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कैबरे चकाचैंध उजाले के पीछे का अंधेरा


मद्धम गुलाबी-नीली रोशनी में उŸोजक संगीत की धुन गूंज रही है, वेटर शराब, बीयर व अन्य खाने-पीने की वस्तुएं सर्व कर रहे हैं, पाश्र्व में थिरकता मादक संगीत उपस्थित लोगों को मदहोश किए जा रहा है। पचासों जोड़ी आंखे बेताबी से इधर-उधर देख रही हैं कि अचानक रोशनी और कम हो जाती है और कुछ क्षणों बाद घुप्प अंधेरा छा जाता है। फिर यकायक होटल के किसी हिस्से में तेज चमकीली लाल गुलाबी रोशनी चमकती-बुझती नजर आती है और उसी के साथ नजर आता है एक हसीन कमसिन चेहरा…मौजूद दर्शकों की धड़कन बढ़ जाती है। फिर रोशनी का दायरा उस उŸोजक ढंग से थिरक रही नर्तकी के बल खाते जिस्म के इर्द-गिर्द घूमने लगता है, दर्शकों की निगाहें उसकी खुली और पारदर्शक पोशाक से झांकते उसके गदराए जिस्म को नोचने लगती है। नर्तकी की थिरकन क्रमशः मादक और अश्लील होती जाती है। लोगों के गले सूखने लगते हैं, सांसे तेज-तेज चलने लगती हैं। धीरे-धीरे नर्तकी के बदन से कपड़े एक-एक करके उतरने लगते हैं, आर्केस्ट्रा का संगीत क्रमशः तीव्र और तीव्रतर होता जाता है और नर्तकी के बदन के आखरी कपड़े के उसके जिस्म से अलग होने तक वह सप्तम पर पहुंच कर टूट जाता है। एक सुन्दर युवा स्त्री का सर्वथा नग्न शरीर देखने के लिए लोग अपनी आंखें अधिकतम चैड़ी कर लेते हैं, मानो इस एक पल का शतांश भी व्यर्थ करना उनके लिए जीवन-मृत्यु का प्रश्न हो। एक क्षण के लिए भरपूर रोशनी नर्तकी पर रेंगती रहती है और फिर उसके बाद सब कुछ अंधेरे में विलीन हो जाता है शेष बचती है आदमी की कामुक प्यास, पूरे हाॅल में घुलता एक अधूरा अश्लील अहसास और….और…. कुछ भी नही।
यह दृश्य चित्र मामूली फेरबदल के साथ हिन्दुस्तानी शहरों के होटलों में हस्बे-मामूल देखा जा सकता है। जी हां, यह नृत्य-कला का सर्वाधिक वीभत्स व विकृत अनुवाद कैबरे है।
अन्य तथाकथित आधुनिक जीवन-मूल्यों की तरह यह विकृति भी हमारे यहां पाश्चात्य संस्कृति के माध्यम से पहुंची। दरअसल कैबरे की शुरूआत फ्रांस से हुई। यूरोपीय समाज में होटल संस्कृति का चलन बहुत पहले से रहा है। होटल-मालिक ग्राहकों को आकर्षित करने के वास्ते हमेशा नये-नये प्रयोग करते रहे हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में खाने के साथ शराब तथा रात्रि-मनोरंजन के नाम पर उŸोजक नृत्यों का आयोजन वस्तुतः ‘कैबरे‘ की शुरूआत की तैयारी का दौर था। रेस्तरां मालिक संगीत, शराब, नृत्य और युवा लड़कियों के अंग-प्रदर्शन की सभी सीमाएं तोड़ने लगे और धीरे-धीरे इस प्रतिस्र्पद्र्धा ने तकरीबन सारे होटलों को नाइट क्लबों में तब्दील कर दिया।
‘कैबरे‘ का शाब्दिक अर्थ होता है ‘सराय‘ लेकिन देखते-देखते ही यह सराय नितान्त नंगे, अश्लील और फूहड़ दृश्यों से भरे एक वीभत्स आयोजन में बदल गई । यूरोप में जगह-जगह नाईट क्लबों में ऐसे नग्न नृत्यों का आयोजन होने लगा। प्रशासन ने इन पर अंकुश लगाने के काफी प्रयास किए किन्तु आदमी की आदिम प्रवृति ने ‘कैबरे‘ की लोकप्रियता को चरम शिखर तक पहुंचा दिया और प्रशासन अपने सारे प्रयत्नों के बावजूद इसे रोकने में कामयाब नही हो सका।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद तो जैसे इन नाईट-क्लबों की बाढ़-सी आ गई। पर्यटक भी इस ओर आकर्षित होने लगे। अब कैबरे सस्ते होटलों से निकल कर अभिजात्य-वर्ग के रात्रि मनोरंजन क्लबों का मुख्य अंग बन गए। इग्लैंड में सेवाय, केफेडि, एंबेसी, नैस्ट, अमरीका में मीरा डार, स्टार्क, जंजीबार और फ्रांस में सर ले टायट, वोइफ आदि मशहूर नाईट क्लब आरम्भ हो गए, जहां रात की मद्धम रोशनी में शराब के दौर के बीच थिरकते नंगे जिस्मों की नुमाईश होती थी। इन क्लबों में शाही खानदान के लोग, मशहूर नेता, अभिनेता तथा समाज के प्रतिष्ठित नागरिक तशरीफ ले जाते थे। कालान्तर में देह प्रर्दशन के इस नग्न नृत्य का स्वरूप क्रमशः और अधिक उŸोजक होता गया। इन क्लबों के संचालकों ने इस दिशा में नित नए प्रयोग किए।
पाश्चात्य-जगत में तो ‘स्ट्रिपटीज‘ (एक-एक कर बदन से कपड़े उतारना) मादक-धुन पर नर्तकी द्वारा अपनी नग्न-अर्द्धनग्न देह थिरकाने जैसा कैबरे का पांरपरिक स्वरूप लुप्त-सा हो गया है। पश्चिमी देशों में लोगों की यौन-मानसिकता ने इन चीजों को ‘आउट-डेटेड‘ कह कर खारिज कर दिया है, इसके स्थान पर अब वहां स्त्री-पुरूष के संभोग-प्रदर्शन आयोजित किए जाने लगे। इन प्रदर्शनों में कई प्रकार की यौन विकृतियां तक प्रस्तुत की जाती हैं। यहां तक कि अब वहां स्त्री का पशु के साथ संभोग भी दिखाया जाने लगा है। सामूहिक संभोग के दृश्य तो सामान्य बात है।
हालांकि अभी भारत में कैबरे के इस विकृत-स्वरूप का प्रवेश नहीं हुआ है किंतु कैबरे नृत्य ने देश के महानगरों के अतिरिक्त कई शहरों में अपने पांव मजबूती से जमा लिए है। वस्तुतः निर्वस्त्र नारी देह देखना आदमी की आदिम प्रवृति है। सभ्यता ने भले ही उसे लिबास दे दिया हो किन्तु अन्दर से तो वह नंगा ही है। ‘कैबरे‘ आदमी की उसी प्रवृति को उकसाने का साधन-भर है। एक सामान्य होटल में 50 से 100 रूपये तक का टिकट लेकर तकरीबन दो घंटे तक नग्न नारी देह को देखने की ललक हर वर्ग के आदमी को कैबरे-क्लबों और होटलों की तरफ आकर्षित करती है। सामान्यतः सभी वर्गो के लोग इन कैबरे कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। किंतु विशेष रूप से नव-धनाढ्य वर्ग के किशोर व युवाओं की दिलचस्पी इन कार्यक्रमों में अधिक पाई जाती है। वैसे अधेड़ आयु के कई व्यक्ति भी कैबरे के शौकीन होते हैं।
जहां तक कैबरे करने वाली युवतियों का प्रश्न है, यह आवश्यक नहीं कि वह नृत्य-कला में प्रशिक्षित अथवा पारंगत हों। दरअसल कैबरे देखने वाले नृत्य-कला को नहीं बल्कि उस युवा नर्तकी के नंगे जिस्म को थिरकती अर्द्ध-नग्न जंघाओं, मटकते कूल्हों और अनावृत उरोजों को देखने आते है। कैबरे नर्तकियां और कैबरे संचालक दर्शकों के इस मनोविज्ञान से अच्छी तरह वाकिफ होते हैं अतः मात्र जिस्म की नुमाइश कर सकने वाली कोई सुन्दर युवा लड़की आसानी से कैबरे डांसर की भूमिका निभा सकती है। अधिकांश कैबरे नर्तकियां तीन से छह माह के अनुबंध के आधार पर कार्य करती हैं। प्रायः अनुबन्ध की अवधि बढ़ा दी जाती है।

एक सामान्य कैबरे नर्तकी पांच से दस हजार रूपया मासिक तक कमा लेती है। पूर्ण रूप से निर्वस्त्र होकर नृत्य करने वाली कैबरे डांसर का पारिश्रमिक लगभग पन्द्रह हजार रूपये प्रतिमाह तक होता है। नर्तकी को मिलने वाला पारिश्रमिक होटल अथवा क्लब के स्तर पर निर्भर करता है।
अधिकांश कैबरे नर्तकियों का एकमात्र लक्ष्य अधिक से अधिक पैसे कमाने का होता है क्योंकि वह इस तथ्य से भलीभांति परिचित होती हैं कि उनके कैरियर की उम्र बहुत कम है। अधिक से अधिक पैंतीस वर्ष की आयु तक ही कोई कैबरे नर्तकी होटल के रंगीन फ्लोर पर मदमाती रोशनियों के बीच अपने जिस्म का प्रदर्शन कर सकती है। उसके बाद उम्र के स्वाभाविक संकेत उसके जिस्म पर उभरने लगते है और वह कैबरे संचालकों व दर्शकों द्वारा खारिज कर दी जाती है। उम्र के इस छोटे-से अर्से में की गई कमाई ही उसके भविष्य का एकमात्र सहारा होती है। होटलों में बिजलियां गिराकर कहर बरपा करने वाली न जाने कितनी सुन्दरियां वक्त के साथ न जाने किस अंधकार में खो जाती है। अधेड़ावस्था व वृद्धावस्था कैबरे-गल्र्स किस मुसीबत में गुजारती हैं, इसका आसानी से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। वैवाहिक जीवन तो अधिकांश कैबरे डांसर को मय्यसर ही नहीं होता। जिन्दगी का आखरी दौर इनको बड़ी मुश्किलों में या किसी की रखैल बनकर गुजारना पड़ता है। ‘कैबरे‘ को जिन्दा रखने के लिए लम्हा-दर-लम्हा अपनी अंदर की औरत को मरते देखते रहना ही शायद इनकी नियति है।
औरत को नंगा करने, नंगा देखने और नंगा भोगने की आदिम की प्यास के विकृत संस्करण हैं कैबरे! दरअसल यह औरत का नंगापन नहीं होकर, आदमी की अनियंित्रंत वासनाओं का अश्लील नंगापन है, जो हर रात रंगीन रोशनियों, शराब के दौर, सिगरेटों के धुंआ और पचासों आंखों के वहशीपन में नुमाया होता है।
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