मुगल बादशाह भी मनाते थे होली!

        
                   
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होली हमारा बहुत प्राचीन रंगोत्सव रहा है। दूसरे मुल्कों से आए बादशाह भी हमारी होली से अछूते नहीं रहे। उन्होंने भी रंगो के इस रंगीले त्यौहार में दिलचस्पी दिखाई और पूरे उल्लास के साथ इसका आनंद लिया।
बादशाह अकबर, मुगल बादशाहों में अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु और उदार शासक था। वह अपनी बेगमों और दासियों के साथ पूरी उमंग से होली खेलता था। होली वाले दिन उसके महल में चारों ओर गुलालों की गुब्बार और रंग ही दिखाई पड़ता था। डा0 ईश्वरीप्रसाद ने लिखा है कि अकबर हिंदू धर्म के प्रति सहानुभूति और हिंदी-साहित्य के प्रति संरक्षण का भाव रखता था। इतिहासकारों का कथन है कि होली के दिन अकबर को हरम में खासतौर पर बुलाया जाता था और वहां बेगमें व दासियां रंग-भरी पिचकारियां अकबर पर चलाती थीं। बेगम अकबर को टीका लगाकर उन पर खूब गुलाल बरसाती थीं। अकबर के लिए यह पर्व सिर्फ खाना-पूर्ति नहीं था बल्कि स्वयं रूचि से इसमें हिस्सेदारी करता था।
सम्राट शाहजहां के समय भी होली-परम्परा बदस्तूर जारी रही। यहां के लोगों को लगने लगा था कि हिंदू पर्व अब मुसलमान बादशाहों का भी रूचिकर पर्व बन गया है। शाहजहां भी दरबारियों के साथ खुलकर रंग खेलता था। इसके अलावा, होली के दिन वह कुछ समय अपनी जनता के साथ भी बिताता था। शाहजहां ने कभी भी आम जनता को यह महसूस नहीं होने दिया कि यह हिन्दू त्यौहार है और मुसलमान होने के नाते उसका इससे कोई लेना-देना नहीं है।
लेकिन औरंगजेब धार्मिक कट्टरता से भरपूर था। इसलिए वह न केवल होली, बल्कि सभी हिंदू त्यौहारों के सख्त खिलाफ था। औरंगजेब की धार्मिक कट्ट्रता इस हद तक थी कि वह दीपावली को अंधविश्वास और होली को अश्लीलता का परिचायक मानता था। अपने शासन-काल में उसने राजमहलों में मनाए जाने वाली होली पर पाबंदी लगा दी। उसके भय से आम जनता भी खुले तौर-पर होली नहीं मनाती थी। 1665 में औरंगजेब ने एक फरमान जारी किया: ‘ अहमदाबाद नगर और गुजरात में हिंदू लोग होली पर अश्लील बातें मुंह से निकालते है व अश्लील हरकतें करते हैं। चैराहो पर, बाजारों में होली जलाते हैं और चुराकर अथवा छीनकर लोगों की लकड़िया इस होली में डाल देते हैं। लिहाजा हुक्म दिया जाता है कि किसी की लकड़ियां चुराकर अथवा छीनकर होली में न डाली जाएं व अश्लील हरकतें भी न की जाएं।‘
जहांगीर के समय में होली के रोज कई घडे़ रंगो से भरे जाते थे। सबसे पहले शंहशाह जहांगीर अपनी रंग-भरी पिचकारी, अपने बेगम नूरजहां पर चलाते थे। फिर बेगमें, नाजनीनें रंग-भरी पिचकारी एक दूसरे पर चलाती थीं। अधिकांश रंग लाल होता था। वे एक-दूसरे पर जमकर अबीर और गुलाल फेंकते थे। उस समय खूबसूरत लड़कियां पिचकारियों में रंग भरकर शाहजहां से होली खेलती थीं।
मुगल बादशाह जहांदार शाह बेहद रंगीन तबियत का शख्स था। होली का त्यौहार वह अपनी पे्रमिका लाल कंुवर के साथ मनाता था। प्रेमिका लाल कुंवर ने एक दफा बादशाह से अपनी दिली ख्वाहिश जाहिर की कि यदि होली इत्र से खेली जाए, तो कितना आंनद आए! बस, फिर क्या था। उसी समय बादशाह ने दिल्ली का सारा इत्र खरीदवा लिया और चांदी की पिचकारियों में गुलाब, हिना, खस, मोगरा आदि इत्र भर लिए गए हौर हरम में चारों ओर इत्र की फुहारें चलने लगीं। सारा माहौल खुशनुमां और खुश्बूदार हो गया। कहा जाता है, लम्बे अर्से तक हरम इस खुश्बू से महकता रहा।
बादशाह फारूखसियर यद्यपि इतिहासकारों के अनुसार, डरपोक, अनुभवशून्य व बुद्धिहीन था। मगर वह धार्मिक मामलों में औरंगजेब की भांति कट्टर नहीं था। पेरिस संग्रहालय में, फारूखसियर के काल का एक चित्र सहेज कर रखा हुआ है, जिसमें उस काल की होली का काफी विस्तृत चित्रण हुआ है। बादशाह फारूखसियर के जमाने में होली वाले रोज दासियां रगीन पानी, अबीर, इत्र और गुलाल लिए खड़ी रहती थी। उस समय महल में नाच-गाने की महफिलें चलती रहती थीं। फिर बादशाह आते और बेगम पर पिचकारी चलाते थे। तब दूसरे लोग आपस में होली खेलना आरंभ करते थे।
बादशाह मोहम्मदशाह रंगीले चांदी की पिचकारी के द्वारा अपनी बेगम के संग होली खेलते थे। पास में, चांदी की तश्तरी में बेहतरीन किस्म का सुगंधित गुलाल पड़ा रहता था, जो बादशाह आने-जाने वालोें को लगाते थे।
इस तरह यह सुस्पष्ट है कि मुस्लिम बादशाहों ने भी भारत की होली में दिलचस्पी दिखाई और होली के रंग में खूब भीगे। औरंगजंब अकेला अपवाद बादशाह है।