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ननद – भाभी रिश्तों का माधुर्य दोनों पर निर्भर

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हमारी समूची सामाजिक-व्यवस्था आपसी रिश्तों पर आधारित है। परम्परागत संयुक्त परिवारों में तो इन रिश्तों का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। परिवार में ननद-भाभी जैसे नाजुक सम्बन्धों की अहमियत को नकारा नहीं जा सकता।
आम भारतीय परिवारो में ननद-भाभी के रिश्ते मधुर नहीं हैं। यह बहुत पुरानी परम्परा सी चली आ रही है। हमारे लोक गीतों में भी इस रिश्ते की कटुता का जिक्र आता है। सम्बन्धों के बिगड़ते समीकरणों की यह समस्या बहुआयामी है तथा दोनों ही पक्ष इस मनमुटाव के लिए उत्तरदायी हैं।
ननद के दृष्टिकोण से देखें तो भाई के विवाह और भाभी के आगमन की प्रतीक्षा वह बेहद उत्सुकता से करती है तथा अपनी भावी भाभी की काल्पनिक छवि मन में बना लेती है लेकिन जब भाभी के रूप में उसे अपनी कल्पना और धारणा से किंचित भी प्रतिकूल स्त्री मिलती है, तो वह उस स्थिति को यकायक स्वीकार नहीं कर पाती और यहीं से पारिवारिक महाभारत का एक सिलसिला शुरू हो जाता है। भाभी के आ जाने सेे ननद की दिनचर्या में एक और महत्वपूर्ण अन्तर यह पड़ता है कि बहिन भाई पर अपने विवाह-पूर्व के एकाधिकार को क्रमशः टूटते हुए देखती है। शादी सेे पूर्व भाई अपने अधिकांश दैनिक कार्यो के लिए बहन पर निर्भर रहता है, किन्तु शादी के बाद स्थितियां बदलने लगती है। भाभी भाई के दैनिक कार्यो व आवश्यकताओं का जिम्मा बखूबी खुद संभाल लेती है। पत्नी होने के नाते यह उसका अधिकार भी है। इसके अतिरिक्त अब भाई भी पहले की अपेेक्षा अधिक समय अपनी पत्नी के साथ गुजारना चाहता है। अनचाहे हालात ऐसे बनते है कि बहिन यह अनुभव करने लगती है कि भाई द्वारा उसकी उपेक्षा की जा रही है, और इस उपेक्षा का सीधा कारण उसे भाभी के आगमन में नजर आता है। ननद की इस मानसिकता के साथ ही ननद-भाभी के रिश्तों में टूटन पैदा होती है, जो क्रमशः बढ़ती जाती है। अब ननद का उद्वेश्य अपनी भाभी की कमियां निकालना, उसके मायके को लेकर व्यंग्य करना और भाई को ‘जोरू का गुलाम‘ साबित करना रह जाता है। इस कार्य में आमतौर पर सास भी ननद की सहयोगी होती है। परिवार की शांति अहम् की भेट चढ़कर रह जाती है।
वस्तुतः ननदों को इस स्थिति में जो तरीका अपनाना चाहिए वह है समझौते का बहिन को समझाना चाहिए कि उसका भाई अब केवल भाई नहीं है बल्कि उसे एक आदर्श पति के दायित्व भी निभाने हैं और भाभी जो एक सर्वथा नये माहौल व वातावरण में अपना घर छोड़ कर आई है, उसे आत्मीयतापूर्वक इस नये परिवेश में स्थापित होने के प्रयासों मंे मदद करनी चाहिए। अपने माता-पिता की आलोचना हर किसी को बुरी लगती है। ननद को चाहिए कि वह अपनी भाभी के मायके को कभी आलोचना का शिकार न बनाएं, हो सकता है कि आपको अपनी भाभी की कोई कमजोरी या अवगुण अच्छा नहीं लगता हो। लेकिन इस बात को लेकर पारिवारिक कलह करना तो उचित नहीं। परस्पर सामंजस्य और समझौतावादी दृष्टिकोण से कई कठिन लगने वाली समस्याओ के भी समाधान सरलता से खोजे जा सकते हैं।
जहां तक ननद के साथ भाभी के व्यवहार का प्रश्न है, तो नवविवाहिता भाभी को ‘सास-ननद‘ के प्रति अपने पूर्व परम्परागत पूर्वाग्रहों से मुक्ति पानी होगी। ‘‘ सभी ननदे ऐसी ही होती है वाली मानसिकता बदलनी होगी। ननद आखिर आपके पति की बहिन है, शादी से पहले उसे आपके पति का एकाधिकारपूर्ण स्नेह प्राप्त हुआ है। बहिन होने के नाते अपने भाई पर उसका भी कुछ हक है। यदि ये सारी बातें आप अपने व्यवहार में उतारेगीं, तो न केवल आप अपनी ननद की चहेती भाभी बन सकेंगी, बल्कि एक आदर्श बहू भी सिद्ध होंगी। याद रखिए, ससुराल के एकदम अलग माहौल में आपकी हमउम्र ननद ही आपकी सबसे अच्छी साथी सिद्ध हो सकती है। आपको अपना अधिकांश समय घर में उसी के साथ तो गुजारना है। उम्र की इस दहलीज पर मानसिक रूप से तथा रूचियों के स्तर पर आप अपनी ननद को अपना हमराज बना सकती हैं। वह आपके लिए एक अच्छी दोस्त की कमी को पूरा कर सकती है।
आज जरूरत ननद-भाभी के परम्परागत जर्जर ईष्र्याग्रस्त रिश्तों के समीकरणों को बदलने की है। यह गलत सिद्ध करना बहुत जरूरी है कि ननद और भाभी कभी आत्मीयता और प्रेम से नहीं रह सकती। बस दोनांे पक्षों से सामन्जस्य, समझौते, ईमानदारी और आत्मीयता की दरकार है।
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