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Musk deer | कस्तूरी मृग

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Musk deer

मृग अथवा हिरण स्तनपायी प्राणी – वर्ग का एक बेहद खूबसूरत जीव है । वैसे तो हिरणों की पूरी नस्ल ही एकदम सीधी – सादी व भोली – भाली होती है लेकिन अपनी अनुपम सुगंध के लिए विख्यात कस्तूरी मृग तो और भी अधिक कमसिन किस्म का प्राणी है ।

सुगंध का पर्याय कस्तूरी मृग (Musk deer)

भारतीय जीवन , संस्कृति और साहित्य में तो कस्तूरी मृग को सुगंध का पर्याय माना गया है । संस्कृत साहित्य में इसे अत्यंत महत्व दिया गया है । संस्कृत में इसे मृग – नानि . अंगेजी में मस्क , अरबी में मुश्क तथा नेपाली भाषा में झंकारमय वीणा कहा जाता है । वस्तुतः कस्तूरी मृग भूरे अथवा लोहे के रंग का प्राकृतिक रूप से रहने वाला एकांतप्रिय जीव है । शारीरिक संरचना की दृष्टि से यह एक अत्यंत सुंदर व दुर्लभ कोटि का   है ।

सामान्यतः इसकी ऊंचाई ढाई फीट तथा लंबाई साढ़े तीन फीट तक होती है । वजन करीब 20 पौंड होता है । इसके अगले पांव अपेक्षाकृत छोटे होते हैं तथा अगले पैरों की हड्डियों में जोड़ नहीं होता । इसी कारण इनकी दौड़ने व चौकड़ियां भरने की गति अत्यंत तीव्र होती है । इसके चारों पांव पतले और मजबूत होते हैं, जिनके द्वारा यह पथरीले व चट्टानी धरातल पर भी आसानी से कुलांचे भर सकता है । इसका मुंह लंबाई लिए हुए होता है तथा जबड़ों के ऊपरी हिस्से में हाथी के बाहरी दांतों की तरह करीब तीन इंच लम्बे दो दांत होते हैं , जो नीचे की ओर झुके रहते हैं ।

इनका उपयोग यह शत्रु से अपनी रक्षा के लिए करता है । इसकी छोटी – छोटी आंखे बहुत तेज होती हैं , इसी प्रकार श्रवण – शक्ति भी लाजवाब होती है । जरा – सी आहट पाते ही यह चौकड़ियां भरता नजर आता है । कस्तूरी मृग का पूरा शरीर भूरे खुश्क बालो से ढका होता है । इसके सींगों व पूंछ की लंबाई बहुत ही कम होती है ।

नर कस्तूरी मृग की नाभि में ही पाई जाती है-कस्तूरी(Musk deer)

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Musk deer

जो वस्तु कस्तूरी मृग का इतना अधिक महत्वपूर्ण बनाती है , वह है – इसकी नाभि में पाई जाने वाली लालिमा लिए हुए काले रंग की तीक्ष्ण सुगंध वाली मूल्यवान कस्तूरी । यह आम धारणा है कि कस्तूरी नर और मादा दोनों की नाभि में रहती है । लेकिन वस्तुतः ऐसा नहीं है । नर कस्तूरी मृग की नाभि में ही यह अनमोल वस्तु पाई जाती है । नर कस्तूरी मृग की नाभि व शिश्नावरण के मध्य एक दो – तीन इंच लंबी अंडाकार थैली होती है । इसके अगले हिस्से में एक महीन छेद होता है , यह थैली अंदर से अस्पष्ट रूप से अनेक हिस्सों में विभक्त होती है । इसी हिस्से में कस्तूरी रहती है ।

कस्तूरी मृग में कस्तूरी की उत्पत्ति का सीधा संबंध उसकी काम – भावना से है । यही कारण है कि युवा मृग में शिशु मृग व वृद्ध मृग की अपेक्षा अधिक कस्तूरी पाई जाती है । साल में एक मास का ‘ मद – काल ‘ होता है . इस अवधि में नर मृग में काम – ज्वार का प्रबल आवेग रहता है । इस दौरान मृग की नाभि में छुपी कस्तूरी की महक इस कदर तेज होती है कि स्वयं मृग व्यग्र व्याकुल होकर कस्तूरी की खोज में भटकता फिरता है । कस्तूरी के प्रभाव से मृग के मल – मूत्र तक कस्तूरी की महक आने लगती है ।

दो से ढाई वर्ष लगते हैं (Musk)कस्तूरी को पकने में

एक वर्ष की आयु में मृग की नाभि में कस्तूरी – निर्माण की प्रकिया प्रारंभ होती है । उस समय कस्तूरी का रंग – रूप श्वेत व तरल रहता है । करीब दो – ढाई वर्ष की अवस्था में कस्तूरी पक जाती है । तब उसका रंग कमशः श्याम – वर्ण , रक्ताभ तथा स्वरूप दानेदार हो जाता है । पूर्ण परिपक्व कस्तूरी का रंग जमे हुए रक्त की भांति होता है । एक मृग की नाभि से निकलने वाली कस्तूरी की मात्रा उसके स्वास्थ्य , आयु और नस्ल पर निर्भर करती है । वैसे आमतौर पर एक मृग की नाभि में दो से पांच तोला तक कस्तूरी निकलती है ।

रासायनिक शब्दावली में कस्तूरी को एक प्रकार का कीटोन माना गया है . जिसे ‘मस्कोन ‘ नाम दिया गया है । रासायनिक संरचना के नजरिये से कस्तूरी के गठन में ओलीन , मोम , वसा , कोलेस्टीन , राख , अलव्यूमिन , जिलेटीन आदि तत्वों का योगदान रहता है । स्वाद में यह तीक्ष्ण तथा कुछ कड़वाहट लिए हुए होती है । गुण – धर्म की दृष्टि से यह काम – भावना को उकसाने वाली तथा मस्तिष्क को उत्तेजित करने वाली वस्तु है ।

कस्तूरी के कारण खतरे में है कस्तूरी मृग

(Musk deer)

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Musk deer

शुद्ध कस्तूरी का वर्तमान मूल्य आठ  से पन्द्रह हजार रूपये प्रति ग्राम है , जबकि सन 1947 में इसका मूल्य दस रूपये प्रति ग्राम था । कस्तूरी के बढ़ते मूल्य व इसकी दुर्लभता ने कस्तूरी मृग के प्राणों को संकट में डाल रखा है । भारी कमाई के लालच में उनका अंधाधुंध शिकार प्रारंभ हो गया है और स्थिति यहां तक आ गई है कि कस्तुरी मृग की संपूर्ण प्रजाति के लुप्त हो जाने का खतरा पैदा हो गया । तब सन 1972 में एक कानून बनाकर इसके शिकार को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया । लेकिन इसके बावजूद आज भी चोरी – छिपे इनका शिकार जारी है ।

क्रूरता से निकाली जाती है कस्तूरी(Musk deer)

कस्तूरी मृग से दो तरीकों से कस्तूरी प्राप्त की जाती है । पहला तो यह कि बंदूक की गोली से कस्तूरी मृग को मारकर उससे कस्तूरी की नाभि या गांठ निकाल ली जाती है । दूसरा तरीका ज्यादा क्रूरतापूर्ण है । इसमें शिकारी किसी तरह से कस्तूरी मृग को एक गड्डे में गिराने में सफल हो जाते हैं । इसके बाद तेज धार का चाकू निकालकर उसकी नाभि को चीरकर कस्तूरी की गांठ निकाल ली जाती है । चीरे हुए स्थान को शिकारी फिर सी देते हैं तथा मृग को गड्डे से निकाल कर छोड़ दिया जाता है । मृग कैद से छूटने की खुशी में अपना दर्द भुलाता हुआ कुलांचे भरकर भाग खड़ा होता है ।

कस्तूरी मृग मूलतः हिम – पशु है , जो हिमालय की तराइयों के घने वनों में करीब बारह हजार फुट की ऊंचाई पर पाया जाता है । यह भारत में मुख्यतः गंगोत्री के उद्गम स्थल गो – मुख , केदारनाथ , उत्तरप्रदेश के कुमायूं गड़वाल आदि शीत – प्रदेशों में निवास करता है । इसे गर्म जलवायु कतई रास नहीं आती । यह मूलतः शाकाहारी प्राणी है , जो पहाड़ी जंगलों में उगने वाली वनस्पति फूल पत्ते , घास आदि खाता है । यह स्वभाव से शांत एवं संकोची प्रवृति का पशु है ।

पर्यावरण संतुलन के लिए जरूरी है कस्तूरी मृग (Musk deer)

 कस्तूरी मृग अपनी घटती हुई संख्या के कारण अंतर्राष्ट्रीय महत्व का एक दुर्लभ प्राणी बन गया है । धन – लिप्सा में लोग बड़े पैमाने पर इनकी हत्याएं कर रहे हैं , जिनको

 रोका जाना न केवल वैधानिक दृष्टि से बल्कि पर्यावरण के संतुलन के वास्ते भी जरूरी है अन्यथा तक कस्तूरी मृग ढूंढे से न मिलेंगे।

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