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जब बरसों पहले मरे लोग जी उठेंगे !

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मनुष्य की अदम्य जिजीविषा, अटूट लगन और शीौर्यपूर्ण अपराजेय
दुस्साहस ने अनेक बार प्रकृति को ललकारा है और कई बार अजेय प्रकृति
पर विजय भी हासिल की है। जीवन कम और प्रकृति का सबसे बड़ा और
भयावह सच है-‘मौत’। अनादिकाल से आदमी ने मृत्यु” जैसे शाश्वत सत्य
को झुठलाने और उसे परास्त करने के प्रयास किये हैं। मृत्यु की प्रस्तर
प्रतिमा को वह अपने नाखूनों से खरोचने की कोशिश में खुद भी लहूलुहान
हुआ है, किंतु लगता है हार मान लेना आदमी की नियति ही नहीं है। आज
भी आदमी ‘अमरत्व’ की परिकल्पना को साकार रूप देने में लगा हुआ है।

क्या मृत्यु के कई सालों बाद आदमी फिर से जी सकता है ? क्‍या
मृत मनुष्य कई बरसों बाद सामान्य व्यक्ति की तरह चल फिर सकते हैं ?
क्या वह अपना सामान्य कार्य कर सकते हैं ? ये सवाल हमें भले ही
तिलिस्मी, रहस्यमय या परिहासपूर्ण लगें, किंतु इस दुनिया में हिमीकृत
अवस्था में सहेज कर सुरक्षित रखी पचासों लाशें फिर से जी उठने के
इन्तजार में सांस रोके! इन सवालों का जवाब ढूंढने में व्यस्त जीव-विज्ञान
के विशेषज्ञों की ओर ‘टकटकी बांधे देख’ रही हैं |

मृत्यु के शश्चात मनुष्य के मृत शरीर को निम्न तापमान पर हिमीकृत
अवस्था में सुरक्षित रखने की प्रणाली बहुत पुरानी नहीं है। इस प्रणाली द्वारा
मृत शरीरों को सुरक्षित रखने का उद्देश्य यह है कि जब वैज्ञानिक मृत शरीर
में प्राण फूंकने संबधी प्रयोगों में सफल हो जाये, तब इन मरे हुए लोगों को
पुनर्जीवित किया जा सके।

हिमीकरण की प्रकिया को समझने से पूर्व मृत्यु की परिभाषाएं जान
लेना उचित होगा। चिकित्सा विज्ञान में ‘ृत्यु’ के तीन प्रकार बताये गये हैं-
प्रथम, नैदानिक मृत्यु (क्लनिकल डेथ), जो दिल की धड़कन बंद हो जाने,
सांस रूक जाने तथा मस्तिष्क की तरंगे समाप्त हो जाने पर होती है। दूसरी,
शरीर की कियात्मक मृत्यु (फेजियोलाजिकल डेथ), जिसमें शरीर इस सीमा
तक नष्ट हो जाता है कि उसे पुनर्जीवित करने की कोई संभावना शेष नहीं
रहती तथा तीसरी कौशिकीय मृत्यु (सेल्युलर डेथ), जिसमें शरीर की सारी
कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं। कोशिकीय मृत्यु, नैदानिक मौत के अड़तालीस
घण्टे की अवधि में होती है।

‘हिमीकरण द्वारा पुनरूज्जीवन’ की परिकल्पना की श्रृंखला में अमेरिकी
भौतिकविद राबर्ट सी. डब्ल्यू. एटिंजर का नाम प्रमुख है। अपनी पुस्तक “दी
प्रास्पक्ट ऑफ इम्पाटेलिटी ‘ में उन्होंने जीवन व मृत्यु की सर्वथा नई
परिभाषाएं प्रस्तुत करते हुए कहा कि मृत्यु के फौरन बाद शव को इतना
ठण्डा कीजिए कि मौत दूर भाग जाये और उसे सुरक्षा-रसायनों से लैस कर
सुरक्षित कर लीजिए। अपनी इस पुस्तक में एटिंजर ने आशा प्रकट की थी
कि शीघ्र ही विज्ञान मृत शरीर में जीवन उतार पाने में सफल हो जायेगा।

लगता है, एटिंजर की भविष्यवाणी सत्य होने का समय आ रहा है।
अमेरिका के मिलवाकी शहर में 49 जनवरी 4985 को दो साल का एक बच्चा
घर के बाहर शून्य से उन्‍नीस डिग्री सेंटीग्रेट कम तापमान में बर्फ में जमा
हुआ मृत पाया गया। उसे मिलवाकी के बच्चों के अस्पताल में ले जाया गया,
जहां डाक्टरों ने उसे लाक्षणिक रूप से मृत घोषित किया, फिर भी डाक्टरों ने
प्रयास करना नहीं छोड़ा। उसकी छाती की शल्य चिकित्सा करके उसे
हार्टलंग मशीन से जोड़ दिया गया, उसके हाथ-पांव में चीरे लगा दिये गये
ताकि शरीर का तापमान बढ़ने पर उसके शरीर के कोशिका समूह बढ़ सकें।
इसके पश्चात कमशः उसके शरीर का तापमान बढ़ाया गया। सभी डाक्टर
यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये किवह मृत बच्चा जी उठा।

इस घटना से हिमीकरण की प्रकिया से संबद्ध अनुसंधानों में तेजी
आई है। कैलिफोर्निया के बर्कले विश्वविद्यालय में जीवविज्ञानी पाल सीगल ने
सन्‌ 4986 में प्रयोग किया। सीगल ने अपनी प्रयोगशाला में माइल्स नामक
कुत्ते के शरीर के तापमान को कमशः कम किया। बीस डिग्री सेंटीग्रेट
तापमान पर पहुंचते-पहुंचते माइल्स के दिल की धड़कन और मस्तिष्क की
सारी कियाएं बंद हो गई। चिकित्सकीय भाषा में उसकी “लाक्षणिक मृत्यु’ हो
गई। इसके तुरंत बाद माइल्स के शरीर का सारा खून निकाल लिया गया
औरउसके स्थान पर उसके शरीर में कृत्रिम हिमरोधी रक्‍त पहुंचाया गया।
इसके बाद माइल्‍स के शरीर के तापकम को और कम किया गया।अब सीगल
ने उस कुत्ते के शरीर के तापमान को कुछ बढ़ाया और कृत्रिम खून निकाल
कर वापस उसे खुद का खून चढ़ा दिया गया। इसके पश्चात माइल्‍स के
शरीर के तापकम को कमशः बढ़ाया गया। देखते-देखते करीब बीस मिनट
तक “मृत” रहने के बाद माइल्‍्स पुनः जीवित हो गया। ‘जीवित होने के बाद
माइल्स पुर्णरूप से स्वस्थ था। .

जीव-विज्ञानियों ने कुछ ऐसे प्राणियों की खोज की है, जिनके दिल
की धड़कन व मस्तिष्क की कियाएं शीतकालीन मौसम में बंद हो जाती है
तथा बसंत के आगमन के साथ वह पुनः जी उठते है। ध्रुव प्रदेशों में पाये
जाने वाले वर्सिबलख, कैसिफर, रानासिल्वाटिका और सूडोकेरिस नामक
प्रजातियों के मेंढक सर्दियों में शरीर के अंदर बर्फ जम जाने से ‘मर’ जाते हैं।
मगर जैसे ही बसंत में इनके शरीर के भीतर जमी हुई बर्फ पिघलती है वह
फिर से जी उठते हैं।

इन प्राणियों की शारीरिक संरचना का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों
ने इनके शरीर की कार्यप्रणाली के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले हैं, उन्हें
आधार बनाकर यह अनुसंधान किया जा रहा है कि कया मनुष्य के मृत शरीर
को हिमीकरण द्वारा सुरक्षित रखकर उसे फिर से जीवित किया जा सकताहै?

अमेरिका और कई पश्चिमी देशों में लोग अपनी मृत्यु के बाद अपने
शव को सुरक्षित रखने हेतु अग्रिम व्यवस्था में जुटे हैं। श्रीमती क्लारा डास्टल
की अमेरिका के जार्ज वाशिंग्टन अस्पताल में ॥0 दिसम्बर 4972 को मांसपेशी
के कैंसर से मृत्यु हो गई। श्रीमती डास्टल की पुत्री ने अपनी मां की इच्छा
के अनुरूप उसक शव को सुरक्षित रखने के लिए ‘कामोस्पान कार्पोरेशन’
नामक कंपनी की मदद से उसके शव को ‘ड्राइ आइस’ पर रखकर उसे
एल्समिनिसस फायल से हृककर झशन्‍्य से 7५ सेंटीगेट नीचे तापमान पर एक

संदूक में बंद कर रखवा लिया। इससे पूर्व श्रीमती डास्टल के शरीर का
समूचा खून निकाल कर उसमें एक जैविक एंटी-फिज रसायन भर दिया
गया। श्रीमती डास्टल की लाश आज भी इस उम्मीद में सहेज कर रखी हुई
है कि एक दिन वह पुनः जीवित हो सकेगी। इस उम्मीद की कीमत श्रीमती
डास्टल की पुत्री श्रीमती हालपर्ट को दो सौ पचास डालर प्रतिमाह की दर से
चुकानी पड़ रही है।

कैलिफोर्निया में भी पाल सीगल के संस्थान में दोहरे तापरोधी फौलाद
से बने बड़े-बड़े तरल नाइट्रोजन से भरे टैंकों में बारह मृत मनुष्यों के शरीर
रखे हुए हैं। इन टैंकों का तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे बनाये रखा जाता
है। इसके अतिरिक्त सैकड़ों मृत लोगों के शवों को विभिन्‍न स्थानों पर
सा द्वारा सुरक्षित रखा गया है, ताकि उपयुक्त समय पर जीवित किया
जा सके।

वस्तुत: हिमीकरण की प्रकिया की शुरूआत 4967 में हुई। सबसे पहले
हिमीकरण करने वाले रोबर्ट नेल्सस ने अपनी पुस्तक ‘वी फिज दी फर्स्ट मैन’
में हिमीकरण की विधि का ब्यौरा देते हुए लिखा है– 73 वर्षीय मनोवैज्ञानिक
जेम्स बेडफोर्ड प्रथम हिमित मनुष्य होने का गौरव प्राप्त करने वाले व्यक्ति थे।
बेडफोर्ड की मृत्यु के बाद उनके शरीर को बर्फ पर रखा गया, फिर शरीर का
सारा खून बाहर निकाल लिया गया। अब उनको ॥0 डिग्री सेंटीग्रेड तक
ठण्डा करने के बाद उनकी धमनियों व शिराओं में ‘रिंगर्स लेक्टेटवाला
ग्लिसराल’ नामक संरक्षक द्रव भर दिया गया। इसके बाद लाश को
अल्युमिनियम फायल में लपेट कर ठोस कार्बन आक्साइड वाले, बक्से में रख
गया, जिसका तापमान शून्य से 79 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे था। बाद में इस
लाश को निकाल कर एक कैप्सूल में रख दिया गया, जिसमें द्रव्य नाईट्रोजन
भरी थी। यहां का तापमान शून्य से 496 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे था। इस
तापमान पर सारी आणविक गतिविधियां खत्म हो जाती है तथा शरीर सदा के
लिए सुरक्षित हो जाता है।

हिमीकरण द्वारा मृत शरीर को सुरक्षित रखने के लिए आज भी तकरीबन राबर्ट नेल्सन द्वारा अपनाई गई विधि ही काम में लाई जाती है। केवल हिम-प्रतिरोधक रसायन के रूप में अब डाइमिथाइल सल्फा साइस (डी.
एस.एस.ओ.) का प्रयोग किया जाता है, जो मृत शरीर के अंगों में मौजूद पानी को अधिक कारगर रूप से बर्फ बनने से रोकता है।

हिमीकरण द्वारा पुनर्जीवन पर वैज्ञानिक सफलताएं निश्चित तौर पर उत्साहित करने वाली हैं। अनुसंधानों की प्रगति को देखते हुए लगता है कि वह दिन ज्यादा दूर नहीं,जब हम बरसों पहले हमसे बिछुडे किसी परिचित रिश्तेदार या स्वजन को पुनः उसी रंगरूप में अपने बीच पायेंगे। आइये, उस दिन की प्रतीक्षा करें।