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अंडों की दिलचस्प दुनिया

( Interesting world of eggs )

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अंडा शाकाहार-मांसाहार और खाद्य-अखाद्य जैसे मुद्दो पर हमेशा चर्चित व विवादास्पद रहा है। लेकिन इस आलेख का विषय ये खूबियां या कमियां न होकर कुछ दूसरा ही है। आज हम आपको विभिन्न आकार-प्रकार के अंडों की रंग-बिरंगी और दिलचस्प दुनिया की सैर करवाएंगे।
इस धरती के स्तनपायी प्राणियों को छोड़कर लगभग सभी प्राणियों की उत्पति अंडे के द्वारा ही होती है। छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े से लेकर गिरगिट, घड़ियाल तक और नन्ही सी चिड़िया से लेकर चील-बाजों जैसे परिंदों तक सब कोई अंडे की खोल से निकलकर ही यह रंग-बिरंगी और अलबेली दुनिया देख पाते हैं। स्तनपायी-प्राणी, जो शिशु के रूप में जन्म लेते हैं, वे भी गर्भावस्था में एक प्रकार के खोल के भीतर ही क्रमिक विकास की सीढ़ियां तय करते हैं।
अंडो की दिलचस्प दुनिया में दाखिल होने से पहले, आइए, हम इनके बारे में फैली गलतफहमी दूर कर लें कि सभी अंडों का आकार ‘अंडाकार‘ होता है। अंडो की इस बहुरंगी दुनिया में आपको गोल, तिकोने, आयाताकार, वर्गाकार, चैकोर और न जाने कितने विभिन्न आकारों के अंडे देखने को मिलेंगे। कुछ अपवादों को छोड़कर आमतौर पर परिंदों के अंडे अंडाकार होते हैं। हां, यह जरूर है कि कुछेक प्रजातियों के पक्षी गोल या तिकोने अंडे भी देते है। कीट-पंतगों की एक प्रजाति के अंडे ईंटो के आकार के होते हैं। ‘स्टिक इंसेक्ट’ नामक कीट द्वारा प्रजनित अंडो का आकार ढक्करदार सुराही की शक्ल में होता है। ‘हार्न शार्क’ नामक मछली के अंडे ऊपर से चैड़े और नीचे की ओर क्रमशः संकरे होते जाते हैं।
अंडो के छिलके, जिसे अंडा कवच कहा जाता है, इनमें श्वासोच्छवास के लिए असंख्य छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। मुर्गी के अंडों में इन छिद्रों की संख्या पन्द्रह हजार तक होती है। यह प्राकृतिक संवेष्टन का अनोखा चमत्कार है। अंड-कवच में एक विकासोन्मुख चूजे के लिए सारी सामग्री उपलब्ध होती है। प्रयोगो से पता चला है कि सामान्यतः आठ डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर अंडों में संड़ाध पैदा होने लगती है।

मुर्गी, बतख और कछुए के अंडों में क्रमशः 73.7, 71.0 तथा 76 प्रतिशत भाग पानी रहता है। आकार की दृष्टि से जलीय प्राणियों में सबसे बड़ा अंडा शार्क मछली का होता है। इसके अंडो की लम्बाई तीस सेंटीमीटर तथा चैड़ाई 15 से 20 सेंटीमीटर तक होती है। परिंदों में शुतुर्मुग ही ऐसा प्राणी है, जो करीब 7 इंच लम्बा और 2 किलो वजनी अंडा देता है। इसका अंडा बहुत मजबूत होता है और यह साधारण आघात से नहीं टूटता है। ‘हमिंग बर्ड’ नाम एक चिड़िया मटर के दाने के आकार के अंडे देती है।

अंडो का रंग सफेद होना तो आम बात है, लेकिन आपको यह जानकर हैरत होगी, कि कई प्राणियों के अंडे गुलाबी, हरे, नीले, पीले जैसे आकर्षक रंगो के भी होते है। सिर्फ रंग ही नहीं, अलग-अलग पक्षियों के अंडो पर अलग-अलग तरह की डिजाइन या प्रिंट भी होती है। ‘वेवलर‘ नामक एक पक्षी की मादा गहरे नीले रंग के अंडे देती है, जबकि मछली की एक प्रजाति के अंडे रंग-बिरंगी कांच की गोलियों की तरह होते हैं। साईबेरिया के जंगलों में पाई जाने वाली एक नन्ही चिड़िया के अंडे सुर्ख लाल रंग के होते हैं। कछुओं की एक प्रजाति के अंडे गुलाबी आभा लिये होते हैं। ब्राजील में पाई जाने वाली एक मछली, जो अंडे देती है, उन्हें देखकर लगता है, मानों इन पर किसी ने रंगो के छींटे मार दिए हों।
दरअसल पक्षियों के अंडो का रंग-रूप अलग होने के कुछ प्राकृतिक कारण हैं। कुछ पक्षी जमीन पर अंडे देते है, कुछ पेड़ों पर। जमीन पर अंडे देने वाले पक्षियों के अंडो को मनुष्य और अन्य पशु-पक्षियों से खतरा होता है। अंडो को इन खतरों से बचाने के वास्ते प्रकृति ने ही एक प्रबंध किया हुआ है, जिसे ‘सुरक्षात्मक अनुरंजन‘ कहा जाता है। इसके कारण अंडों का रंग ऐसा होता है कि वे अपने आस-पास के वातावरण में घुल-मिल जाएं और किसी को नजर नहीं आए।
संख्या की दृष्टि से सर्वाधिक अंडे देने की क्षमता जलचर प्राणियों, खासतौर पर मछलियों में होती है। रोहू प्रजाति की मछली एक बार में तीन लाख से अधिक अंडे देती है। सांप की एक प्रजाति एक बार में लगभग 75 अंडे देने की क्षमता रखती है। मादा मेंढक भी हजारों की संख्या में अंडे देती है। घरेलू छिपकलियों का सीमित परिवार के सिद्वांत में विश्वास है। वह एक बार में केवल दो अंडे देती है। जबकि गिरगिट 15 से 20 तक अंडे देता है। कछुओ की अंडा-जनन क्षमता विभिन्न प्रजातियों के अनुसार सात से दो सौ पचास तक होती है। मादा घड़ियाल एक दफा में 15 से 45 तक अंडे देती है।
पक्षियों में कबूतर, कोयल, कौवा, गौरेया आदि 2 से 4 अंडे देते है, जबकि पेंगुइन पक्षी एक बार में केवल एक ही अंडा देता है।
अपनी धूर्तता और चालाकी के लिए मशहूर कौवा कोयल से ही मात खाता है। कौए से अपने अंडो की सुरक्षा के लिए कोयल अक्सर अपने अंडे कौए के घौंसले में रख देती है और कौआ उन अंडो को अपना ही समझकर उनकी पूर्ण देखरेख करता है। इसी प्रकार माद कूक्कू नामक चिड़िया भी अपने अंडे दूसरी चिड़ियाओं के घोंसले में रख देती है। हमने अपने शत्रुओ से सुरक्षा के लिए कई पशु-पक्षियों को वातावरण के अनुरूप अपना रंग बदलते देखा है, किंतु आपको यह जानकर अचंभा होगा कि कुछ प्राणियों के अंडे भी अपनी सुरक्षा की दृष्टि से अपना रंग वातावरण के अनुरूप परिवर्तित कर लेते हैं।