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जानें किताबों का इतिहास

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आज बिना किताबों के संसार की कल्पना करना भी बहुत मुश्किल है। एक-से-एक बेहतरीन किताबें आकर्षण छपाई और सुंदर गेटअप में उपलब्ध हैं। हर विषय, हर संदर्भ, हर भाषा की उत म पुस्तकें आज आसानी से सुलभ हो जाती हैं, जिन्हें पढ़कर विभिन्न रूचियों वाले व्यक्ति अपनी ज्ञान-पिपासा शांत कर सकते हैं और अथाह ज्ञान के भंडार से अपना ज्ञानवर्द्धन कर सकते है। विस्तृत अध्ययन के लिए आज हर विषय के प्रामाणिक ग्रंथ उपलब्ध है। मनोंरजन के वास्ते विविध प्रकार की लाखों किताबें मौजूद हैं। आज ज्ञान-अर्जन का मुख्य स्त्रोत किताबें ही हैं, लेकिन पुस्तकों को आज की समृद्ध स्थिति में लाने के पीछे कालजयी मानव का हजारों सालों का अनवरत श्रम और अदम्य उत्साह की वह भावना है, जो आदमी को हमेशा आगे और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रही है।
आइए, हम किताबों की दुनिया के इतिहास में बहुत पीछे तक चल कर देखें। दुनिया की पहली पुस्तक का सृजनकर्ता कोई कवि, लेखक या उपन्यासकार नहीं था। वह था – एक मामूली-सा हिसाब-नवीस! उसनें दुनिया की पहली किताब में जो कुछ लिखा था, उसमें था-जमीनों का हिसाब-किताब, उस वक्त के ‘टेक्स‘ की दरें और अनाज आदि के भाव! संसार की शुरूआती पुस्तकें ईंटां, बिस्कुट और रोटियों के आकार में प्राप्त हुई हैं। ये पकाई गई मिट्टी से निर्मित की गई। कोई साढ़े पांच हजार बरस पुरानी ये विचित्र पुस्तकें असीरिया और बेबीलोनिया की सभ्यता के प्राचीन अवशेषों से प्राप्त हुई हैं। इन पुस्तकों की निर्माण-प्रक्रिया पर अनुसंधान करने से ज्ञात होता है कि इनके निर्माण में उस युग के कुम्हारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा होगा। ये पुस्तकें उस युग के कुम्भकारों की ‘कला‘ के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं।नील नदी की घाटी की सर्वाधिक प्राचीन मिस्त्र की सभ्यता ने पुस्तक निर्माण की प्रक्रिया को गति प्रदान की। पांच हजार वर्षो से भी अधिक समय पूर्व मिस्त्र में ‘पेपाइरस‘ नाम के एक सरकंडे के कागज पर बनी किताबों का प्रचलन शुरू हुआ।
नील नदी की घाटी में ‘पेपीरस नामक वृक्ष बहुत अधिक मात्रा में पैदा होते थे। उसी वृक्ष की छाल से तैयार कागज पर कई प्रकार की किताबें लिखी जाती थीं। पेपाइरस के टुकडे़ या पन्ने पर लिखकर उन्हें एक साथ चिपका लिया जाता अथवा लम्बी पट्टी बनाकर उसे लपेट लिया जाता और इस प्रकार आज की सुंदर आकर्षक पुस्तकों की ‘पूर्वज पुस्तकें‘ तैयार हो जाती थीं। मिस्त्र के एक पिरामिड में मिली कोई 2500 वर्ष पुरानी एक पुस्तक सारे संसार में ‘बुक आोंफ डेथ‘ के नाम से मशहूर है। इस पुस्तक में मिस्त्र के गुजरे हुए सम्राटों, उनकी राज्य- शैली और उनके द्वारा किये गए महत्वपूर्ण कामों का लेखा-जोखा है। पेपाईरस के टुकड़ों को चिपकाकर तैयार की गई ये लम्बी पट्टियां 144 फुट तक लम्बी होती थीं। पट्टी का एक सिरा लकड़ी या हड्डी की किसी छड़ी के साथ चिपका दिया जाता, इसके बाद दूसरा सिरा भी इसी प्रकार की दूसरी हड्डी पर चिपका दिया जाता था और फिर उसे एक सिरे की छड़ी पर सावधानीपूर्वक लपेट दिया जाता था।इस प्रकार पुस्तकें तैयार हो जाती थीं। लोग पुस्तक को खोलकर पढ़ते जाते थे और लपटते जाते थे। इस प्रकार की लिपटी हुई पुस्तकों को ‘स्क्रोल‘ के नाम से पुकारा जाता है। ‘स्क्रोल‘ को दोनो हाथों से पकड़ना होता था। पुस्तकों को मजबूत घागों से बांधा जाता था और ऐसी पुस्तकों (स्क्रोल) को गोल लम्बे डिब्बों में बड़ी हिफाजत के साथ रखा जाता था।
प्रारंभिक पुस्तकें प्राचीन भारतवर्ष में भोज-पत्र पर पक्षियों के पंखों की कलम बनाकर लिखी जाती थीं। भोजपत्र ‘भंर्ज‘ नामक वृक्ष की छाल से तैयार किया जाता था। इसके आयाताकार पृष्ठों को बीच में छेद कर माला की भांति पिरोया जाता था। भोज-पत्र की पोथियों को बांधकर कपड़े के बस्तों में सुरक्षित रूप से रखा जाता था। हिंदू-धर्म के कई प्राचीन ग्रंथ भोज-पत्रों पर लिखे गए।
मध्ययुगीन-काल में फिलीस्तीन, रोम, यूनान आदि देशों में पुस्तकें लिखने के वास्ते पशुओं के चमड़े का उपयोग किया जाता था। सिन्धु युग की ये किताबे चमड़े के कई टुकड़ों को आपस में जोड़कर बनाई जाती थीं। कभी-कभी तो ऐसी पुस्तकों की लम्बाई करीब सौ फीट तक जा पहुंचती। ये किताबें आज कल की जन्मपत्रियों की शक्ल में हुआ करती थीं। आवरण के भीतर बंधी हुई कईं पृष्ठों वाली पुस्तक सर्वप्रथम चर्म-पत्र अर्थात ‘पार्चमेंट‘ पर ही लिखी गई थी। चर्म-पत्र जानवरों की खाल से बनाए गये होते थे। मेमनों अथवा बछड़ों की खाल से बने चर्म-पत्र को बेलम कहा जाता है। यह आमतौर पर मामूली कागज से अधिक मोटा नहीं होता था।
पुस्तकों के लिए कागज का उपयोग सबसे पहले चीन में किया गया। प्राचीन काल में सभी प्रकार की किताबें, चाहे वह पेपाइरस अथवा भोज-पत्र पर बनी हों, चाहे चर्मपत्र अथवा कागज पर बनी हों, लिखी हाथ से ही जाती थीं।
किसी भी पुस्तक की दूसरी प्रति की जरूरत पड़ने पर उसकी हाथ से दुबारा नकल करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं था। यूरोप में मध्य-युग में ईसाई पादरी पुस्तकों की प्रतियां तैयार करने का काम करते थे, जबकि रोम में यह कार्य गुलामों से करवाया जाता था। एक किताब की नकल करने में महीनों और कभी-कभी बरसों लग जाया करते थे। नकल करते समय पुस्तक के पृष्ठों को सुंदर चित्रों से सजाया जाता, लिखावट के वास्ते कई प्रकार के आकर्षक रंगों का इस्तेमाल किया जाता। यदा-कदा अक्षरों पर सोने के वरक चढ़ाये जाते थें।
कागज की भांति छपाई अर्थात मुद्रण-कला के युगांतकारी आविष्कार का श्रेय भी एशियाई राष्ट्र चीन को जाता है। कागज पर छपी विश्व की प्रथम पुस्तक थी – ‘हीरक-सूत्र‘, यह पुस्तक बौद्ध-धर्म से संबंधित थी। सन 868 ई0 में चीन में छपी चीनी भाषा की यह पुस्तक आज भी ब्रिटिश म्यूजिम में मौजूद है। सौलह फुट लम्बे कागज पर मुद्रित यह पुस्तक एक बेलनाकार रूप में लिपटी हुई है। इसमें भगवान बुद्ध का एक खूबसूरत चित्र भी है। सन् 1900 ई0 में यह किताब तुंम हुवांग की गुफा में एक अज्ञात भिक्षुक को मिली थी।
इसी तरह चमड़े पर लिखी हुई सबसे प्राचीन ‘बाईबिल‘ सन् 1945 में मुर्दान की गुफा में एक गरीब गडरिये बालक को अकस्मात मिल गई थी। बाद में उस ंस्थान की खोज करने पर धातु के घड़ों में अनेक धर्म-ग्रन्थों को भी वहां पाया गया। ईसाई धर्म से संबधित यह ग्रंथ ‘डेड-सी स्क्राॅल्स‘ के नाम से विख्यात है।
वैसे सिंधु-घाटी की सभ्यता की खुदाई में प्राप्त अवशेषों, मोहरों आदि के अध्ययन से यह बात ज्ञात होती है कि इस सभ्यता के नागरिक तीन हजार वर्ष पूर्व ही छपाई-कला से परिचित थे, लेकिन हमारे देश में धार्मिक ग्रंथो को स्मृति में रखकर कंठस्थ कर लेने की परंपरा बहुत ही प्राचीन काल से रही है। भारत में आधुनिक पद्धति से सर्वप्रथम जो पुस्तक मुद्रित की गई, वह पुर्तगाली भाषा में थी। सन् 1556 ई0 में पादरी बस्तामेन्टे व मोहानीस गोजाविल्स ने गोवा में इस पुस्तक को छापा। इस कार्य में भारतीयों व्यक्तियों ने भी सहयोग दिया था। भारतीय भाषाओं में सर्वप्रथम 1577 ई0 में त्रिचूर के पास अम्बलाकुंड नामक कस्बे में मलयालम भाषा की पुस्तक प्रकाशित की गई। प्रारंभ में तामिल भाषा की पुस्तकों को भी मलयालम लिपि में मुद्रित किया गया। सेरामपुर (बंगाल) में ईसाई मिशनरियों ने और फोर्ट विलियम कालेज के प्रोफेसरों ने भारतीय भाषाओं में पुस्तकें छपाने के कार्य में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। सबसे पहली हिन्दी भाषा की पुस्तक का मुद्रण भी फोर्ट विलियम काॅलेज के प्रेस में हुआ।

सन 1801 से 1832 ई0 तक सेरामपुर की ईसाई मिशनरियों द्वारा भारतीय भाषा के अलावा चीनी, बर्मी, लैटिन, ग्रीक आदि कई विदेशी भाषाओं की तकरीबन बारह हजार से अधिक पुस्तकें मुद्रित कीं, जो उस युग के हिसाब से एक मिसाल हैं।
किताबों ने इतिहास बनाया है और इतिहास को बदला है। सामाजिक बदलाव में किताबों की भूमिका इतनी अधिक सशक्त और प्रभावकारी रही है कि आज विश्व की कई महत्वपूर्ण विचार धाराओं की नींव पुस्तकों द्वारा प्रचारित विचारों पर खड़ी है। कार्ल माक्र्स की ख्यातिनामा किताब ‘द केपिटल‘ ने रूसी क्रांति के साथ सारी दुनिया के सामने एक प्रबल और प्रखर जीवन-दर्शन ‘साम्यवाद‘ के रूप में रख दिया, जो आज दुनिया की एक अत्यंत महत्वपूर्ण विचारधारा के रूप में स्थापित हो चुकी है। रूसो और वाल्टेयर की पुस्तकों ने फ्रांस के इतिहास को ही झकझोर डाला। पुस्तकां ने कई आविष्कारों में महती भूमिका निभाई और दुनिया तथा ब्रह्माण्ड के अबूझे रहस्यों को खोज निकाला।
आज पुस्तकों के प्रकाशन की तकनीक अपने चरम-शिखर पर है लेकिन पुस्तकों की आज की सम्पन्न, समृद्ध और वैभवशाली स्थिति के पीछे एक बहुत-बहुत लम्बा सफर हैं। पकी ईंटों, चमड़े, पाइपरस के सरकंडो, ताम्रपत्र, चर्म-पत्र और कागज से होती हुई यह यात्रा आज सुंदर, आकर्षक आॅफसेट प्रिटिंग, मजबूत वाइंडिंग और खूबसूरत गेटअप में छपी अनमोल पुस्तकों तक आ पहुंची है। लेकिन यही कुछ किताबों के सफर का आखिरी मुकाम नहीं है। आदमी अपराजेय लगन और अदम्य उत्साह किताबों के इस हसीन सफर को अभी और बहुत दूर तक ले जाएगा।