Isabgolcdb

Isabgol | इसबगोल 12

Isabgol
Isabgol | इसबगोल 12

इसबगोल – एक विस्म्रत औषधि

हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धति मूलतः प्राकृतिक पदार्थों और जड़ी बूटियों पर आधारित  थी। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में साध्य-असाध्य रोगों का इलाज प्रकृति प्रदत्त वनस्पतियों  के माध्यम से सफलतापूर्वक किया जाता था। समय की धुंध के साथ हम कई प्राकृतिक औषधियों को भूला बैठे। ‘इसबगोल’  जैसी चमत्कारी प्राकृतिक औषधि भी उन्हीं मे से एक है।इसबगोल नाम एक फारसी शब्द से निकला है , जिसका मतलब होता है -‘ घोड़े के कान] क्योकि इसकी पत्तिया उसी आकार की होती हैं l हमारे वैदिक साहित्य और प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इसका उल्लेख मिलता हैं। संस्कृत साहित्य में इसे ‘स्निग्धवीजम्‌’ नाम से सम्बोधित किया गया है।

मुगलों के साथ इसबगोल का पुर्नप्रवेश

पर्याप्त जानकारी और ज्ञान के अभाव में शनै: शनैः हमारे देश में चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत इसबगोल का इस्तेमाल कम होता गया। बाद में हमारे मुल्क में मुगलों के आगमन के साथ ही इसबगोल का पुर्नप्रवेश हुआ। दुनिया की तकरीबन हर प्रकार की चिकित्सा पद्धति  में इसबगोल का उपयोग बतौर औषधि किया गया है। अरबी और फारसी चिकित्सकों द्वारा इसके इस्तेमाल के प्रमाण मिलते है।

दसवी सदी में फारस के मशहूर हकीम अलहेखी और अरबी हकीम अविसेन्ना ने इसबगोल द्वारा चिकित्सा के सम्बन्ध में व्यापक प्रयोग व अनुसंधान किए। ‘इसबगोल’ मूलतः फारसी शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है, पेट का ठण्डा करने वाला पदार्थ। बंगला भाषा में इसे ‘इसबगोल’  तथा गुजराती में ‘अठनुंजीरू’ कहा जाता है। इसका वनस्पति शास्त्रीय नाम ‘प्लेंटेंगा इंडिका’  है तथा यह ‘प्लेटो जिनेली’ समूह का पौधा है।

पोस्ट देखें

Isabgolcdb
Isabgol | इसबगोल 12

इसबगोल के पौधे की जानकारी

nurserylive psyllium isabgol seeds 600x 1
Isabgol | इसबगोल 12

इसबगोल पश्चिम एशियाई मूल का पौधा है। यह तना रहित एक झाडीनुमा पौधा है, जिसकी अधिकतम ऊंचाई ढाई से तीन फुट तक होती है। इसके पत्ते महीन होते हैं तथा इसकी टहनियों के सिरे पर गेहूं  की तरह बालियां लगती हैं तथा फूल आते हैं । फूलों मे नाव के आकार के बीज होते है। इसके बीजों पर सफेद व पतली झिल्ली होती है। यह झिल्ली ही दरअसल इसबगोल की भूसी कहलाती है। बीजों से भूसी निकालने का कार्य हाथ से  चलाई  जाने वाली चक्कियों और मशीनो से किया जाता है। इसी भूसी का सर्वाधिक औषधिय महत्व  है।

इसबगोल की बुआई शीत ऋतु के प्रारम्भ में की जाती है। इसकी बुआई के लिए पर्याप्त नमी वाली जमीन होना आवश्यक है। आमतौर पर यह क्यारियां बनाकर बोया जाता है।  बीज के अंकुरित होने में करीब 7 से 40 दिन लगते है। इसबगोल के पौधो की बढ़त बहुत ही पद्धति  मंद गति से होती है।

अनेक चिकित्सा पद्धतियों में मान्यता

इसबगोल के औषधीय महत्व को प्राय: प्रत्येक चिकित्सा पद्धति में स्वीकार किया गया है। यूनानी चिकित्सा पद्धति में इसके बीजों को शीतल, शांतिदायक, मलावरोध को दूर करने वाला तथा अतिसार, पेचिश और आंत के जख्म आदि रोगो में उपयोगी बताया गया है। प्रसिद्ध चिकित्सक मुजर्रबात अकबरी के अनुसार, नियमित रूप से प्रतिदिन इसबगोल का सेवन करने से श्वसन रोगों तथा दमे में बहुत राहत मिलती है।  अठाहरवीं शताब्दी के प्रतिभाशाली चिकित्सा विज्ञानी फ्लेमिंग व राक्सवर्ग ने भी अतिसार रोग के उपचार के लिए इसबगोल को  रामबाण औषधि बताया।

Screenshot 11Isabgol
Isabgol | इसबगोल 12

इसबगोल की रासायनिक संरचना

रासायनिक संरचना के अनुसार इसबगोल के बीजों व भूसी में 30 प्रतिशत तक म्यूसिलेजनामक तत्व पाया जाता है। म्यूसिलेज की इस प्रचुर मात्रा के कारण इसके बीजों में बीस गुना पानी मिलाने पर भी यह एक स्वाद रहित जैली के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसके अलावा इसबगोल में 44.7 प्रतिशत एक प्रकार का अम्लीय तैल होता है, जिसमें खून के कोलस्ट्रोल का घटाने की क्षमता होती है।

इसबगोल का बढ़ता चिकित्सीय महत्व

 आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में भी दिनो-दिन इसबगोल का महत्व बढ़ता जा रहा है। पाचन-तन्त्र से सम्बन्धित रोगो की औषधियों में इसका इस्तेमाल हो रहा है। अतिसार, पेचिश जैसे उदर रोगों में इसबगोल की भूसी का इस्तेमाल न केवल लाभप्रद है बल्कि यह पश्चातवर्ती दुष्प्रभावों से भी मुक्त है। भोजन में रेशेदार पदार्थों के अभाव के कारण कब्ज जैसी बीमारी हो जाना आजकल सामान्य बात है और अधिकांश लोग इससे पीड़ित है। आहार में रेशेदार पदार्थों की कमी को नियमित रूप से इसबगोल की भूसी का सेवन कर दूर किया जा सकता है।

यह पेट में पानी सोखकर फूलती है और आंतो में उपस्थित  पदार्थों का आकार  बढाती है। इससे आंतें  अधिक सकिय होकर कार्य करने लगती हैं  और पचे हुए पदार्थों को आगे बढ़ाती है। यह भूसी शरीर के टाक्सिन्स और बैक्टिरिया को भी सोख कर शरीर से बाहर निकाल देती है।

इसबगोल Isabgol की भूसी और बीज कब्ज व अन्य रोगों में कारगर

इसबगोल की भूसी तथा इसके बीज दोनो ही विभिन्‍न रोगों  में एक प्रभावी औषधि का कार्य करते हैं । इसके बीजों को शीतल जल में भिगोकर उसके अवलेह को छानकर पीने से  खूनी बसावीर में लाभ  होता है। नाक से खून निकलने की स्थिति में इसबगोल के बीजों को सिरके के साथ पीसकर कनपटी पर लेप करना चाहिए l

कब्ज के अतिरिक्त,  दस्त,  आंव,  पेट दर्द आदि मे भी इसबगोल की भूसी लेना लाभप्रद  रहता है। अत्यधिक कफ होने की स्थिति में इसबगोल के बीजों  का काढ़ा बनाकर रोगी को  दिया जाता है।

इसबगोल के बीजों का इस्तेमाल करने से पूर्व उन्हें भली प्रकार साफ कर लिया जाना  चाहिए। तत्पश्चात इन्हें धोकर सूखा लें। भूसी को सीधे भी दूध या पानी के साथ लिया जा सकता है अथवा एक कप पानी मे एक तोला भूसी और कुछ शक्कर डालकर जैली तैयार कर लें तथा इसका सेवन करे।

 सामान्यतः इसबगोल की भूसी और बीजों का उपयोग रात में सोते समय किया जाता है  किन्तु आवश्यकतानुसार इन्हें दिन मे दो या तीन बार भी लिया जा सकता है।

इसबगोल पाचन सम्बन्धी रोगों की लोकप्रिय औषधि होने के अलावा रंग-रोगन, आइसकीम तथा अन्य चिकने पदार्थों की निर्माण मे भी प्रयुक्त होता है। आजकल तो औषधिय  गुणो से युक्त इसबगोल की भूसी से गर्भ-निरोधक गोलियां भी बनने लगी हैं।

Screenshot 11
Isabgol | इसबगोल 12

Isabgol

जानिए इसबगोल के फायदे

Isabgol | इसबगोल 12

Isabgol | इसबगोल

बेनेफिट्स ऑफ़ इसबगोल

Isabgol

ईसबगोल के फायदे

Isabgol | इसबगोल 12