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अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का संविधान

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अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय (द इन्टरनेशनल कोर्ट आॅफ जस्टिस) को लेकर जन सामान्य में कई भ्रांतियां और गलत धारणाएं तो प्रचलित हैं ही, साथ ही इसे लेकर कई प्रकार की जिज्ञासाएं व उत्सुकता भी आमतौर पर देखी जा सकती हैं। वस्तुतः अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र संघ का एक प्रधान न्यायिक अंग है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 92 में अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना का अनुच्छेद 93 में, इसके पक्षकारों और अनुच्छेद 94 से 96 में इसकी कार्य प्रक्रिया के सम्बन्ध में प्रावधान किए गए हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का अलग से एक लिखित संविधान है, जिसमें पांच अध्यायों में कुल 70 अनुच्छेद हैं। संविधान के पहले अध्याय में न्यायालय के गठन, सदस्यता, न्यायाधीशों के कार्यकाल, मुख्यालय तथा न्यायाधीशों के वेतन-भत्तों अन्तर्राश्ट्रीय न्यायालय का संविधान: इत्यादि विषयों पर अनुच्छेद 1 से 33 तक में प्रक्रिया सम्बन्धी प्रावधान दिए गए हैं। न्यायालय का गठन कुल पन्द्रह सदस्यों के निर्वाचन द्वारा किया जाता है निर्वाचन प्रक्रिया के अनुसार राष्ट्रीय समूहों द्वारा इस हेतु उन व्यक्तियों के नाम निर्देशित किए जाएंगे, जो न्यायालय के सदस्य के रूप में कर्Ÿाव्यों का निर्वहन करने में सक्षम हांे। अनुच्छेद 6 में प्रत्येक राष्ट्रीय समूह से कहा गया है कि वह नाम निर्देशन करने से पूर्व अपने उच्चतम न्यायालय विधि संकायों विधि विद्यालयों तथा अपनी राष्ट्रीय अकादमियों और विधि के अध्ययन में संलग्न अन्र्राष्ट्रीय अकादमियों के राष्ट्रीय अनुभागों से परामर्श कर लें।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव द्वारा इस प्रकार नाम निर्देशित किए गए व्यक्तियों की सूची तैयार कर महासभा और सुरक्षा परिषद् में प्रस्तुत की जाएगी। इसके पश्चात् जो अभ्यर्थी महासभा और सुरक्षा परिषद में स्पष्ट बहुमत प्राप्त करेगा उसे निर्वाचित घोषित किया जाएगा। यहां यह उल्लेखनीय है, न्यायालय के सदस्य के रूप में एक राष्ट्र से केवल एक ही व्यक्ति का निर्वाचन किया जा सकेगा। यदि महासभा और सुरक्षा परिषद में एक ही राज्य के एक से अधिक व्यक्तियों को बहुमत प्राप्त हो जाता है तो उनसे आयु में ज्येष्ठतम को ही निर्वाचित हुआ समझा जाएगा (अनुच्छेद 10 पैरा 3)।
यदि निर्वाचन की प्रथम बैठक में एक अथवा दो सीट रिक्त रह जाती है तो दूसरी व तीसरी बैठक बुलाई जाती है (अनु. 11) यदि तीसरी बैठक के उपरान्त भी कोई सीट रिक्त रह जाती है, तो छः सदस्यों का संयुक्त सम्मेलन का निर्माण सामान्य सभा अथवा सुरक्षा परिषद् की प्रार्थना पर किया जा सकता है, जिसमें तीन सदस्य सामान्य सभा द्वारा तथा तीन सदस्य सुरक्षा परिषद् द्वारा मनोनीत किए जाएंगे। इस सम्मलेन का उद्देश्य पूर्ण बहुमत द्वारा प्रत्येक सीट के लिए सामान्य सभा तथा सुरक्षा परिषद् की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। यदि संयुक्त सम्मेलन में सर्वसम्मति हो तो वह ऐसा नाम भी प्रेषित कर सकता है, जिसका पहले की सूची में नाम न हो। यदि संयुक्त सम्मेलन यह अनुभव करे कि वह कोई नाम प्रस्तावित करने की स्थिति में नहीं है तो सुरक्षा परिषद् ऐसे उम्मीदवारों में से एक व्यक्ति का निर्वाचन कर सकती है, जिसे पहले सामान्य सभा अथवा सुरक्षा परिषद में आवश्यक मत प्राप्त हुए हों (अनु. 12)।
अनुच्छेद 13 के अनुसार न्यायालय के सदस्य नौ वर्ष के लिए निर्वाचित किए जाते हैं। इसी अनुच्छेद के पैरा नं 3 में प्रावधान किया गया है कि न्यायालय के सदस्य तब तक अपने पदों पर बने रहेंगे, जब तक कि उनके स्थान पर नए सदस्यों की नियुक्ति नही हो जाती। इसके अतिरिक्त यह भी प्रावधान है कि उनके स्थान पर दूसरे न्यायधीश का चयन हो जाने पर भी वे उन वादों का निपटारा करेंगे, जिन पर उन्होंने सुनवाई प्रारम्भ कर दी थी।
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न्यायालय के प्रत्येक सदस्य पर किसी भी प्रकार का राजनैतिक या प्रशासनिक कार्य करने पर पाबंदी रहेगी तथा वह वृŸिाक प्रकृति की किसी अन्य उपजीविका में नहीं लगेगा (अनु. 6)।
इसके साथ ही न्यायालय का कोई सदस्य किसी मामले में अभिकर्ता या अधिवक्ता के रूप में कार्य नहीं कर सकेगा ( अनु. 17 )।
न्यायाल का प्रत्येक सदस्य कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व खुले न्यायालय में सत्यनिष्ठा से घोषित करेगा कि वह अपनी शक्तियों का प्रयोग निष्पक्ष भाव और शुद्ध अन्तःकरण से करेगा ( अनु. 20 )।
न्यायालय के सदस्य अपने अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष का तीन वर्ष की अवधि के लिए निर्वाचन कर सकेंगे ( अनु. 21 )। उनका पुननिर्वाचन हो सकता है। न्यायालय का मुख्यालय हेग में स्थित है। किन्तु यह न्यायालय के विवेक पर है कि वह अपना अधिवेशन और अपने कृत्यों का पालन अन्यत्र करना आवश्यक समझे तो वह ऐसा कर सकेगा। दीर्घावकाश के अतिरिक्त न्यायालय स्थायी रूप से कार्यरत रहेगा।
न्यायालय का अध्यक्ष तथा रजिस्ट्रार न्यायालय के मुख्यालय में रहेंगे। यदि किसी विशेष कारण से, न्यायालय का कोई सदस्य यह अनुभव करे कि उसे निर्णय में भाग नही लेना चाहिए तो वह अध्यक्ष को इस तथ्य से अवगत करा देता है।
यदि न्यायालय का अध्यक्ष यह अनुभव करे कि किसी निर्णय विशेष में किसी सदस्य को निर्णय नहीं देना है, तो वह इसकी सूचना उस सदस्य को दे देगा।
यदि इस संदर्भ में अध्यक्ष एवं सदस्य में मतभेद हो तो इसका निर्णय न्यायालय करेगा।
न्यायालय को समय-समय पर तीन या अधिक न्यायाधीशों की पीठ विशिष्ट वर्गो के मामलों के लिए गठित करने का अधिकार होगा। इसी प्रकार अनुच्छेद 29 मंे विवादांे के शीघ्र निस्तारण हेतु प्रतिवर्ष पांच न्यायाधीशों वाली एक अनुपीठ के गठन का भी प्रावधान है। जिसके द्वारा पक्षकारों के अनुरोध पर मामलों की सुनवाई तथा अवधारण संक्षिप्त प्रक्रिया द्वारा किए जाने की व्यवस्था की गई है।
अनुच्छेद 32 में न्यायालय के प्रत्येक सदस्य को वार्षिक वेतन मिलने और भŸाों के सम्बन्ध में प्रावधान है।
संविधान के दूसरे अध्याय के अनुच्छेद 34 से 38 में न्यायालय की आधिकारिकता के सम्बन्ध में विस्तृत उपबन्ध किए गए हैं। अनुच्छेद 34 के अनुसार इस न्यायालय के समक्ष केवल राज्य ही पक्षकार हो सकेंगे। यदि कोई राज्य राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं है, और वह इस न्यायालय में लम्बित किसी विवाद में पक्षकार है तो उसे न्यायालय द्वारा तय की गई रकम न्यायालयीन खर्च के रूप में अदा करनी होगी।
अनुच्छेद 36 में अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की आधिकारिकता को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि पक्षकारों द्वारा निर्देशित किए जाने वाले मामले और ऐसे सभी विषय जो संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में या प्रवृत संधियों और कन्वेशनों में विशेष रूप से क्षेत्राधिकार के अन्र्तगत आएंगे। इसके अतिरिक्त किसी संधि का निर्वाचन अन्तर्राष्ट्रीय विधि का कोई प्रश्न किसी ऐसे तथ्य की विद्यमानता जो सिद्ध होने पर किसी अन्र्राष्ट्रीयता बाह्यता के भंग के लिए की जाने वाली क्षतिपूर्ति की प्रकृति या मात्रा जैसे विषय स्वयमेव ही न्यायालय की अनिवार्य अधिकारिता के अन्तर्गत हैं।

अध्याय 3 में अनुच्छेद 39 से 64 तक 37 उपबन्धों का वर्णन है, जिन्हें न्यायालय प्रक्रिया के रूप में अपनाता है। अनुच्छेद 39 के तहत फ्रांसीसी व अंग्रेजी को न्यायालय की भाषाएं घोषित किया गया है।
अनुच्छेद 40 के अनुसार न्यायालय के समक्ष वाद विशेष करार की सूचना द्वारा अथवा रजिस्ट्रार को सम्बोधित लिखित आवेदन द्वारा लाए जाते हैं। लिखित आवेदन में विवाद के विषय तथा पक्षकारों का उल्लेख किया जाता है। रजिस्ट्रार द्वारा सभी सम्बन्धित पक्षों को अविलम्ब आवेदन की सूचना पे्रषित की जाती है।
संविधान के अनुच्छेद 42 में उल्लेख किया गया है कि पक्षकारों का प्रतिनिधित्व उनके एजेन्ट, अधिवक्ता अथवा कांउसिल करेंगे। लिखित कार्यवाहियों में न्यायालय और पक्षकारों के अभ्यावेदनों, प्रति अभ्यावेदनों, उŸारों तथा कागज पत्रों व दस्तावेजो की सूचनाएं सम्मिलित हांेगी। किसी एक पक्ष द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज की प्रमाणित प्रति दूसरे पक्षकार को उपलब्ध कराई जाएगी। मौखिक कार्यवाहियों में साक्षियों, विशेषज्ञों, अभिकर्ताओं और अधिवक्ताओं की सुनवाई शामिल होगी।
जब तक अन्यथा निर्देशित न हो, सामान्यतः न्यायालय में सुनवाई सार्वजनिक रूप से की जाती है। प्रत्येक सुनवाई का कार्यवृत तैयार किया जाता है और उसे अध्यक्ष व रजिस्ट्रार द्वारा हस्ताक्षरित किया जाता है।
सुनवाई पूर्ण होने के पश्चात् सभी प्रश्नों पर विनिश्चिय उपस्थित न्यायाधीशों के बहुमत से किया जाता है। मत बराबर होने की स्थिति में अध्यक्ष को निर्णायक मत देने का अधिकार होता है।
अनुच्छेद 56 के अनुसार निर्णय में उन सभी तथ्यों व कारणों का उल्लेख होगा जिन पर वह निर्णय आधारित है, यदि निर्णय सर्वसम्मत राय से नहीं दिया गया है तो किसी भी न्यायाधीश को अपनी पृथक् राय व्यक्त करने का अधिकार होगा। निर्णय पर अध्यक्ष और रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर होंगे और यह अभिकर्ताओं को सूचना देकर खुले न्यायालय में सुनाया जाएगा।
निर्णय अंतिम होगा और उसके विरूद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी। अनुच्छेद 61 के अनुसार किसी निर्णय के पुनरीक्षण का आवेदन केवल इस आधार पर किया जा सकेगा कि किसी ऐसे निर्णायक तथ्य का पता चला है, जिसका निर्णय देते समय न्यायालय तथा पक्षकार को ज्ञान नहीं था। ऐसा आवेदन नया तथ्य ज्ञात होने की तिथि से 6 माह की अवधि के भीतर ही किया जाएगा। निर्णय से 10 वर्ष पश्चात् ऐसा कोई आवेदन नहीं किया जा सकेगा।
अध्याय 4 में अनुच्छेद 65 से 68 तक सलाहकारी राय के बाबत उपबन्ध किए गए हैं। इसके तहत न्यायालय संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर द्वारा प्राधिकृत निकाय के अनुरोध पर सलाहकारी राय दे सकेगा। जिन प्रश्नों पर न्यायालय से राय सीमा मांगी गई है, उनसे सम्बन्धित सभी विवरण व दस्तावेज आवेदन के साथ संलग्न किए जाएंगे।
पांचवे व अन्तिम अध्याय में अनुच्छेद 69 व 70 के तहत संशोधन सम्बन्धी प्रक्रिया वर्णित की गई है। इसके अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में संविधान में संशोधन हेतु वही प्रक्रिया अपनायी जाएगी, जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर के संशोधन में अपनाई जाती है।