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विवाह संस्था | Marriage institution Information in Hindi

विवाह मानव सभ्यता की पहली संस्था है | आदिम-युग से मनुष्य ने
अपने जीवन के बिखराव को समेटने की परिकल्पना की । उसी का परिष्कृतरूप विवाह संस्था के बारे में हम आपको कुछ जानकारी देते हैं !

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विवाह संस्था

विवाह का उद्देश्य

विवाह मानव सभ्यता की पहली संस्था है | आदि-दयुग से मनुष्य ने अपने जीवन के बिखराव को समेटने की परिकल्पना की । उसी का परिष्कृत रूप विवाह संस्था के रूप में हमारे समक्ष है | आज विवाह संस्था हमारे समूचे
सामाजिक और पारिवारिक जीवन की धुरी है । हिंदू संस्कृति में तो विवाह को एक अत्यंत गौरवशाली और अति पवित्र धार्मिक संस्कार माना गया है । मनु के अनुसार धर्म-पालन , पुत्र-प्राप्ति , एवं रति-सुख विवाह के मुख्य उद्देश्य हैं। इस्लाम धर्म में विवाह को एक अनुबंध माना गया है। जो भी हो , विवाह-सस्था मानव-सभ्यता के विकास-कम के अनुरूप बदलते जीवन-मूल्यों के साथ हर युग में बदलती रही है ।

क्या सचमुच विवाह की आवश्यकता नहीं हैं !

आज पाश्चात्य संस्कृति के काुप्रभावों ने हमारे देश में जीवन के हर क्षेत्र
की तरह विवाह-संस्था को भी प्रभावित किया है । ऐसा प्रदर्शित किया जा रहा
है कि मानो विवाह-संस्था की उपयोगिता ही समाप्त हो गई हो ! पश्चिम से
आयातित तथाकथित नारी-मुक्ति आंदोलन की विचारधारा ने विवाह सरीखे
नैसर्गिक समाजी इंतजाम के खिलाफ बगावत का परचम थामा। इस सोच के
अलमबरदारों का तर्क था कि विवाह – संस्था ने नारी को पुरूषों का गुलाम
बना छोड़ा है | अतएव स्त्री -पुरूषों के उन्मुक्त प्रेम और यौन-संबंधों की पैरवी
करते हैं और कहते हैं कि जब तक निभे , साथ रहें , फिर सहजता से जुदा हो
जाएं | उनके मुताबिक , शादी एक ऐसा बंधन है , जो स्त्री को जिंदगी-भर के
लिए एक खूंटे से बांधकर रख देता है।

वस्तुतः विवाह का अर्थ औरत और आदमी की एक-दूसरे के प्रति बेलाग
प्रतिबद्धता है | जब स्त्री पुरूष विवाह करते हैं , तो वे शारीरिक और मानसिक
स्तर पर एक ईकाई के रूप में रहने को सहमत होते हैं | उनकी यह
पारस्परिक सहमति ही पारिवारिक जीवन की शुरूआत है | इस शुरूआत से
मनुष्य के सामाजिक जीवन की नींव पड़ती है और कालांतर में नारी और पुरूष
के संयोग से उत्पन्न बच्चे पारिवारिक जीवन का केन्द्र बिंदु बन जाते हैं ।
दरअसल सृष्टि के विकास-कम की सर्वाधिक नाजुक कड़ी बच्चे ही होते हैं।

उनकी स्थिति को देखकर ही विवाह-संस्था की परिकल्पना उभरी होगी। यदि विवाह-संस्था न हो तो बच्चों कें पोषण की जिम्मेदारी कौन वहन करेगा ? समाज में बच्चे को अपना नाम कौन देगा ? जब पुरूष निश्चित रूप से यह नहीं जान सकें कि यह बच्चा उसका है या नहीं ? तब भला वह क्यों उस बच्चे को पालने में रूचि लेगा? क्या विवाह संस्था के अभाव में यह कठिन और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी सिर्फ मां को ही वहन करनी होगी ? ऐसे सैंकड़ों सुलगते सवाल उठ खड़े होंगे, यदि विवाह संस्था का अस्तित्व नहीं रहा।

प्राकृतिक यौन- इच्छाओं की पूर्ति करता है विवाह

स्त्री और पुरूष की भी अपनी मौलिक प्राकृतिक आवश्यकताएं होतीं हैं
जो यौन संबंधों और प्रेम संबंधों के रूप में प्रकट होतीं हैं | विवाह-संस्था के
रूप में इन संबंधों को नियंत्रित कर सामाजिक मान्यता प्रदान की गई | यह
सत्य है कि विवाह संस्था को भी कई आरोपों से जूझना पड़ा और उसमें कई
बार दरार आई । हर किसी का दाम्पत्य – जीवन सुखमय नहीं होता ।
अनेकानेक कारणों और स्थितियों के कारण विवाह असफल भी होते हैं | लेकिन
इसका मतलब यह तो नहीं कि समूची विवाह-संस्था ही अप्रासंगिक और
अर्थहीन हो गई हो ।

विवाह – मुक्त समाज से अराजकता फैलने की आशंका

नारी-मुक्ति के तथाकथित मसीहाओं के उन्मुक्त और स्वच्छंद यौनाचार
के आकर्षण में विवाह-संस्था को जी-भरकर कोसा , प्रेम और सेक्स को ही
जीवन का प्रमुख और अंतिम लक्ष्य घोषित कर दिया । किंतु वे भूल गए कि
इस सारी प्रकिया में पैदा होने वाले बच्चों का क्या होगा ? माता-पिता के
विकल्प के रूप में बच्चों के वास्ते कौन- सी व्यवस्था उनकी योजना में है? इन
सवालों का उनके पास कोई संतोषप्रद जवाब नहीं है ।

जिस तरह प्रेम और सेक्‍स आदमी की मूलभूत नैसर्गिक जरूरत है , उसी
तरह संतान की कामना भी एक प्राकृतिक आवश्यकता है | संतानहीन
दम्पत्तियों का दर्द किसी से छुपा नहीं है । जहां संतान से स्त्री को मातृत्व का
गौरव हासिल होता है , वहीं पुरूष को भी अपनी सार्थकता का बोध होता है |
इसलिए सृष्टि के अविरल कम में विवाह-संस्था की उपयोगिता सर्वकालिक है
और रहेगी ।

स्वच्छंद और उन्मुक्त यौनाचार की विचारधारा सामाजिक अव्यवस्था का
ऐंसा जंगल है , जिसमें चाहे जितना भंटकने के बाद भी आदमी को सुकून नहीं
मिल सकता । जहां रिश्ते-नाते की कोई अहमियत नहीं , कोई सामाजिक
कानून-कायदे नहीं , मात्र अंधी उन्मुक्तता है , वहां की अराजक और वीभत्स
स्थिति की कल्पना भी दूभर है ।

भारत में विवाह -मुक्त व्यवस्था अव्यवहारिक

हमारे देश के संदर्भ में तो विवाहहीन समाज की बात सोचना भी एक
मूर्खतापूर्ण कार्य है | हमारी सामाजिक व्यवस्था , संस्कृति और सामाजिक
परिवेश विवाह-संस्था पर पूरे तौर पर आश्रित है । हां , विवाह की पद्धतियों में
कुछ दोष या खामियां हो सकती हैं । दहेज जैसी सामाजिक बुराइयों ,
रूढ़िवादिता ,शादियों में दिखावा , आडम्बर , हैसियत से अधिक फिजूलखर्ची
जैसी विसंगतियों ने विवाह संस्था को अधिक विवादास्पद बनाया है । लेकिन
इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता है कि सम्पूर्ण विवाह-संस्था को ही
व्यर्थ , फिजूल और अप्रासंगिक करार देकर खारिज कर दिया जाए।

विवाह संस्था के टूटने से आदिम -युग में लौटेगा मानव

विवाह संस्था के टूटने का सीधा सा अर्थ है, उस आदिम युग में फिर से वापसी जहां जंगल का कानून चला करता था और निश्चय ही आदमी सभ्यता के कईं सोपान तय करके वापस जंगलयुग में लौटने के लिए तो यहां तक नहीं आया था।