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लालच का फल | lalach ka fal 2

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लालच का फल

विवेकी और दयालु राजा

एक था राजा। विवेकी और दयालु। प्रजा को प्राणों के समान प्यार करता था। धर्म-कर्म के कामों में भी जी खोलकर सहायता देता था। देवता भी राजा से प्रसन्‍न थे। वे समय समय पर राजा से मिलने आते रहते थे।

राजा में अनेक गुण थे, किन्तु एक अवगुण भी था। वह था, राजा सभासदों और मंत्री की बात का विश्वास कर लेता था। कभी किसी के कहने पर शंका नहीं करता था।

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लालच का फल

तीन देवता दरबार में

एक बार तीन देवता राजा के दरबार में आए। शाम होने को थीं। दरबार से राजा उठने ही वाला था। तभी द्वारपाल ने देवताओं के आने की ख़बर दी। सुनकर राजा स्वयं स्वागत के लिए आया। झुककर प्रणाम किया। फिर आदर के साथ उन्हें स्वर्ण सिंहासन पर बैठाया।

एक बार तीन देवता राजा के तीन देवता आए। शाम होने को थीं। दरबार से राजा उठने ही वाला था। तभी द्वारपाल ने देवताओं के आने की ख़बर दी। सुनकर राजा स्वयं स्वागत के लिए आया। झुककर प्रणाम किया। फिर आदर के साथ उन्हें स्वर्ण सिंहासन पर बैठाया।

देवताओं ने राजा से कुशल-मंगल पूछा। राजा ने कहा – ‘देव, आपके आशीर्वाद से सब ठीक है। राज्य में सभी जगह सुख-शांति है।’

देवता मुस्कराए। बोले – ‘तुम धन्य हो। तुमने जगह जगह मंदिर बनवाए। धर्मशालाएं, पाठशालाएं बनवाई। हमारी प्रसन्नता के लिए राज्य में यज्ञ भी किए जाते हैं। हम तुमसे प्रसन हैं। बताओ, तुम्हारा क्या हित करें?”

“देवगण, मेरा सबसे बड़ा हित यहीं है कि आप मुझे सही रास्ता दिखाएं। कोई गलती हो, तो उसे सुधारें। मैं आपकी शरण में हूं। आज रात आप मेरे अतिथि बने।’

अतिथि देवता

देवताओं ने राजा की प्रार्थना स्वीकार कर ली। राजा ने राजपुरोहित को बुलवाया। कहा – ‘देवों को अतिथि शाला में ले जाओ। इनकी रूचि के अनुकूल भोजन बनवाओ। देखो, देवों के आतिथ्य में कोई कमी न रहने पाए।’

राजपुरोहित ने देवताओं की खूब सेवा की

राजपुरोहित देवताओं को अतिथिशाला में ले आया। उसने उनकी खूब सेवा की। रात गए देर तक उनके चरण दबाता रहा। अपनी अच्छाइयों का बखान भी करता रहा।

सुबह हुई। देवताओं ने कहा – ‘राजपुरोहित जी, तुग्हारी सेवा से हम प्रसन्न हैं। कोई वरदान मांग लो।’

वह तो यह सोच ही रहा था। देवताओं के गले में अदूभुत फूलों की मालाएं थी। उनसे फैली सुगंध से सारी अतिथिशाला महक रही थीं। बोला- ‘देवगण, आपकी मालाएं बहुत सुंदर हैं। ऐसी सुगंध वाले फूल इस धरती पर नहीं हैं।’

“तुम ठीक ही कहते हो। ये स्वर्ग के फूल हैं। इन मालाओं में अदृभुत शक्ति है। जो पहन ले, कभी किसी से पराजित नहीं हो सकता। उसकी हर इच्छा पूरी हो जाती है। उस पर बुढ़ापे का असर भी नहीं होता है।’

यह सुनकर पुरोहित सोचने लगा- ‘क्यों न वरदान में ये मालाएं ही मांग लूं।’

राजपुरोहित ने मालाएं मांगी

देवताओं ने फिर पूछा – बोलो, क्या चाहते हो ?’ राजपुरोहित बोला – “यदि आप मुझ पर प्रसन हैं, तो मुझे अपनी मालाएं दे दीजिए।’ देवता कुछ देर चुप रहे। फिर उनमें से एक देवता बोले- ‘मेरी माला वही ले सकता है, जिसके मन में कभी लालच न आया हो।’

‘मैं इस योग्य हूं। आप देख रहे हैं, मेरा जीवन त्याग भरा है। जरा भी लालच नहीं है। माला मुझे दे दीजिए।’

देवता ने अपनी माला राजपुरोहित को दे दी। …दूसरे  देवता ने कहा – मैं भी  अपनी माला तुम्हें देना चाहता हूं, मगर चह माला  वही पहन सकता है, जिसने जीवन में कभी झूठ न बोला हो।’

 ‘मैं अपने मुंह से अपनी बड़ाई कैसे करूं? झूठ क्या होता है, मैं जानता भी नहीं।’ राजपुरोहित ने कहा।

“तब मेरी माला भी पहन लो।’ – मुस्कराते हुए देवता ने उसे माला दे दी।

राजपुरोहित ने ललचाई निगाहों से तीसरे देवता की ओर देखा। वह बोले – “जो अपने कर्तव्य का सही ढंग से पालन करता हो, किसी को धोखा न देता हो, वही मेरी माला पहनने का अधिकारी है।’

‘देव, मैं कृतार्थ हुआ। मेरे विषय में राजा ने आपको सब कुछ बता दिया है। मेरा रास्ता धर्म का है। दूसरों को कर्तव्य का पाठ पढ़ाना ही मेरा काम है। मैं इस माला का भी अधिकारी हूँ

और तीसरे देवता ने भी अपनी माला राजपुरोहित को दे दी।

फंस गया लालची राजपुरोहित

मालाएं पहनकर राजपुरोहित गर्व से फूला न समाया। उसी समय राजा का रथ आ गया। देवता राजमहल की ओर चल पड़े।

वे राजा के पास पहुंचे ही थे कि एक सेवक दौड़ता हुआ आया। बोला – ‘महाराज, रक्षा कीजिए। राजपुरोहित का दम घुट रहा है। वह मरने ही वाला है।’

‘क्यों, क्या हुआ? अभी तो देवगण उसी के पास से आ रहे हैं।’ – राजा ने आश्चर्य से पूछा।

“महाराज, लगता है,  राजपुरोहित से कोई गलती हो गई है। देवताओं ने अपनी मालाएं उसे दी थी। पहनते ही वे छोटी होने लगी। और अब मालाओं के फूल लोहे की जंजीर जैसे सख्त होकर गर्दन में फंसे हैं। बचाइए, वर्ना राजपुरोहित मर जाएंगे।’ सेवक ने कहा।

राजा ने आश्चर्य से देवताओं की ओर देखा। देवता बोले- ‘राजन, राजपुरोहित अपने किए की सजा भोग रहा है। वह लालची है, झूठा है। तुम्हें और सारी प्रजा को भी ठगता होगा। उसने हमसे भी झूठ बोला। लालच के वश हो हमारी सेवा की। झूठ बोलकर मालाएं लीं।’ कहते हुए देवताओं ने पूरी घटना राजा को बता दी।

अभी बातें हो ही रही थी कि सेवक रथ में बैठाकर राजपुरोहित को ले आए। उसका गला घुट रहा था। आंखें बाहर को निकलने लगी थी। मुश्किल से बोल पा रहा था।

राजपुरोहित रथ से उतरकर देवताओं के चरणों पर गिर पड़ा। किसी तरह बोला – ‘मुझे क्षमा करें, देव। मैनें जो कुछ कहा था, सचमुच मैं वह नही हूं।’ उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

देवताओं ने आगे बढ़कर मालाओं को छुआ, तो वे फिर पहले जैसी हो गई। राजपुरोहित ने तुरन्त उन्हें उतारा। वापस करते हुए बोला – मैं इन्हें पहनने के योग्य नहीं हूं।’

देवताओं ने मालाएं हाथों में ले ली। राजा से बोले – ‘तुम्हारे दरबार में कोई इन्हें पहनने का दावा करता है?

सब चुप। सबने अपना अपना हृदय टटोला। सभी के अन्दर बुराई निकली। देवता हंसकर बोले – ‘देखा, राजन! प्रजा तुम्हें प्यार करती है, इसलिए कुछ नहीं बोलती। तुम जिन लोगों पर विश्वास करते हो, वे सब तुम्हें धोखा देते है। राजा को विश्वास तो करना चाहिए, मगर अंध विश्वास नहीं। उसे सभी के काम की पूरी तरह देखभाल करनी चाहिए – यहीं सही रास्ता है।’

राजा का सारा घमंड ढह गया। वह बोला- ‘आपने ठीक ही कहा है। मैं भी अपने को कम महान नही मानता था, जबकि राजा तो प्रजा का सेवक है। आपने गलती बताकर मेरी आंखें खोल दी।’

राजा को सौंप दी मालाएं

देवताओं ने मालाएं राजा को सौंप दी। कहा – ‘इन्हें रखो। जब तक तुम कर्तव्य का पालन करते रहोगे, तब तक ये इसी तरह ताजा रहकर महकती रहेंगी।

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लालच का फल

शिक्षा

लालच का फल कभी अच्छा नहीं होता l हमें इससे बचना चाहिए l हम हमेशा सुखी रहेंगे l’