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जब पुरू ने राखी बंधवायी

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सिकंदर – पुरू का वह प्रसंग संभवतः आपको याद होगा, जब सिकंदर ने पराजित पुरू से पूछा था – ‘‘तुम्हारे साथ कैसा बर्ताव किया जाए?‘‘ सिकंदर को तब पुरू ने करारा जवाब दिया था – ‘‘ वैसा ही, जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है। ‘‘ उसी साहसी पुरू के जीवन का मार्मिक प्रसंग है यह
विश्व-विजय की इच्छा से सिकंदर एक के बाद एक राज्य जीतता चला जा रहा था। सिकंदर ने अपना समूचा ध्यान अपने सैन्य-बल पर केंद्रित किया था। कई देशों पर विजय हासिल करते हुए वह ईरान-अफगानिस्तान होता हुआ भारत पहुंचा। उन दिनों पंजाब क्षेत्र पर पुरू का आधिपत्य था। पुरू भी सिकंदर की ही तरह बहादुर और पराक्रमी शासक था। सिकंदर ने उसे संदेशा भिजवाया कि वह उससे संधि कर अपना राज्य दे दे। लेकिन स्वाभिमानी पुरू ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। ऐसी स्थिति में दोनों में युद्ध होना ही था।
सिकंदर के सैनिकों ने पुरू के पंजाब क्षेत्र को चारों ओर से घेर धावा बोल दिया। दोनों पक्षों के सैनिकों में घमासान युद्ध शुरू हो गया। युद्ध को देखते हुए यह कह पाना बहुत दूभर था कि विजय किस की होगी? सिकंदर के साथ उसकी प्रेमिका भी भारत आई थी।
युद्ध को लगातार फैलते देख वह अनिष्ट की आशंका से बेहद चिंतित थी। रोज दोनो पक्षों के सैंकड़ो सैनिक मर रहे थे। वह अपार जन-धन की हानि देखकर खिन्न थी और सिकंदर से लगातार आग्रह कर रही थी कि युद्ध खत्म कर समझौता कर ले। लेकिन भला सिकंदर को यह कब मंजूर था कि वह एक हिंदू शासक के सामने झुक जाए?
एक दिन सिकंदर की प्रेमिका को यह पता चला कि भारत में राखी का त्यौहार मनाया जाता है, जिसे भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक समझा जाता है। उस ईरानी युवती ने रक्षाबंधन के बारे में और भी जानकारी हासिल की।
संयोग से रक्षाबंधन का दिन करीब ही था।
उस दिन वह ईरानी युवती एक थाली में कुछ मिठाई और रेशमी धागों के टुकड़े लेकर छुपते-छुपाते अपने शिविर से बाहर निकली और पुरू के दरबार में जा पहुंची। वहां उसने पुरू से भंेट की और विनम्र स्वर में कहा – ‘‘ मैं आपको अपना भाई बनाना चाहती हॅंू। ‘‘ राजा पुरू ने उस युवती की भावनाओं को पूरा सम्मान दिया और अपनी कलाई आगे बढ़ा दी। युवती ने राजा पुरू के हाथों पर रेशमी धागा बांध दिया और अपने हाथों एक टुकड़ा मिठाई का पुरू के मुंह में दे दिया। राजा पुरू उसे भेंट में कीमती वस्त्र और आभूषण दिये तथा सुरक्षा का आश्वासन भी दिया।
उस युवती ने लौटते समय कहा – ‘‘ महाराज, शायद आपने मुझे पहचाना नहीं, मैं एक ईरानी युवती हूं और सिकंदर की प्रेमिका। मैं आपसे मदद मांगने आयी हूं। आपने मुझे अपनी बहन का दर्जा दिया है। उम्मीद है, अब आप अपनी बहन के सुहाग की रक्षा करना अपना दायित्व समझेगें।‘‘
हतप्रभ पुरू से कुछ कहते नहीं बना। वह ठगा-सा खड़ा रह गया और वह युवती चुपचाप वहां से चली गई। पुरू देर तक अंतद्र्वन्द्व की स्थिति में रहे। वह फैसला नहीं कर पा रहे थे कि क्या किया जाए? एक तरफ सिकंदर, जो उनका सबसे बड़ा दुश्मन था और दूसरी ओर एक अजनबी बहिन को दिया गया सुरक्षा का वायदा!
युद्ध कुछ दिनों तक थमने के बाद फिर शुरू हो गया। युद्ध में एक दफा ऐसी स्थिति आई, जब पुरू सिकंदर का काम आसानी से तमाम कर सकता था। सिकंदर घोड़े पर था और पुरू हाथी पर सवार। पुरू ने जैस ही सिकंदर पर वार करना चाहा, अचानक उन्हें अपनी अजनबी बहिन से किया गया वायदा याद आ गया और पुरू के भाला थामे हाथ रूक गए। सिकंदर मृत्यु के मुंह में जाने से बच गया।
बाद में, सिकंदर की सेना विजयी हो गई। सिकंदर जब जीत का उल्लास मना रहा था, उसकी प्रेमिका अपने भाई की हार पर उदास थी।
राखी के उन कोमल धागों ने सचमुच इतिहास की दिशा भी मोड़ दी थी।
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