mahatma gandhi stories

महात्मा गाँधी : प्रेरक प्रसंग

(बापू की यादें शेष रह गईं) Mahatma Gandhi (bapu) inspirational stories

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बात उन दिनों की है, जब बापू आश्रम में थे। वहां उन्होंने कईं ‘गौ सेवक संघ‘ स्थापित किये। गांधीजी गाय की सेवा को बहुत बड़ा काम मानते थे। एक बार इसी संदर्भ में एक आश्रमवासी ने विनोद के मूड में गांधीजी से पूछा – ‘‘बापू आपने गायों की सेवार्थ गौशालाएं तो काफी खोल रखी हैं। परंतु गाय से भी सीधा प्राणी है, जिसकी हम लगातार उपेक्षा करते आए हैं। खूब काम लेते हैं और खाना भी बराबर नहीं देते। वह प्राणी है – गधा। क्या आप इस गरीब जानवर के वास्ते कुछ नहीं करेगें?‘‘
गांधीजी भला कब चूकने वाले थे, उन्होंने नहले पर दहला मारते हुए कहा – ‘‘मैं आपके विचारों से सहमत हूं। मैंने गायों के लिए – ‘गौ सेवा संघ‘ की स्थापना की है। आप ‘गधा सेवा संघ‘ की स्थापना करके उसके महामंत्री पर सुशोभित हो जाएं।‘‘
इतना सुनना था कि वहां उपस्थितों में हंसी की लहर दौड़ गई और बेचारे वे महाशय खिसिया कर रह गये।
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साबरमती आश्रम में गांधीजी से भेंट करने एक बार संध्या के समय पं0 मोती लाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू आए। उनका आश्रम में प्रवेश करना था कि आश्रम में जल रहा एक मात्र दीपक बूझ गया और चारों तरफ अंधेरा हो गया। इस अंधेरे में जवाहरलाल कोने में पड़ी बापू की लाठी से टकरा गये।
गांधीजी से मिलते ही जवाहरलाल ने प्रश्न किया – ‘‘बापू, आप अंहिसा के उपासक होते हुए भी सदैव अपने साथ लाठी क्यों रखते हैं?‘‘
‘‘तुम जैसे शैतान बच्चों का इलाज करने के लिए।‘‘ – बापू ने मुस्कराते हुए जवाब दिया।
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घटना सन् 1934 की है। भारत कोकिला श्रीमती सरोजिनी नायडू जेल से रिहा होते ही बापू के पास पहुंची । बापू ने उन्हें देखते ही कहा – ‘ इस बार जेल ने सिर के बाल भी सफेद कर दिये?‘‘
श्रीमती नायडू ने कहा – ‘‘ इसमें जेल का क्या दोष। आपने इस दौरान इतने उपवास किये कि मुझे बराबर यही भय बना रहा कि कहीं यह आपका अंतिम उपवास न हो।‘‘
बापू बोले – ‘‘ उपवास को हर धर्म में प्राथमिकता दी गई है। सच भी है, उपवास मन की निर्बलता और निराशा से बचाता है और इच्छा शक्ति को दृढ़ करने में हमारी सहायता करता है। उपवास में तो वह शक्ति है जो जीवन को अमरता की ओर ले जाती है, न कि विनाश की ओर।‘‘
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जमनालाल बजाज ने एक दफा गांधीजी से कहा – ‘‘मैं यह जानता हूं कि आपका मुझ पर अत्यधिक स्नेह और विश्वास है, लेकिन मैं देवदास की तरह आपका पुत्र बनना चाहता हंू।‘‘
‘‘ आप यह चाहते हैं सो तो ठीक है। लेकिन लोग तो बेटे को गोद लेते हैं, यहां तो बेटा बाप को गोद लेगा।‘‘ – गांधीजी ने एक नजर बजाज के लम्बे-चोड़े डील-डौल वाले शरीर पर डालते हुए जवाब दिया।
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बापू ने एक बार बा से प्रश्न किया – ‘‘ तुमने खाना खा लिया?‘‘
‘‘आप खा लें फिर खा लूंगी।‘‘ – बा ने जवाब दिया।
‘‘अरे तुम्हें पहले खाना चाहिए,‘‘ – बापू ने कहा।
बापू की इस बात पर बा ने प्रश्न किया – ‘‘क्यो?‘‘
‘‘अरे तू मुझसे बड़ी है न?‘‘ बापू ने मुस्कराते बोले।
बापू ने सच ही कहा था, बा बापू से कुछ महीने बड़ी थीं।
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आश्रम में घी का दिया जलता देख बापू ने कुछ रोष से प्रश्न किया – ‘‘यह घी का दीपक किसने जलाया है?‘‘
‘‘मैने।‘‘ – बा ने डरते हुए जवाब दिया।
‘‘मुझे तुमसे ऐसी आशा नहीं थी।‘‘ – जब बापू ने यह कहा तो बा सहित सभी आश्रमवासी चकित रह गये। भला घी का दिया जलाना कौन-सा बुरा काम है?
कुछ देर खामोशी के बाद बापू ने गंभीर स्वर में कहा – ‘‘कस्तूरबा, इतने दिन मेरे साथ गुजारने के बावजूद तुम कुछ नहीं सीखी। गांवों के लोग कितने गरीब हैं, कितने अभावों से वे जूझ रहे हैं, तुमने यह कभी सोचा है? उन्हें रोटी पर चुपड़ने के लिए तेल तक नसीब नहीं और तुम मेरे जन्मदिन पर घी के दिये जलाती हो…………!‘‘ इतना कहते कहते बापू की आंखों में आंसू भर आए।
फिर बापू बोले – ‘‘खैर …… जो हुआ, सो हुआ। आगे ध्यान रखना। जो चीजें आम आदमी को नसीब नहीं होतीं, उनका उपयोग करने का हमें कोई अधिकार नहीं। जब तक प्रत्येक देशवासी के हृदय में यह भावना नहीं आएगी, देश में खुशहाली और समृद्धि आना मुश्किल है।‘‘
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सन् 1923 में बापू को अंगे्रजों द्वारा गिरफ्तार कर यरवदा जेल में रख दिया गया था। जेल का नियम था कि जब भी कोई किसी कैदी से मिले तो जेल का एक अधिकारी मौजूद हो।
गांधीजी से मिलने कस्तूरबा आई तो एक जेलर भी उनके साथ हो गया। वहां पहुंचने पर जेलर ने सोचा – ‘‘यदि मैं यहां से हट जाऊंगा तो बा और बापू खुले दिल से बात कर सकेंगे। यह सोचकर जेलर वहां से खिसक लिया।‘‘ मुलाकात का समय पूरा होने पर वह लौटा तो देखता है कि बा-बापू दोनों चुपचाप खड़े हैं।
जेलर ने कहा – ‘‘आप लोग तो बात नहीं कर रहे, मुलाकात का समय भी पूरा हो चला है?‘‘
बापू बोले – ‘‘ कोई बात नहीं। आप यहां से चले गये थे। मुझे जेल का नियम मालूम है। भला आपकी गैर मौजूदगी में मैं बात कैसे करता इसलिए मैंने बातचीत रोक दी।‘‘
जिंदगी भर वह जेलर बापू की इस ईमानदारी को भूला न सका।
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एक अमरीकी पादरी ने गांधीजी से पूछा – ‘‘आप का धर्म कौन-सा है? भारत भविष्य में कौनसा धर्म स्वीकार करेगा?‘‘
गांधीजी ने बड़ी सादगी से जवाब दिया – ‘‘ सेवा करना ही मेरा धर्म है, भविष्य की मैं चिंता नहीं करता।‘‘
प्रश्नकर्ता पादरी यह जवाब सुनकर काफी प्रभावित हुआ क्योंकि गांधीजी का अभिप्राय जिस धर्म से था, वह किसी देश-जाति और समाज की सीमाओं से परे सारे मानव समाज का धर्म था।
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