धन का अभाव और ऐसे समय में सामन आए अवारोफसे संपन्न व्यवसायी। अवारोफ ने ओलिम्पिक आयोजन के लिए खुले दिल से दौलत का इंतजाम किया। 6 जून 1894 को यूनान के नरेश जार्ज प्रथम ने ओलिम्पिक खेल औपचारिक रूप से उद्घाटित किए। सदियों पूर्व बुझाई गई मशाल फिर जल उठी थी और इस ऐतिहासिक मशाल से निकल रही थी – पाकीजा रोशनी, जो मैत्री और सद्भाव और शांति की राह को अपने प्रकाश से प्रशस्त कर रही थी। इस अवसर पर पहले ओलिम्पिक विजेता का गौरव पाया – अमेरिका के जेम्स बी, कोनोली ने, लेकिन शायद कोनोली से भी अधिक रोमांचित थे कुबर्तिन! उनका ख्वाब उनकी आंखों के सामने ही आकार ले रहा था।
विश्व बन्धुत्व, मैत्री और सद्भावना का प्रतीक ओलिम्पिक खेल मेला एथेंस में 1896 के बाद से प्रति चार वर्ष बाद विश्व के विभिन्न नगरों में लगता है। दो महायुद्धों ने अवश्य थोड़ा व्यवधान जन्माया, लेकिन मशाल पूरी तरह बुझी नहीं है और इसीलिए ओलिम्पिक जारी है। खेलों के जरिए अमन का स्वप्न देखने वाले कुबर्तिन ने जब 1913 में ओलिम्पिक प्रतीक तैयार किया तब पांच महाद्वीपों को सकारात्मक रूप से पांच गोल घेरों में परस्पर गूंथ दिया। दरअसल ओलिम्पिक की सच्ची और वास्तविक भावना भी यही है। ओलिम्पिक के जनक ने कहा था-‘ओलिम्पिक खेलों में महत्वपूर्ण बात विजयी होना नहीं है। जीवन में महत्वपूर्ण वस्तु जीत नहीं है बल्कि संघर्ष है। महत्वपूर्ण बात किसी को जीतना नहीं अपितु भली प्रकार जूझना है।‘
कुबर्तिन को ओलिम्पिक पुर्नआयोजन के लिए और इसके माध्यम से शांति और सद्भावना को सुदृढ़ करने के लिए 1927 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। लगभग एक दशक बाद वे चले बसे, लेकिन इस बीच वे ओलिम्पिक की जड़ें और गहरी जमा गए थे। इसीलिए आज भी ओलिम्पिक कायम है। कुबर्तिन ओलिम्पिक खेल को उस समस्त सभ्यता का प्रतीक मानते थे, जो देशों, नगरों, नायकों और प्राचीन धर्मों तक से कहीं श्रेष्ठ हैं। आज कुबर्तिन की तरह सोचना इसलिए आवश्यक हो गया है क्योंकि वही समय का सत्य है।
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