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मौत को मात

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बहुत साल गुजर गये, सात समुद्रों और शीशे की पहाड़ियों के उस पार टूटे-फूटे तंदूर की दीवार के पीछे एक बहुत बूढ़ी औरत रहती थी। वह पहाड़ियों से भी ज्यादा बूढ़ी थी। उसने कभी मौत के बारे में सोचा ही न था। उसके सब दांत गिर गये थे। फिर भी वह दिनभर काम करती रहती। वह सोचती कि एक दिन वह बहुत अमीर हो जाएगी। उसका बस चलता तो वह सारी दुनिया को घर में रख लेती। किंतु फिर भी वह बेहद अकेली थी। उसका इतनी बड़ी दुनिया में कोई न था। लेकिन उसका उत्साह बेकार न जाता। वह दिन-ब-दिन अमीर और मोटी होती चली गयी।
एक दिन मौत ने अपना निशान उसके घर के मुख्य दरवाजे पर लगा दिया और उसे लेेने आ गयी। लेकिन वह बूढ़ी औरत अपनी दौलत छोड़कर कहीं भी नहीं जाना चाहती थीं। उसने मौत से थोड़ा-सा समय मांगा। दस साल….या फिर पांच….या एक साल, लेकिन मौत ने बुढ़िया की एक न सुनी।
‘जल्दी करो और चलो। नहीं तो मैं जबरन ले जाऊंगी।‘ – मौत ने कहा।
लेकिन बुढ़िया मिन्नतें करती रही, भीख मांगती रही – ‘थोड़ी देर, बस थोड़ी देर।‘ किंतु भला मौत को कौन समझा सकता है। बूढ़ी औरत बहस करती रही।
‘अच्छा ठीक है। मैं तुम्हें तीन घंटे देती हूं।‘
‘लेकिन यह तो बहुत कम हैं। आज मत ले जाओ, बेशक कल ले जाना।‘
‘यह तो असभंव है।‘
‘लेकिन फिर भी थोड़ा समय दे दो।‘
‘अच्छा!‘ – आखिर तंग आकर मौत ने कहा – ‘तुम इतनी जिद्दी हो तो आज जो तुम चाहती हो, वही होगा।‘
‘लेकिन मेरी एक और इच्छा है। मेरे दरवाजे पर लगा निशान मिटा जाओ और लिख जाओ कि तुम कल तक नहीं आओगी। इससे मुझे तसल्ली रहेगी।‘
मौत का यूं भी काफी समय बर्बाद हो चुका था। उसने अधिक बहस न की और जेब से चाक निकाला और दरवाजे पर पर ‘कल‘ लिखकर चली गयी।
अगले दिन सूरज निकलने से पहले मौत फिर आ धमकी। बूढ़ी औरत, जो अपने पलंग पर आराम से सो रही थी, हडबड़ाकर उठी और बोली – ‘नहीं, इतनी जल्दी नहीं। देखो, बाहर तुम्हारे हाथ से क्या लिखा हुआ है?‘
मौत ने दरवाजे पर नजर डाली। उसका ही लिखा शब्द ‘कल‘ उसे नजर आ रहा था।
‘ठीक है पर भूलना मत। मैं कल फिर आऊंगी।‘ – मौत ने जाते-जाते कहा।
अगले दिन वह सुबह-सुबह लौट आयी। बुढ़िया अभी सो ही रही थी। उसने फिर साथ जाने से साफ इंकार कर दिया और मौत को फिर दरवाजे पर लिखा शब्द ‘कल‘ दिखा दिया।
यह खेल सप्ताह-भर तक चलता रहा। सातवें दिन मौत का सब्र टूट गया। वह बोली – ‘काफी तमाशा हो चुका। अब मैं तुम्हारी एक न सुनूंगी। अब मुझे इस निशान की जरूरत है। मैं इसे ले जा रही हूं। याद रखना, मैं कल आऊंगी और हर सूरत में तुम्हें ले जाउंगी।‘
मौत तो चली गयी। किंतु बुढ़िया का मन दुख से भर गया। वह समझ गयी कि कल तो उसे मरना ही पड़ेगा।
अगले दिन वह बौखलाई-सी घूमती रही, उसका बस चलता तो वह किसी बोतल में छिप जाती। छिपने के लिए वह अच्छी-सी जगह ढंूढती रही। तभी उसे याद आया कि उसके पास एक बड़ा शहद का मटका है। वह उसी में घुस गयी। फिर उसने सोचा – मौत कहीं यहां भी मुझे न देख ले। यह सोचकर वह शहद में से निकलकर पंखों की बनी रजाई में घुस गयी। वहां भी उसे डर लगता रहा। वह बाहर निकल आयी। उसी समय मौत आ गयी। लेकिन इस भयानक अजीबोगरीब चीज को देखकर मौत इतनी डर गयी कि बेतहाशा भागने लगी। फिर उसने कभी उस बुढ़िया के पास लौटने का साहस नहीं किया। कहते हैं, वह बुढ़िया अभी भी जीवित है।