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मां का दूध : शिशु के लिए प्रकृति का अनुपम उपहार

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‘मां का दूध’ हर शिशु का प्रकृति प्रदत्त अधिकार है। प्रकृति ने सभी बी स्तनपायी प्राणियों के बच्चों के लिए मां के दूध के रूप में ऐसे तत्व की व्यवस्था की है, जो आहार के रूप में न केवल शिशु के सर्वांगीण विकास की रूपरेखा को सुनिश्चित करता है, बल्कि उनमें प्राकृतिक रूप से रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी उत्पन्न करता है। यह भी एक कुदरती सच है कि प्रत्येक स्तनपायी प्राणी का दूध उसकी अपनी संतान के लिए है। हर प्राणी के दूध में उन्हीं तत्वों का समावेश है, जो उसकी संतान के लिए आवश्यक है। भैंस का दूध गाय के बछड़े के लिए उतना मुफीद नहीं हो सकता, जितना कि वह भैंस के बच्चे लिए है। यही सत्य मनुष्य के बच्चों के लिए भी चस्पा होता
है । हर दृष्टि से ‘मां का दूध’ बच्चों के लिए प्रकृति-प्रदत्त सर्वोत्तम उपहार इतना कुछ होने के बाद भी उपभोक्ता-संस्कृति और सभ्यता के कमिक विकास ने मां और संतान के नैसर्गिक प्रेम और ममत्व के बीच एक खाई पैदा कर दी है। स्तनपान की प्राकृतिक परम्परा आज डिब्बा-बंद दूध और बोतल से दुग्ध-पान की नव-विकसित शैली के बोझ तले दबी कहीं सिसक रही है। स्तनपान जैसी सहज स्वाभाविक प्राकृतिक प्रकिया में डिब्बाबंद दूध-पाउडर का यह हस्तक्षेप अधिक पुराना नहीं है। आज से कुछ दशकों पूर्व तक स्तनपान के इस विकल्प की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी।
कृत्रिम दुग्ध-पान की यह लोकप्रियता कुछ व्यापारिक स्वार्थों के सुनियोजित षड्यंत्र और विराट आकर्षक प्रचार-तंत्र पर आधारित है। शिशु-आहार निर्माताओं का प्रचार-तंत्र इतना व्यापक और आकर्षक होता है कि वह कृत्रिम दुग्ध को मां के दूध के सबसे बेहतरीन विकल्प के रूप में स्थापित करने में आसानी से कामयाब हो जाते हैं। कुछ आधुनिक किस्म की युवा माताएं मात्र अपने शारीरिक गठन और सुडौलता की सुरक्षा की दृष्टि से अपने बच्चों को उनके नैसर्गिक अधिकार स्तनपान से वंचित रखती है। यह बच्चों के साथ न केवल कूरता और निर्ममता का उदाहरण है बल्कि मां और संतान के रिश्ते की भावात्मक अनुमूति के भी प्रतिकूल है। वैसे भी यह तथ्य वैज्ञानिक आधार पर भली भांति सिद्ध हो चुका है कि स्तनपान से शारीरिक सौंदर्य में कोई विकृति
उत्पन्न नहीं होती। स्तनपान से तो स्त्री सम्पूर्णता प्राप्त करती है और उसके जिस्म में एक दीप्त आभा आलोकितत होती है।मां का दूध नवजात शिशु के समुचित और सम्यक विकास की समस्त
शर्तों की बखूबी पूर्ति करता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह स्पष्ट हो चुका है कि मां का दूध शिशु के लिए सर्वाधिक पौष्टिक, सुपाच्य, रोगाणुरहित तथा सरब्धिलत्त स्यादाण कै। स्तमपान से नवजात शिशु के जबड़े, तालू व मांसपेशियां सुदृढ़ होती हैं।
उसके अत्तिरिक्त मां का दूध बच्चों को निमोनिया, पोलियो, कुपोषण आदि रोगों से मुक्त रखता है। यह बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि भी करता है। मां में दूध के के सभी आधारभूत पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज लवण, विटामिन आदि उचित अनुपात में मौजूद रहते हैं, जो नवजात शिशु को पूर्ण प्राकृतिक रूप से पोषित करते हैं।
स्तनपान करने वाले बच्चे एलर्जी, मलेरिया, दस्त आदि रोगों से अपेक्षाकृत कम प्रभावित होते हैं। बच्चे के जन्म के बाद प्रारंभिक दिनों में माता के स्तनों से थोड़ी मात्रा में गाड़ा और पीलापन लिए हुए जो दूध निकलता है, उसके बारे में यह श्रांत धारणा व्याप्त है कि वह दूध बच्चों को नहीं पिलाया जाना चाहिए, किंतु वस्तुस्थिति यह है कि नवजात शिशु के लिए यह दूध अत्यंत उपयोगी होता
है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस दूध में “क्लोस्ट्रोम’ नामक अत्यंत पौष्टिक तत्व विटामिन ए के सम्मिश्रण के साथ उपलब्ध रहता है, जो नवजात शिशु को इन्फेक्शन आदि से बचाता है। उनके पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है और उनमें रोग-प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करता है।स्तनपान केवल शिशुओं के लिए ही वरदान नहीं है बल्कि माताओं के लिए भी स्तनपान करवाने के कई लाभ हैं। एक ओर जहां स्तनपान करवाकर माता नैसर्गिक आनंद की अनुभूति कर सकती हैं, वहीं दूसरी ओर दूध के रूप में अनावश्यक चर्बी भी शरीर से कम होती जाती है। प्रसव के बाद गर्भाशय
को उसकी प्राकृतिक स्थिति में वापस लौटाने में भी स्तनपान महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। स्तनपान नहीं करवाने वाली माताओं में स्तन-कैंसर की पर्याप्त संभावनाएं रहती हैं। शारीरिक सौंदर्य की दृष्टि से भी स्तनपान का बहुत महत्व है। इससे स्त्री का शरीर सुडौल होता है तथा उसमें मातृत्व की गरिमा निखरती है। स्तनपान करवाने से मां और संतान में एक भावनात्मक लगाव पैदा होता है, जो भविष्य में भी कायम रहता है। बढ़ती हुई बेतहाशा आबादी के इस दौर में परिवार-कल्याण कार्यक्रम के अंतर्गत स्तनपान की महत्ता को भी स्वीकार किया जाने लगा है। स्तनपान मां के लिए प्रभावशाली गर्भ-निरोधक का कार्य करता है। स्तनपान की वजह से दुबारा मासिक-धर्म देर से शुरू होता है, अतएव शीघ्र गर्भ-धारण की संभावना बहुत कम रहती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों में जो माताएं अपने बच्चों को दूध पिलाती हैं,
उनमें से 32 प्रतिशत स्त्रियों को बच्चे के जन्म के आठ माह बाद तक माहवारी नहीं होती । स्तन्‍्य आहार से विकासशील देशों की गरीब साढ़े तीन करोड़ महिलाओं को एक वर्ष की अवधि के लिए गर्भ-निरोध रहता है। यह संख्या अन्य कृत्रिम गर्भ-निरोधक के माध्यम से गर्भ-सुरक्षा प्राप्त करने वाली महिलाओं से कहीं अधिक है। वैसे यह पूर्ण विश्वसनीय गर्भ-निरोधक नहीं माना जा सकता किंतु जनसंख्या नियंत्रण अभियान में इस प्राकृतिक गर्भ-निरोधक साधन की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती।स्तनपान कराने वाली माताओं को कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां बरतनी
चाहिए | स्तनपान का कार्य एक बोझ समझकर जल्दबाजी में नहीं किया जाना चाहिए। अपने बच्चे को पूर्ण अपनत्व और स्नेह से स्तनपान करवाईए | दूध पिलाने से पूर्व हर बार स्तनों को शुद्ध गर्म पानी से धो लेने से शिशु को संकामक रोगों का खतरा खत्म हो जाता है। बच्चे को कभी भी लेटकर दूध नहीं पिलाना चाहिए बल्कि सीधे बैठकर बच्चे को गोद में लिटाकर स्तनपान कराना मां और शिशु दोनो के लिए लाभदायक है। स्तनपान कराते समय यहध्यान रखना आवश्यक है कि कहीं वक्ष-स्थल के भार से शिशु की श्वसन-किया में तो बाधा नहीं पहुंच रही है? बारी-बारी से दोनों स्तनों सेदूध पिलाएं। दूध पी चुकने के पश्चात बच्चे को कंधे पर लिटाकर उसकी पीठ थपथपा देनी चाहिए। जहां तक शिशु को स्तन-पान कराने की अवधि का प्रश्न है, ऐसा माना जाता है कि कम से कम 6 माह तक स्तनपान करवाया जाना बच्चे के
सर्वांगीण विकास की दृष्टि से आवश्यक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक सर्वेक्षण के अनुसार, छः महीने से कम समय तक स्तनपान करने वाले बच्चों की मृत्यू दर छः माह से अधिक स्तनपान करने वाले बच्चों से पांच गुना अधिक है। इस विषय में विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि इस सम्बन्ध में कोई निर्धारित मापदंड सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। सामान्यतः जन्म के पश्चात शिशु को प्रत्येक दो घंटे में स्तनपान की जरूरत होती है। बाद में कमशः: यह अवधि बढ़ती जाती है। फिर स्तनपान में चार-पांच घंटे का अंतराल उचित होता है। बच्चे की भूख, आयु और शारीरिक स्थिति अनुसार इस कम में फेरबदल भी किया जा सकता है| सामान्यतः: एक शिशु एक स्तन का दूध पांच से सात मिनट में पी लेता है। स्तनपान कराने वाली महिला को डाक्टरी परामर्श के बिना कोई औषधि नहीं लेना चाहिए। उसे सामान्य से अधिक पौष्टिक आहार की जरूरत होती है। इसलिए भरपूर मात्रा में हरी सब्जियां,फल आदि लेने चाहिए। मां का दूध वास्तव में बच्चे के लिए प्रकृति का अनुमप उपहार है।
इससे उसे वंचित रखना प्रकृति–विरूद्ध और कूरता होगी।