mangalkarta ganesh

मंगलकर्ता गणेश

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मंगलकर्ता गणेश

तैंतीस करोड़ देवी देवताओं में सर्वाधिक लोकप्रिय देवता हैं गणेश। गणेश एक ऐसी देवमूर्ति हैं, जिन्हें विचित्र होने के साथ-साथ मंगलमय भी माना जाता है। बच्चे जहां गणेश के रंग-रूप और आकार को देखकर आनंदित होते हैं, वहीं युवा व वृद्धजन गणेश को प्रथम पूजनीय देवता मानकर सश्रद्धा उन्हें नमन करते हैं। गणेश चतुर्थी के दिन हजारों-लाखों कंठो से यही स्वर निकलता हैः
‘गणपति बप्पा मोरिया।
पुढ़च्यावर्षी लवकर या।।‘
गणेश चतुर्थी के दिन हर हिंदू परिवार में गणेश की पूजा अनिवार्य है। गणेश की पूजा परपंरागत विधि के अनुसार एक मुट्ठी चावल के साथ पान का एक पŸाा या गोबर का छोटा सा पिण्ड गणेश की मूर्ति के सामने समर्पित किया जाता है तथा ऋग्वेद की ‘गणना त्वां गणपतिय‘ स्तुति पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ की जाती है। फिर ‘ओम महागणपतिये नमो नमः निर्विघ्न करू‘ शब्दों से उन्हें नमस्कार किया जाता है।
गणेशोत्सव को हम राष्ट्रीय एकता के परिपेक्ष्य में ले सकते हैं। दरअसल यह एक अकेला ऐसा उत्सव है, जो विविध रूपा भारत को एक सूत्र में पिरोता है। समूचे भारत में , हर प्रांत में, हर गांव-नगर में गणेशोत्सव एक सरीखे उल्लास के साथ मनाया जाता है। गणेशोत्सव को सार्वजनिक पर्व का आकार देने का श्रेय लोकमान्य बालगंगाधर तिलक को जाता है। जब उन्होने इसे सार्वजनिक पर्व का दर्जा देने का प्रयास किया, तब इसकी सामयिक प्रासंगिकता काफी अधिक और महत्वपूर्ण थी। दरअसल उन दिनों भारत पर ब्रिटिश हुकूमत थी, जो ‘फूट डालो राज करो‘ की नीति के मुताबिक भारत के लोगों को एक दूसरे से अलग करने की हरचंद कोशिश कर रही थी। ऐसे में एक ऐसे सार्वजनिक पर्व की सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी, जो समूचे भारत वर्ष के लोगों को एकता के सूत्र में पिरो सके। चूंकि गणेश सदियों से समूचे हिन्दुस्तान के आराध्य देवता रहे हैं, इसलिए तिलक ने गणेशोत्सव को विखंडित होने से बचाने के लिए भारत के सार्वजनिक पर्व का दर्जा दिया। इस तरह उन दिनों गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बनकर उभरे। अपने प्रभावकारी व्यक्तित्व से गणेश ने न केवल देश को विखंडित होने से बचाया, बल्कि जुझारू होकर अन्याय करने वाली शक्तियों से लोहा लेने को प्रेरित भी किया। आज भी गणेशोत्सव पर संपूर्ण भारत में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन देश को एकाकार बनाता है व पारस्परिक सद्भाव व एकता की भावना को पुष्ट करता है।
गणपित या गणेश वद्य में ‘गण‘ शब्द मुख्य है। इसका काफी प्राचीन उल्लेख हमें पुरातन ग्रंथ ‘ऋग्वेद‘ में प्राप्त होता है। ‘ऋग्वेद‘ ( 8: 94: 12 ) में इसका प्रयोग किया गया हैं, जिसके अनुसार इसका अर्थ समूह है। जहां इन्द्र वरूण, कुबेर, यम, दिक्पाल, विश्वकर्मा आदि वर्ग-प्रधानों का जिक्र है, वही केवल ‘मरूत‘ के साथ इस शब्द का उपयोग हुआ है। वेद की तकरीबन पांच सौ ऋचाओें में इनके कार्य का जिक्र है, जिसका अर्थ है कि यही केवल उस काल के अधिसंख्यक व्यक्ति थे।
गणेश की उत्पति या जन्म के संबंध में भी हमें अनेक रोचक कथाओं से जानकारी मिलती है। इन कथाओं से एक बात तो पूरे तौर पर स्पष्ट है कि उनका जन्म एवं विकास लीक से हटकर था। एक कथा के अनुसार, गणेश को हाथी-मुख वाली मालिनी राक्षसी का पुत्र बताया गया है, जिन्हें बाद में देवी पार्वती ने अपना लिया। एक अन्य कथा बताती है कि पार्वती ने अपने शरीर के मैल से पुतला बनाकर उसमें प्राण फूंक दिए थे। यही गणेश जी बने। ऐसे ही ‘ब्रह्म वैवर्त पुराण‘ के अनुसार शनि की दृष्टि के कारण गणेश का सिर कटकर गिर पड़ा। बाद में भगवान विष्णु ने हाथी का सिर काटकर उनके धड़ के लगा दिया। ‘स्कंद पुराण‘ इस सम्बन्ध में कुछ और ही कहती है। उसके अनुसार सिंदूर नामक राक्षस से गर्भ में घुसकर उनका सिर काट दिया। बाद में गणेश ने जन्म लेकर इस गजासुर को मार डाला और उसका सिर अपने लगा लिया। इतिहासज्ञों का कहना है कि गुप्त युग से पहले गणेश की मूर्तियां प्राप्त नहीं होतीं। इससे यह तथ्य जाहिर होता है कि गणेश-पूजा का वर्तमान रूप गुप्त युग में ही निर्धारित हुआ होगा। हमारे पुराणों का अधिकांशतः रूप भी गुप्त युग में ही संशोधित हुआ। पुराणों का संशोधन जब गुप्त युग में किया गया, तब ही उसमें गणेश के नए रूप से संबंधित कुछ आख्यान जोड़ दिए गए होंगे।
महाराष्ट्र में गणेश और गणेशोत्सव सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। वहां के अनेक संतों ने उनकी स्तुति में कई पद्यों की रचनाएं की हैं। शायद आपके लिए यह आश्चर्यजनक तथ्य होगा कि हिंदू ही नहीं, मुस्लिम कवियों ने भी अपनी कविताओं में गणेश-स्तुति की है। औरंगजेब के वजीर मिर्जा काजिल अली ने विनायक को गुण-नायक, सिद्धिवृद्धिदाता, सुख-सागर आदि संज्ञाएं देते हुए एक कविता लिखी, उसका एक अंश इस प्रकार हैः

‘जय-जय गणनायक, सिद्धि विनायक…

बुद्धि विधायक, भय हरणम् ।

जय खल विधन विगाहन,

मूषक वाहन जन शरणम्।।



कई मुस्लिम कवियों ने अपनी गं्रथ रचना के प्रारंभ में गणेश का स्मरण भी किया। मेरठ के कवि खैराशाह ने अपने ग्रंथ ‘बारहमासा‘ के प्रारंभ में गणेशाय नमः लिखा। महाराज छत्रसिंह के दरबारी कवि ईस्वी खां ने भी अपने एक ग्रंथ की शुरूआत ‘श्री गणेशाय नमः‘ लिखकर की। इस तरह यह स्पष्ट है कि गणेश हिंदू, मुस्लिम आदि सभी सम्प्रदायों व कवियों के आराध्य रहे।
गणेश विश्व-व्यापी देवता हैं। हिंदू धर्म के अतिरिक्त बौद्ध धर्म में भी गणेश का विशिष्ट स्थान है। तांत्रिक बौद्धों ने बुद्ध की कल्पना विनायक के रूप में ही की है। इन तांत्रिकों द्वारा उपासना के वास्ते गणेश की अनेक प्रतिमाएं बनाई गईं । बौद्धित्सव में मानने वाले बौद्ध तांत्रिकों ने गणपति की एक शक्ति की भी कल्पना की है, जो ‘गणपति हृदया‘ नाम से विख्यात है।
विदेशों में गणेश को आराध्य देवता माना जाता है। भारत के निकटवर्तीय चंपा द्वीप में गणपति मान्य हैं। चंपा द्वीप के पो-नगर और माई-सोन नगर में गणेश मंदिर बने हुए हैं। अन्य नगरों में भी उमा और कार्तिकेय के साथ इस देवता की प्रतिमाएं मिली हैं।
इसी तरह जावा द्वीप में ब्रह्मा और शिव के साथ मलाया में देवी दुर्गा के संग गणपति की मूर्तियां पाई जाती हैं। वाशिंगठन में ‘एशिया इंडिया‘ में गणेश की एक मूर्ति का चित्र है, जिसमें वह अत्यंत सजे हुए दिखाई देते हैं। इसका काल, इतिहासज्ञों के अनुसार, पांचवी सदी का माना जाता है।
भारत के उŸार-पूर्व देशों में भी गणपति-पूजा की परंपरा के उल्लेख मिलते हैं। नेपाल में गोरखा (हिंदू) और नीवारी (बौद्ध) दोनों संप्रदायों के अनुयायी गणेश के उपासक हैं। नेपाल में गणेश को ‘हेरम्ब विनायक‘ नाम से जाना जाता है। तिब्बत में, जो नेपाल का पड़ोसी है, गणपति को ‘सोरद्दान‘ कहा जाता है। वहां पर बौद्धों ने विनायक को ‘मंगलकर्ता विघ्ननाशक‘ की संज्ञा दी है।
तिब्बत की तरह ही चीन के बौद्धों ने भी गणपति को आराध्य देवता के रूप में स्वीकार किया। चीनी भाषा में गणपति को ‘कुआन-शीती-एन‘ कहा जाता है।
चीन से गणपति की कल्पना जापान तक जा पहुंची। जापानी भाषा में गणपति को ‘कांगी तेन‘ कहा जाता है। जापान में गणेश के मानने वालों का अपना अलग सम्प्रदाय है, जिसे ‘शिगोन सम्प्रदाय‘ कहते हैं।
मारीशस, श्रीलंका, बंगला देश आदि देशों के कुछ हिस्सों में गणेश की मान्यता है और वहां उनकी सश्रद्धा पूजा की जाती है।
सचमुच गणेश एक लोकप्रिय व विश्व-व्यापी देवता हैं। सर्वत्र उनकी छवि मंगलकर्ता विघ्नहर्ता के रूप में ही है।