pexels mnz 1598507 scaled

जानें जीन्स का इतिहास

pexels mnz 1598507


फैशनेबल वस्त्रों में आजकल जितनी धूम ‘जीन्स‘ की मची है, उतनी शायद ही किसी अन्य वस्त्र की। एक ओर ‘जीन्स‘ युवा वर्ग का सबसे पसंदीदा वस्त्र है, तो दूसरी ओर प्रौढ़ लोग भी इसके कम दीवाने नहीं हैं। एक अनुमान के अनुसार शहरों का हर पांचवा व्यक्ति ‘जीन्स‘ पहनता है। अध्यापक हो या क्लर्क, चपरासी हो या अधिकारी, फिल्म स्टार हो या निर्देशक, कालेज छात्रा हो या छात्र….कहने का मतलब यह है कि समाज के हर वर्ग के लोगों में यह लोकप्रिय है।
फिर इसको पहनने के अपने फायदे भी तो हैं। इसको बार-बार धोने की जरूरत नहीं पड़ती। इसकी इस्तरी भी जल्दी नहीं टूटती। यह एक तरह से ‘एयरकंडीशनर भी है। पहनने पर यह जाड़ों में गरम तथा गरमी में ठंडा अनुभव देती है। फिर इसकी बनावट ऐसी है कि यह बूढ़े से लेकर जवान एवं बच्चे सब पर फबती है।स्विट्जरलैंड मंे एक समुद्र तटीय नगर है – ‘जिनेवा‘। इस नगर की ख्याति सम्पूर्ण संसार में है। संयुक्त राष्ट्र संघ के कई कार्यालय यहां पर स्थित है। विश्व की अधिकतर राजनीतिक शिखर वार्ताएं यहीं पर होती हैं। इसी नगर में बन्दरगाह के आस-पास के लोग तथा मजदूर उन्नीसवीं सदी तक एक प्रकार का मोटा कपड़ा पहना करते थे। वह वस्त्र यहीं पर कुटीर उद्योगों द्वारा बनाया जाता था। वह वस्त्र, आधुनिक जीन्स से मिलता जुलता था। कालांतर में दुनिया के अन्य क्षेत्रों में इसी प्रकार के कपड़े तैयार करने तथा पहनने के प्रमाण मिले। इन्हीं कपड़ों की आधार भूमि पर वैज्ञानिकों ने अपने शोधों के द्वारा ‘जीन्स‘ का निर्माण किया। ‘जीन्स‘ का यह नाम जिनेवा में पहने जाने वाले वस्त्र के कारण जिनेवा से ही विकसित हुआ है।
सन् 1849 ई0 में एक अंग्रेज व्यक्ति ‘लेजिस्ट्रोफ‘ अमरीका के कैलिफोर्निया राज्य में गया था। वहीं पर उसने देखा कि सोने की खान में काम करने वाले मजदूर तथा खानों के आस-पास के लोग एक प्रकार का मोटा कपड़ा पहनते हैं।

कुटीर उद्योगों द्वारा निर्मित तथा मजदूरों द्वारा व्यवहार में लाए जा रहे उस वस्त्र की अपनी कुछ विशेषताएं भी थीं। वह कपड़ा मोटा था। साथ ही वह जल्दी मैला नहीं होता था।इस कपड़े से जाड़े में गरमी तथा गरमी में ठंडा अनुभव होता था। ‘लेजिस्ट्राफ‘ इस कपड़े के गुणों के कारण इससे मोहित हुए बिना नही रह सका। जब वह यूरोप लौटा तो नमूने के तौर पर थोड़ा कपड़ा लेता आया। ‘जिनेवा‘ बन्दरगाह के मजदूरों तथा कैलिफोर्निया के सोने के खानों के मजदूरों द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले वस्त्रों की बनावट लगभग एक जैसी तो थी। किन्तु उनके गुणों में पर्याप्त अन्तर था। जिनेवा का कपड़ा इस्तरी न टूटने की विशेषता लिए था तो कैलिफोर्निया का कपड़ा ‘एअरकंडीशनर‘ जैसी खासियत से युक्त था।
इन दोनों कपड़ों की वैज्ञानिक पड़ताल करने के बाद यूरोपीय तथा अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इस मनमोहक ‘जीन्स‘ का निर्माण किया। नया ‘जीन्स‘ अपने मूल वस्त्रो (जिनेवा तथा कैलिफोर्निया) के गुणों से युक्त है।
प्रारंभ में इस वस्त्र को लोग हेय दृष्टि से देखते थे। हालांकि यूरोप में भी इसकी खोज हो चुकी थी, किन्तु तथाकथित संभ्रांत यूरोपियों ने इसे नहीं अपनाया।
जीन्स पहनने की शुरूआत अमेरिका से हुई।सन् 1901 में कुछ अमेरिकियों ने इसे पहनना शुरू किया तो इसके गुणों से परिचित हुए, फिर तो जैसे प्रत्येक अमरीकी इसको चाव से खरीदने-पहनने लगा।
पहले विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने के समय लगभग सन् 1913 में यूरोप में भी इसे पहना जाने लगा। द्वितीय विश्वयुद्ध के आते-आते यह पूरे यूरोप में छा गया। चूंकि उन दिनों यूरोपीय लोगों का लगभग सारे अफ्रीका एवं एशिया महाद्वीप में शासन फैला हुआ था। अतः उन्होंने अपने-अपने उपनिवेशों में ‘जीन्स‘ पहनने की परंपरा की नींव डाली। भारत में ‘जीन्स‘ पहनने की शुरूआत अंग्रेजों ने ही की थी। फिर यहां से इसका प्रचलन अफ्रीकी महाद्वीप में भी जा पहंुचा। अमेरिका से यह लैटिन अमेरिका (दक्षिण अमेरिका) में भी पहुंचा। आज इसकी स्थिति यह है कि यह पूरे विश्व में एक समान रूप में फैल गया है।
भारत में जब ‘जीन्स‘ आया, तब यहां पर गांधीजी का स्वदेशी आंदोलन का बोलबाला था। इससे भारतीयों ने इसे नकार दिया था। आजादी के बाद भारतीय समाज पर जब पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ने लगा, तब नई पीढ़ी के भारतीयों ने इसे अपना लिया और आज तो इसे लड़का-लड़की, बूढ़े-जवान सभी प्रयोग में लाते हैं।
आज ‘जीन्स कृत्रिम रेशे से भी बनाया जाता है। वैसे विश्व का सर्वाधिक जीन्स ‘‘डैनिन‘‘ फ्रांसीसी बंदरगाह शहर ‘शायर‘ में बनाया जाता है।