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लोरियों का ममता भरा संसार

( Lullaby world )

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मां के मुंह से निकली ममता भरी लोरियां और कोमल-कोमल हाथों से प्यार भरी थपथपाहट बाल-मन में जिस ममत्व और सुकून का अहसास कराती है, वह शायद उसके जीवन की अनमोल विरासत होती है। लोरियांे का प्रचलन प्राचीन काल से ही चला आ रहा है, जिसका आज भी उतना ही महत्व है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बच्चे के लिए लोरियों का सुनना सर्वथा उपयुक्त माना गया है। यह भी मान्यता है कि लोरियां गाने का ढंग और मां की ममतामयी आवाज संगीत के कोमल रसों में डूबकर ऐसा सम्मोहन पैदा करती है, जिससे बच्चा प्यार के रस में सराबोर हो खुद-ब-खुद सो जाता है। यदि इन्हीं लोरियों को उनके खास और प्रचलित अंदाज से हटकर बच्चे को सुनाया जाये तो वह बे-असर बनकर रह जाती है। यही नहीं, लोरियों की रचना बाल-मन की कोमलता को ध्यान में रखकर विशेष रूप से की जाती है। अधिकांशतः पारम्परिक रूप से चली आ रही इन लोरियों में कहीं परियांे के सुनहरे संसार की कहानियां होती है तो कहीं कोमल हृदय वाली राजकुमारियों की। चांद का आकर्षण भी इन लोरियों में बखूबी देखने को मिलता है, इसलिए चांद-सितारे के किस्से भी लोरियों के रूप में ढल कर बाल मन को अभिमत करते हैं। प्यारे-प्यारे शब्दों की लड़ियों से सजी लोरियां जहां बच्चे को पुलकित कर उसे सुख की नींद सुला देती है, वहीं मां को भी आनंद की अनुभूति होती है।
नटखट कन्हैया को नींद नहीं आ रही है, मां यशोदा उसे सुलाने का प्रयत्न करती है, लेकिन वह अपनी भोली-भाली रिझाने वाली भाव-भंगिमाओं से बार-बार आंख खोल कर माता की ओर देख लेते हैं। ऐसे में यशोदा कृष्ण को पालने में लिटाकर, उसकी डोरी खींचते हुए सुलाने की कोशिश में कुछ यूं गाती है:
जसोदा हरि पालने झुलावै, हलरावै दुलराई
मल्हावै, जोई सोई कुछ गावै।
मेरे लाल को आ आनि निंदरिया काहै न
आई सुआवै।।
उधर बालक रामचन्द्र तो कौशल्या मां की लोरी के इतने आदी हो चुके हैं कि बगैर लोरी सुने उन्हें नींद नहीं आती। मां कौशल्या राम को नींद न आते देख श्री राम को झूले पर हल्के हाथ से झुलाती हुई लोरी के मधुर स्वरों से सुलाने के यत्न में गाती हुई कहती है:
पौठिये लाल पालने हो झुलावे,
कर पद सुख कमल लसत
लाखि लोचन भर भुलावो,
बाल विनोद मोद मंजुल मनि
किलकिन कान खुलावो
इसी तरह मां सुमित्रा भी अपने स्नेह को व्यक्त करते हुए राम को सुलाने को लोरी गाकर यूं प्रयास करती है:

सोहये लाल लाडले, मगन मोह लिए गोद
सुमित्रा बार-बार बलि जाई
हंसे हंसत अनर से,
अनरस प्रतिबिंबनि ज्यो आई
तुम सबके जीवन के जीवन सकल सुमंगल दाई
ऐसे ही एक मां अपने लाडले को सुलाना चाहती है, लेकिन वह है कि सोने का नाम ही नहीं लेता। वह ज्यों-ज्यों उसे नींद के झरोखों की ओर ले जाती है, वह अपनी किसी न किसी नटखट अदा से फिर उसकी कोशिश पर पानी फेर देता है। अंत में थक हार कर वह उसके मन बहलाने वाले अंदाज मंे चांद की ओर देखकर उसे बुलाती हुई कहती है:
ओ चंदा मामा, आरे आवे पारे आवे,
नदिया किनारे आवा
सोने की कटोरिया में दूध भात लै-ले आवा
बबुआ के मुंहवा में घूटूक।
अधिकांश लोरियों में बाल मन बहलाने के लिए चांद का सहारा लिया जाता है, क्योंकि रात में अगर कुछ मनोहारी दिखाई देता है, तो वह चांद ही होता है। दूसरे चांद के साथ मामा शब्द लगाकर मां अपने भाई की याद को लोरी में संजोकर अपनी मन संतुष्टि भी करने का प्रयास करती है। जहां वह इस तरह अपने लाडले को सुलाना चाहती है वहीं चांद पर निगाहे टिकाए कहीं दूर अपने भैया की याद में भी खोई होती हैः
चंदा मामा दूर के, पुए पकाए बूर के
आप खाये थाली में, मुन्ने को दे प्याली में
लोरी मात्र बच्चे को सुलाने का साधन ही नहीं होती, वरन् इसमें मां की किसी-न-किसी रूप में संतुष्टि भी छिपी होती है। मां की करूणा भी कभी-कभी इन लोरियों में मुखरित हो उसके मन के बोझ को हलका कर देती है। ऐसी ही बानगी कविवर मैथलीचरण गुप्त द्वारा रचित इस लोरी में देखने को मिलती है:
सो अपने चंचल मन सो
सो मेरेे अंचल मन सो
सो मेरे गृह गुंजन सो
मेरे यथा विनोदन सो
सो मैं कर लूं जी भर क्रंदन
सो उनके कुल नंदन सो।
ऐसा भी नहीं है कि लोरियों में मात्र सपनों की दुनिया में ही मां विचरती है और अपने लाडले बेटे को यथार्थ से दूर रखना चाहती है। इन लोरियों में आर्थिक तंगी और बदहाली का भी जिक्र होता है, जहां बच्चे के लिए इनमें एक आदर्श व्यक्तित्व बनने की प्रेरणा होती है, वहीं उसमें संतोष की भावना भी कूट-कूट कर भरना चाहती है, ताकि वह बड़ा होकर वास्तविक धरातल पर रहे और संतोष के सुख को ही सर्वोपरि समझे।
भूख से उपजी व्याकुलता के कारण बच्चे को नींद आ रही है, ऐसे में मां उसे इस तरह सुलाने की कोशिश करती हैः
सुतरे होरी लाल, तोर बप्पा बांस काटे गैल
बांस के कटैया, तीन सेर मस आ
कूटि पीसी तीन रोटी भेल
एक रोटी छोरा-छोरी, एक रोटी बुढ़वा
एक रोटी बुढ़िया धकेल
एक अन्य लोरी में मां कुछ इस तरह गाती हुयी बच्चे का मन बहलाती है:
लल्ला-लल्ला लोरी, दूध की कटोरी
दूध में बताशा, मुन्नी करे तमाशा
लोरियों के संसार में डूबकर इंसान जीवन के वह सब रूप देख सकता है, जो मां की ममतामयी और कोमल वाणी में ढलकर और मोती बन आदर्शो में एक चमक के रूप में झिलमिलाते हैं। लोरियों के शब्दों के इस अथाह सागर में जीवन का हर पहलू समाहित होता है। यही कारण है लोरियों की लोकप्रियता बदलते हुए इस आधुनिक युग में भी उसी तरह है जैसी आदि काल में थी, जो लोरी के महत्व की जीवंत मिसाल भी कही जा सकती है। गांव के लोकगीतों में उनके दर्शन होते हैं, तो फिल्मों के पर्दे पर भी ममता के रूप बिखेरती सुनी जा सकती है।
लोरी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डा0 वेजामिन श्याक का मानना है कि लोरियां बच्चे के मानसिक तथा शारीरिक विकास के लिये अत्यन्त आवश्यक होती है। हां, यदि मां जल्दबाजी या हड़बड़ाहट में लोरी गाकर बच्चे को सुलाना चाहेगी, तो लोरी शायद ही असरदार साबित हो। लोरी के गाने के ढंग वही होना चाहिए, जो लोरियों के सर्वथा अनुकूल है। यह मानना पडेगा कि भिन्न प्रदेशों और भिन्न भाषाआंे मंे लोरियों का एक व्यापक संसार है, लेकिन मां की ममता सभी में एक समान झलकती है।
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