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राष्ट्रीय-गीत

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‘‘जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं , मगर रूत जान देने की रोज आती नहीं।‘‘
भारत का स्वाधीनता-संग्राम किसी एक वर्ग-विशेष का आंदोलन नहीं था, बल्कि एक ऐसा जन-आंदोलन था, जिसमें देश और समाज के हर वर्ग, हर समूह ने यथा-शक्ति अपना योगदान दिया। भारतीय फिल्म उद्योग ने भी स्वतंत्रता-संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और पर्दे पर फिल्मों के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का प्रयास किया। गीतों और अभिनय के जरिये राष्ट्रीयता के प्रचार-प्रसार में फिल्मों के जरिये महत्वपूर्ण कार्य हमारे फिल्मकारों ने किया।
आज अक्सर फिल्मों पर युवा-पीढ़ी को गुमराह और अपराधोन्मुख करने का आरोप लगाया जाता है। लेकिन मौजूदा समय में साम्प्रदायिकता और अलगाववाद के जलते राजनैतिक जंगल में फिल्म-क्षेत्र ही एकमात्र ऐसी जगह है, जहां सर्वाधिक साम्प्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का वातावरण है। हमारा फिल्मोद्योग अनेकता में एकता की जीवंत मिसाल है। फिल्मवालों को भी अपने वतन से उतनी ही मोहब्बत है, जितनी किसी अन्य को। फिल्म ‘काबूलीवाला‘ का मन्ना डे द्वारा सलिल चैधरी के निर्देशन में गाया यह मशहूर गीत इस तथ्य की पैरवी करता है:
‘ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन
तुझ पे दिल कुर्बान, तू ही मेरी आबरू है,
तू ही मेरी जान…..।‘
गीतकार प्रेम धवन द्वारा रचित इस गीत में अपने प्यारे वतन के लिए जितनी कशिश है, वह तो सिर्फ महसूस करने की बात है।
फिल्म अभिनेता सुनील दत्त द्वारा बरसों पहले बनाई गई फिल्म ‘मुझे जीने दो‘ के एक गीत ‘अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आजाद है‘ में राष्ट्रीय – भावना का बहुत ही स्वाभाविक चित्रण मिलता है।
दादा साहब फाल्के पुरस्कार से अलकृंत स्वर्गीय राजकपूर की फिल्मों में भी प्रायः कहीं-कहीं राष्ट्रवाद का संदेश छुपा रहता था। ‘आवारा‘, ‘जागते रहो‘, आदि फिल्में इसका उदाहरण हैं। उनकी विख्यात फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है‘ का यह गीत आज भी बरबस होठों पर आ जाता है –
‘होठों पे सच्चाई रहती है,
जहां दिल में सफाई रहती है,
हम उस देश के वासी हैं,
जिस देश में गंगा बहती है।‘‘
अपने देश और संस्कृति से प्यार करने वाला व्यक्ति ही इतने खूबसूरत गीत गा सकता है
‘मेरा जूता है जापानी…..‘(श्री 420)
दिलीप कुमार की सुपरहिट फिल्म ‘लीडर‘ का राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत यह गीत भी काफी लोकप्रिय हुआ था-
‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं,
सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं।‘
फिल्म ‘सिकंदर-ए-आजम‘ का मोहम्मद रफी की आवाज में राजेन्द्र कृष्ण द्वारा रचित यह गीत सुनकर आज भी चलते-चलते कदम ठिठक जाते हैंः
‘जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा,
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा।‘
यह सिर्फ फिल्मी-गीत नहीं था, बल्कि उच्च कोटि की साहित्यिक रचना थी, जिसके एक-एक शब्द में राष्ट्रवाद की महक है।
गायक, गीतकार और संगीतकार की हैसियत से तो कविवर स्वर्गीय प्रदीप अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते ही थे, साथ ही राष्ट्रीय जागृति और चेतना के भी वह प्रखर प्रवक्ता रहे । ‘जागृति‘ फिल्म का यह गीत आज भी दिल में हलचल मचा देता है –
‘आओ बच्चों,
तुम्हें दिखाएं, झांकी हिन्दुस्तान की।‘
या कविवर प्रदीप का एक अन्य प्रसिद्ध गीत:

‘एक बात कहनी है मुझे देश के प्रहरेदारों से
सीमा पर खड़ी दीवारों से।‘
संभलकर रहना घर में छुपे गद्दारों से।‘ ( फिल्म ‘तलाक‘)
बहुत पहले एक युद्ध फिल्म आयी थी – ‘हकीकत‘ जिसमें धर्मेन्द्र नायक थे। फिल्म में कैफी आजमी की कलम से लिखा गया यह गीत देश-प्रेम के नये आयाम पेश करता है
‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।
जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं,मगर
रूत जान देने की रोज आती नहीं।
हुस्न-ओ-इश्क दोनों को रूसवा करे,
वो जवानी, जो खूं में नहाती नहीं।‘
इस गीत के एक-एक शब्द में वह आग भरी है, जो किसी भी व्यक्ति की सोई राष्ट्रीयता की भावना को पल-भर में जागृत करने की क्षमता रखती है।
स्वर्गीय साहिर लुधियानवी उन चंद शायरों में से एक थे, जिन्होंने फिल्मी-गीतों को साहित्यिकता प्रदान की। वह एक प्रसिद्ध शायर होने के साथ-साथ मजबूत वतनपरस्त भी थे। उनकी वतनपरस्ती का नमूना है, फिल्म ‘नया दौर‘ का वह गीत, जिसकी धुन पर आज भी लोग भांगड़ा नाचते हैं-
‘ये देश है वीर जवानों का
अलबेलो का मस्तानों का
इस देश का यारों क्या कहना
यह देश है दुनिया का गहना।‘
यूं तो स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने हर अंदाज, हर रंग के हजारों गीत फिजां में बिखराए हैं, लेकिन लताजी स्वयं भी इस गीत को नहीं भूल सकतीं, जिसे सुनकर पंडित जवाहरलाल नेहरू की आंखे भर आई थीं:

‘ऐ मेरे वतन के लोगों,
जरा आंख में भर लो पानी,
जो शहीद हुए हैं उनकी
जरा याद करो कुर्बानी।‘ ( फिल्म: शहीद )
फिल्म-जगत के ख्यातिनामा राष्ट्रवादी मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार का जिक्र किये बिना इस लेख का मक्सद पूरा नहीं हो सकता। मनोज कुमार की तकरीबन सभी फिल्मों का विषय ‘देश-पे्रम‘ रहा है। ‘शहीद‘, ‘क्रांति‘, ‘उपकार‘ ‘पूरब और पश्चिम‘ आदि मनोज कुमार की बहुत सारी फिल्में राष्ट्रीयता से ओतप्रोत हैं। फिल्म ‘उपकार‘ का यह गीत कितना लोकप्रिय हुआ था, यह बताने की आवश्यकता नहीं:
‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती।‘
गुलशन बावरा द्वारा लिखे इस गीत में देश की मिट्टी की सौंधी-सौंधी महक थी।
‘पूरब और पश्चिम‘ फिल्म के इंदीवर द्वारा रचित इस गीत में देश-अभिमान की जो जबर्दस्त भावना है, वह देखते ही बनती है –
‘है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूंू,
भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं।‘
मनोज की ही फिल्म ‘शहीद‘ का यह गीत भी बहुत मशहूर हुआ था – ‘मां, मेरा रंग दे बंसती चोला‘
इनके अतिरिक्त सैंकड़ों ऐसे फिल्मी गीत हैं, जो हमें अपनी मातृभूमि अपने वतन के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध कराते हैं। कुछ उल्लेखनीय गीत इस प्रकार हैं:
‘वतन पर जो फिदा होगा,
अमर वो नौजवां होगा।‘ ( फूल और अंगारे )

‘न कोई रहा है, न कोई रहेगा,
मेरा देश आजाद होकर रहेगा।‘ ( गोवा )

मेरी चिट्ठी तेरे नाम,
सुन ले बापू यह पैगाम‘ ( बालक )

‘देखो वीर जवानों,
अपने खून पे ये इल्जाम न आये।‘ ( आक्रमण )

हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के,
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के।‘ ( दिया और तूफान )

नन्हा-मुन्ना राही हूँ , देश का सिपाही हूं
बोलो मेरे संग जय हिन्द, जय हिन्द जय हिन्द।‘ ( सन ऑफ़ इंडिया )

‘ऐ वतन ..ऐ वतन हमको तेरी कसम
तेरी राहों पर जां तक लूटा जाएंगे।‘
फिल्म जगत ने राष्ट्र-प्रेम की बुलंदियों को छूते ऐसे सैंकड़ो गीत दिए हैं, जो राष्ट्र के प्रति समर्पण और बलिदान की भावना जागृत करते हैं। फिल्मी गीतों को महज तुकबंदी समझने वाले लोगों को इन गीतों के राष्ट्रीय पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए।