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पौष्टिकता से भरपूर : अनार | Nutritious: Pomegranate

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अपने विशिष्ट स्वाद और पौष्टिकता के कारण अनार एक अभिजात्य फल माना जाता है । विश्व की तकरीबन सभी प्राचीन सभ्यताओं में अनार के महत्व को स्वीकार किया गया है । प्राचीन मिस्त्र , फारस , और असीरियन सभ्यताओं के अवशेषों में अनार की खूबसूरत प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं । बाईबिल के ‘ ओल्ड टेस्टामेंट ‘ में अनार को ‘ सम्पन्न लोगों का फल ‘ कहकर सम्बोधित किया गया है । पुरानी कहावत  ‘ एक अनार सौ बीमार ‘ से भी अनार का औषधिय महत्व रेखांकित होता है ।

यहूदियों ने अनार को एक पवित्र फल माना है । उनके प्राचीन उपासना – स्थल में अनार तथा उसके बेलबूटों की चित्रकारी देखने को मिलती है । सोलोमेन के महल की दीवारों और पत्थरों के खम्भों पर अनार के कई चित्र उत्कीर्ण किये हुए मिलते हैं । कहा जाता है , प्राचीन काल में फायनिका और फाइजिका के उद्यानों में उत्कृष्ट कोटि के अनारों के वृक्ष लगाये जाते थे ।

यह पौष्टिक फल हिंदी में ‘अनार’ , संस्कृत में ‘दाडिम ‘, तमिल में ‘मदुलाई ‘, और बांग्ला में ‘दालिम’ नाम से जाना जाता है । लैटिन भाषा में इसका नाम ‘ प्यूनिका ग्रेनेटम ‘ है । प्राचीन रोम में इसे  ‘मालुम पुनिकुम ‘ तथा यूनान में ‘ बलुस्तिना ‘ कहा जाता था।

हमारी आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में अनार को बहुत प्राचीन काल से एक महत्वपूर्ण औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है । अनेक आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसके औषधिय गुणों का विशद वर्णन किया गया है ।

आयुर्वेद के अनुसार अनार :

आयुर्वेद के अनुसार , अनार त्रिदोषनाशक , हृदय के लिए पुष्टिकारक बल व वीर्य – वर्द्धक , तृषानाशक , संग्रहणी , अतिसार व वमन – नाशक गुणों से सम्पन्न होता है । यूनानी चिकित्सा पद्धति में अनार को एक स्तंभक औषधि माना गया है तथा इसके स्वाद के कसैलेपन के कारण कृमि तथा कीटाणुनाशक बताया गया है ।

उच्च रक्तचाप , त्वचा रोगों , मूत्र – विकारों , पाचन – संस्थान की निष्कियता , रक्ताल्पता , पौरूष – हीनता आदि रोगों में अनार का नियमित सेवन एक बहुत ही कारगर औषधि साबित होता है । बच्चों के शारीरिक विकास में भी यह सहायक सिद्ध होता है । अनार को एक उत्तम प्राकृतिक टॉनिक माना जाता है । स्फूर्तिदायक , सुपाच्य और तापहर फल होने के कारण चिकित्सक प्रायः अपने मरीजों को अनार के सेवन का परामर्श देते हैं ।

अनार की रासायनिक संरचना

अनार में लगभग 90 प्रतिशत नमी होती है । बहुत ही संतुलित मात्रा में फास्फोरस , कैल्शियम , प्रोटीन और विटामिन भी होते हैं । अनार में पांच प्रतिशत रेशा और 15 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट भी पाया जाता है ।

विभिन्न रोगों के उपचार में अनार का उपयोग :

उदर रोगो में अनार का उपयोग :

• यकृत की कमजोरी, उल्टी – दस्त , पेटदर्द आदि रोगों में अनार का सेवन रामबाण औषधि है।

• अनार के लाल दानों में काली मिर्च का चूर्ण और सेंधा नमक डालकर चूसने से पेटदर्द में राहत मिलती है ।

• भोजन के प्रति अरूचि और भूख नहीं लगना जैसे रोगों में सौ ग्राम अनार दाना, पच्चीस ग्राम काली मिर्च, पच्चीस ग्राम कलौंजी , तीस ग्राम जीरा  और बीस ग्राम सेंधा नमक मिलाकर महीन पाउडर बना लें । इस पाउडर की दस ग्राम मात्रा सुबह -शाम गर्म पानी के साथ लें ।

•  इसी प्रकार सौ ग्राम अनार दाना में पचास ग्राम दालचीनी , बड़ी इलायची , तेजपत्ता तथा सौ ग्राम मिश्री मिलाकर चूर्ण बना लें । सीने में जलन , मंदाग्नि , अपच , पेट फूलना आदि तकलीफ में पांच – पांच ग्राम चूर्ण दिन में तीन बार शीतल जल के साथ लें ।

• अनार के पत्तों को छाया में सुखा लें। इन पत्तों का चूर्ण बनाकर गाय के दूध से बने  मट्ठे से लेने से आंत्रकृमि नष्ट हो जाते हैं। यह प्रयोग सवेरे शाम करना चाहिए।

दंत रोगो में अनार से घरेलू उपचार :

 • अनार के फूलों को सूखा कर चूर्ण बना लें । दांतों और मसूड़ों से खून आने पर दिन में दो बार इस चूर्ण से मंजन करें ।

 • मुंह की बदबू दूर करने के लिए अनार के सूखे छिलकों का चूर्ण बनाकर सुबह- शाम पानी के साथ सेवन करें तथा अनार की छाल को पानी में उबाल कर गरारे करें ।

 • अनार के छिलकों तथा सेंधा नमक को मिलाकर गोलियां बना लें । एक गोली 6 घंटे में चूसें ।खांसी में राहत मिलेगी ।

 • अनार के हरे छिलके को मुंह में रख कर चूसने से खांसी में आराम मिलता है । बीस ग्राम अनार का सिरका, दस ग्राम काली मिर्च का चूर्ण, बीस ग्राम छोटी पीपल तथा पांच ग्राम जवारवार मिलाकर महीन पीस लें । इसमें अस्सी ग्राम गुड़ मिलाकर छोटी – छोटी गोलियां बन लें । एक – एक गोली दिन में तीन बार चूसने से पुरानी खांसी ठीक हो जाती है ।

विभिन्न रोगों में अनार से घरेलू उपचार :

• अनार के पत्तों को महीन पीसकर रात्रि में शयन से पूर्व आंख पर बांधने से आंख का दर्द दूर होता है ।

• गले में खराश होने पर अनार के छिलकों को पानी में अच्छी तरह उबालें । इसमें दो लौंग भी डाल दें । पानी गुनगुना हो जाने पर गले में गहराई तक पानी ले जाकर गरारे करें ।

• पीलिया रोग में अनार का रस लोहे के बर्तन में रात भर रखें, सुबह मिश्री मिलाकर पीएं। अवश्य लाभ होगा ।

• अनार के फूल का रस नाक में टपकाने और तुलओं पर अनार के फूल के रस की मालिश करने से नकसीर तुरन्त बंद हो जाती है ।

• बिच्छू,बर्र, मधुमक्खी आदि के काटने पर अनार के पत्तों को पीसकर काटे हुए स्थान पर लेप करें।

• मूत्र की जलन ठीक करने के लिए अनार का सेवन करें ।

• स्तनों के ढीलेपन से त्रस्त महिलाओं को अनार के छिलके को पीसकर पेस्ट बनाकर सोने से पूर्व स्तनों लेप करना चाहिए ।

 • अनार के छिलके तथा लहसुन को एक साथ पीसकर खुजली, दाद आदि पर लगाने से राहत मिलती है ।

 • अनार के सूखे पत्तों को जलाकर उसकी राख में नारियल का तेल मिला दें । यह पेस्ट फोड़े फुन्सी और त्वचा रोगों में बहुत उपयोगी होता है ।

 • अनार के रस के नियमित सेवन से हृदय मजबूत होता है।

 • अनार के छिलकों के महीन पाउडर को गुलाबजल में मिलाकर शरीर व चेहरे पर उबटन करने से           दाग – धब्बे व झाइयां मिट जाती हैं ।

• अनार के सेवन से खून साफ होता है ।

• उच्च रक्तचाप में अनार का सेवन फायदेमंद होता है ।

 • अनार का रस पीने से पेट के कीड़े समाप्त होते हैं ।

 • अनार के रस में मिश्री मिलाकर पीने से हृदय की निर्बलता नष्ट होती है।

 • अनार के पत्तों को पीसकर सिर पर लेप करने से बालों का झड़ना कम हो जाता है।

 • खट्टे अनार के छिलके और शहतूत को जल में उबालकर छानकर पीने से पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

 • अनार के छिलकों को पीसकर चावल के मांड के साथ सेवन करने से महिलाओं के श्वेत प्रदर रोग में लाभ होता है

अनार के उपयोग में सावधानियां / परहेज:

• अनार का अधिक सेवन कब्ज पैदा करता है ।

• यथा संभव मीठे अनार का ही सेवन करें । खट्टा अनार पित्त कुपित करने वाला होता है।

 • अनार के रस को निकालने के तत्काल बाद पी लेना चाहिए ।

 • स्नायुशूल, शीत तथा रात्रि में अनार नहीं खाना चाहिए ।

 • अनार से बताए गए घरेलू उपचार किसी योग्य चिकित्सक के परामर्श और देखरेख में करने चाहिए।