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सदियों पुरानी है नाग-पूजन की परंपरा

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हमारे समाज में सर्प को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप में अत्यधिक मान्यता प्राप्त है। प्रत्येक वर्ष संपूर्ण देश में श्रावण-शुक्ला पंचमी को नाग-पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन घर की दीवारों पर सात या नौ सांपों की आकृतियां बनाई जाती हैं तथा विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों के साथ नाग-पूजा की रस्म अदा की जाती है। इस दिन अनेक सपेरे ‘नाग-देवता को दूध पिलाओ‘ की आवाज लगाते हुए निकल पड़ते हैं और श्रृद्धालु गृहणियां उन्हें नाग-देवता को पिलाने के लिए कच्चा दूध देती हैं। सपेरे के सर्पो की विविधत पूजा की जाती है, उन्हें गुलाल लगाया जाता है। इस प्रकार भारतीय जन-मानस नाग-देवता के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए नाग-पंचमी का त्यौहार पूरी आस्था के साथ मनाता है।
सर्प और सूर्य सभ्यता के विकास के शुरूआती दौर से ही संसार के तकरीबन हर भाग में किसी न किसी रूप में पूजे जाते रहे हैं। भारत में तो साहित्य, कला, धर्म और लोक-संस्कृति के क्षेत्र में नाग-पूजा को वैदिक-काल से भी पहले से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। भारतवर्ष में नाग-पूजा की परंपरा कब से प्रारंभ हुई, इस संबंध में कोई प्रमाणिक व निश्चित जानकारी तो उपलब्ध नहीं है किंतु ऐसा माना जाता है कि यह परंपरा वैदिक-काल से काफी पहले से चली आ रही है। प्राचीन भारत में निवास करने वाली अनेक जातियों में एक नाग-जाति थी। इनकी सभ्यता और संस्कृति अत्यंत विकसित अवस्था में थी। सिंधु घाटी की सभ्यता में प्राप्त अवशेष भी उस काल में नाग-पूजा की परम्परा की पुष्टि करते हैं। बौद्ध और जैन धर्म में भी नाग को पवित्र स्थान दिया गया है। उल्लेख आता है कि मलिचंद नामक नाग ने फन फैला कर भगवान बुद्ध की जीवन-रक्षा की थी। जैन तीर्थकर पाश्र्वनाथ के तपस्या-काल की अवधि में स्वयं नाग ने अपना फन फैलाकर धुप, हवा और बरसात से उनकी रक्षा की थी। पाश्र्वनाथ की प्रतिमा पर आज भी सर्प की प्रतिमा अंकित की हुई दिखती है। वैदिक-काल में भी सर्प-विवरण प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है कि इन्द्र ने अहि (सर्प) वृत्रासुर का वध किया। वेदों में वर्णित सर्प-स्तुति का सार है कि उन सर्पो को नमस्कार है, जो सदैव पृथ्वी की परिक्रमा करते रहते हैं, जो स्वर्ग को स्पर्श करते हैं, जो आकाश की ज्योति हैं और जल की तंरगों में हैं। महाभारत से लेकर पुराषों तक अनेक धार्मिक ग्रंथों में नागों के सम्बन्ध में विभिन्न अलौकिक गाथाओं का वर्णन मिलता है। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में फन-युक्त नाग-मूर्तियों का वर्णन किया है। पूर्व मध्य-युग के प्रारंभ होत-होते नागों की आकृतियां मंदिरों की दीवारों पर उकेरी जाने लगीं। कभी अर्द्ध-मानव और अद्ध-नाग की आकृतियां भी निर्मित की जाती थीं।
भारतीय लोक-कथाओं में पाताल-लोक को नाग-लोक माना जाता था। पाताल में स्थित नाग नगर को ‘नागवती‘ नाम से जाना जाता था। देश की प्राचीन स्थापत्य-कला के जो प्रमाण आज भी मौजूद हैं, वे तात्कालीन युग में सर्प-पूजा के महत्व को भली-भांति रेखांकित करते हैं। ईसा पूर्व निर्मित प्रस्तर की एक विशाल नाग-प्रतिमा आज भी दक्षिण भारत के कनाड़ा जिले मेें मौजूद है, जिसका वर्णन चैथी शताब्दी में भारत आने वाले चीनी यात्रियों ने अपने यात्रा-संस्मरणों में किया है। बौद्ध-युग में भी नाग-पूजा के प्रचलन के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। धम्मपद अट्ठ कथा (3/230) में कहा गया है कि बनारस में सात शिरीष के पेड़ो के झुरमुट में एक नाग एकरपŸा को बुद्ध ने धर्म उपदेश दिया था। प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ तैŸिारीय संहिता में भी सर्प-पूजा की परम्परा का उल्लेख मिलता है। ( 4 / 2 / 8 / 3 ) भारत में आज भी अनेक स्थानों पर नागराज के प्राचीन मंदिर स्थित हंै, जहां आज भी नियमित रूप से उनका पूजा-अर्चन होता है।
महाराष्ट्र में प्रचलित एक लोक-कथा के अनुसार, एक किसान ने अपने खेत में हल जोतते समय नागिन के बच्चों को मार डाला। नागिन ने प्रतिशोध लेने के लिए उस किसान के पूरे परिवार को डस लिया। उस किसान की एक विवाहित पुत्री की खोज में नागिन दूसरे गांव में गई तो उसने किसान की पुत्री को नाग-पूजा करते पाया। नागिन प्रसन्न होकर किसान के पूरे परिवार को जीवित करने के लिए अमृत प्रदान कर गई।एक अन्य कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की पंाच पुत्र वधुवों में चार नागपंचमी मनाने अपने-अपने मायके गई। पांचवी के मायका नहीं होने के कारण उसने ससुराल में रहकर ही नाग-पूजा की। इस पर भगवान शेष ने प्रसन्न होकर उसे धन, आभूषण आदि प्रदान कर सदा सुखी रहने का वरदान दिया।
नाग पंचमी की कथाओं में उल्लेख आता है कि बहन के घर नाग-पंचमी के दिना धनी भाई आता है। वह बहन को धन और सम्मान देता है।
नाग-पूजा की परम्परा केवल हिंदू धर्म और भारत तक ही सीमित नहीं है अपितु यह परम्परा प्राचीन-काल ही से विश्व-व्यापी रही है।
मिस्त्र का ईस्वी सन् 2000 पूर्व का इतिहास सांपों में देवत्व की परिकल्पना का साक्षी है। उस युग में लोग अपने घरों में सांपों को पालते तथा उनकी पूजा करते थे। मंडली सांप की मृत्यु के बाद इनकी ‘ममी‘ बनाकर इन्हें दफनाया जाता था। मिस्त्र में ‘ईजो‘ नामक सर्प को बुद्धि का देवता माना जाता था। मेसोपोटामिया और यूनान में भी नाग-पूजा का प्रचलन था। यूनान में सांप को शक्ति का प्रतीक और उर्वरता का सृजक मानकर पूजा जाता था।
आदि-काल में जापानी सर्प को वर्षा का देवता मानकर उसकी पूजा करते थे। वहां सफेद सर्प को देव-दूत और जल-चर सर्प को जल-देवता माना जाता था। नाग-दर्शन को शुभ संदेश माना जाता था। चीन में सांप को कृषि का देवता माना जाता था। वहां सर्प के रक्त को पवित्र मानकर उसे ललाट पर लगाने की भी प्रथा थी। चीन की राजधानी बीजिंग में आज भी एक विशाल नाग-मंदिर स्थित है।
रोमन संस्कृति में सर्पो को अत्यंत पूजनीय स्थान प्राप्त था। वहां के लोग भगवान ज्यसु की पूजा सर्प-देवता के रूप में करते थे। रोम के दक्षिण में स्थित हीरा-मंदिर में अब भी प्रतिवर्ष एक भव्य समारोह आयोजित कर नाग-पूजा की जाती है। इस अवसर पर अविवाहित युवतियां सांपों को जौ से बने केक खिलाती हैं। केक सांप द्वारा खा लिया जाना शुभ संकेत माना जाता है।
फोनेशिया और बेबीलोनिया की प्राचीन सभ्यताओं में भी सर्प-पूजा के प्रमाण मिलते हैं। ईस्वी सम्वत् के शुरू में ही सीरिया और एशिया के अन्य हिस्सों में भी सर्प उपासना का प्रचलन था। तिब्बत में उप-देवता के रूप में नाग-पूजा की परम्परा है।
मध्य अमेरिका और मैक्सिको की पुरातन संस्कृति में सांपों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, स्वीडन, लिथुआनिया, लेटविया आदि देशों में तो सर्प-पूजन का राष्ट्रीय महत्व था और उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक पौलेण्ड में भी सर्प-पूजन का त्यौहार सबसे बड़े राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता था।
हमारे पड़ोसी देश नेपाल नाग को वर्षा और समृद्धि का देवता माना जाता है। यहां नाग-पंचमी का त्यौहार अति उत्साहपूर्ण वातावरण में मनाया जाता है।
इस प्रकार नाग-पूजा की यह सनातन परम्परा न केवल भारत में बल्कि पूरे संसार में सदियों से चली आ रही है।