pexels maksim goncharenok 5995221 scaled

सफरनामा इंसुलिन का

pexels maksim goncharenok 5995221

आज मधुमेह के हजारो रोगी ‘इंसुलिन‘ के इंजेक्शन लगाकर इस बीमारी के विरूद्ध कारगर संघर्ष कर रहे हैं। दुनिया भर में मधुमेह के लाखों मरीज ‘इंसुलिन‘ नामक चमत्कारिक और प्राणदायक रसायन के बल पर जी रहे है। आखिर ‘इंसुलिन‘ है क्या? दरअसल यह एक जीवन रक्षक रसायन है, जो शरीर की शर्करा पर नियन्त्रण रखता है तथा शरीर में उसके संतुलित सदुपयोग की समुचित व्यवस्था करता है। ‘इंसुलिन‘ नामक हारमोन का निर्माण शरीर में हमारे अग्नाशय ( आमाशय के पीछे स्थित जीभ के आकार वाली एक गुलाबी ग्रंथ ) द्वारा किया जाता है। किन्हीं कारणों से जब अग्नाशय में इंसुलिन निर्माण की प्रक्रिया बंद हो जाती है, तब शरीर के ग्लुकोज ( शर्करा ) पर नियन्त्रण समाप्त हो जाता है और शरीर में शक्कर की मात्रा बढ़ने लगती है। यही स्थिति ‘मधुमेह‘ है।
‘इंसुलिन‘ की खोज किसने की? आखिर वह कौन थे, जिन्होंने मानवता पर इतना बड़ा उपकार किया? यदि इस प्राणदायक सव्व की खोज नहीं होती तो आज क्या होता? ऐसे सैकड़ों प्रश्न हंै, जिनका उत्तर पाने के लिए हमें पिछली होती सदी के शुरूआती मुकाम तक चलना होगा।
बीसवीं सदी के पहले-दूसरे दशक तक मधुमेह कैंसर व एड्स की तरह एक लाईलाज बीमारी थी, एक न बुझने वाली प्यास, बार-बार पेशाब की शिकायत और चोट लगने पर खून के प्रवाह की निरन्तरता जैसे लक्षणों के साथ रोगी अपनी जिंदगी की आखरी घड़िया गिनता रहता था। तब मधुमेह के रोगी की जिन्दगी सिर्फ कुछ महीनों की होती थी।
यह एक ऐसी त्रासदायक स्थिति थी, जो बार-बार मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पित चिकित्सा विज्ञानियों को बचैन किए रहती थी। इनमें से ही एक थे कनाडा के आंेटारिया राज्य में 14 नवम्बर 1891 में जन्मे फ्रेडरिक ग्रोट बैंटिग। वह पश्चिमी टोरंटो विश्वविद्यालय में शरीर-विज्ञान के व्याख्याता थे। उन्होंने मधुमेह नामक इस खतरनाक रोग के सभी पहलुओं पर सूक्ष्म अध्ययन किया।
बैंटिग ने अपने प्रारम्भिक प्रयोगो में पाया कि पैंकियास अर्थात अग्नाशय में से तीन पाचक रस निकलते है, जो क्रमशः प्रोटीन, चर्बी व स्टार्च को पचाते हैं। बैंटिग ने प्रयोग के तौर पर कुत्ते के शरीर से अग्नाशय ग्रन्थि निकाल दी तो पाया की इस ग्रंथि के अभाव में वह कुत्ता मधुमेह से पीड़ित हो गया तथा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि शरीर में शर्करा नियन्त्रण का रहस्य सचमुच अग्नाशय में है। उनकी मान्यता थी कि यदि शरीर में शर्करा को नियन्त्रित करने वाला कोई रसायन इस ग्रन्थि में बनता है तो पथरी से नलिका बंद होने पर उस रसायन को भी रूक जाना चाहिए था। तब उन्होंने इस नलिका को बांध कर प्रयोग करने का निश्चय किया।
बैंटिग इस सम्बन्ध में विस्तृत प्रयोग करना चाहते थे। उन्हें अपने विभागाध्यक्ष डाक्टर मिलर के सहयोग से टोरंटो विश्वविद्यालय में प्रो0 मैकलियाड की प्रयोगशाला में काम करने की अनुमति मिल गई । डा0 मैकलियाड लम्बे अवकाश पर जाने वाले थे, उन्होंने बैंटिग को प्रयोगशाला की सुविधा उपलब्ध करवा दी। 16 मई 1921 को बैंटिग ने अपने एक अन्य सहयोगी चाल्र्स हरबर्ट बेस्ट के साथ अपने प्रयोगों की शुरूआत की। बैंटिंग ने कुत्तो के पेट खोलकर ‘ केट-गट ‘ से उनकी अग्नाशय नलिका को बांध दिया किन्तु सात सप्ताह बाद 6 जुलाई को जब कुत्तों के पेट खोले तो पाया कि ‘केट गट‘ के गल जाने से उनके प्रयोग विफल हो गये थे। बैंटिग ने हिम्मत नहीं हारी। इस बार उन्होंने कैट-गट के स्थान पर नलिका बांधने हेतु रेशमी डोरी का इस्तेमाल किया। इस बार उन्होंने चार सप्ताह बाद जब कुत्ते का पेट वापस खोला तो पाया कि ग्रन्थि काफी सूख चुकी थी किन्तु कुत्ता मधुमेह से पीड़ित नही हुआ था। बैंटिंग तुरन्त समझ गए कि इस ग्रन्थि में ही दरअसल वह रहस्यमय रसायन बन रहा है जो बिना नलिका के भी लहू में मिलकर शर्करा को नियत्रित कर रहा था। बैंटिग ने उस ग्रन्थि को निकाल कर उसका सत्व बना डाला। अब उन्होंने इस सत्व को इजेक्शन द्वारा मधुमेह से बुरी तरह पीड़ित कुतिया के शरीर में पहुंचाया। धीरे-धीरे कुतिया के शरीर में शर्करा का स्तर घटने लगा। सुई द्वारा सत्व शरीर में पहुंचता गया और माजौरी नामक वह कुतिया ‘मधुमेह‘ से मुक्त होती गई। यह ‘इंसुलिन‘ के कृत्रिम प्रयोग का यह पहला अवसर था।
बैंटिग अपनी इस नायाब खोज पर बहुत खुश थे। इस बीच प्रोफेसर मैकलियाड भी छुट्टिया बिता कर लौट आए। बैंटिग व बेस्ट ने बड़े उत्साह से उन्हें अपनी इस खोज के बारे में विस्तार से बताया। प्रो0 मैकलियाड इन युवाओं की अभूतपूर्व सफलता पर मन-ही-मन आश्चर्य चकित हो उठे। उन्होंने इस खोज का श्रेय-खुद लेने का निश्चय किया और इस दिशा में अन्य पशुआंे पर अपनी प्रयोगशाला में प्रयोग शुरू कर दिए।
इंसुलिन का आदमी पर सबसे पहला प्रयोग 11 जनवरी 1922 को टोरन्टो के जनरल अस्पताल में चैदह वर्षीय किशोर जिमी लियोनार्ड पर किया गया। मधुमेह से पीड़ित जिमी अपनी आखरी सांसे गिन रहा था कि बैंटिग व बेस्ट ने मिलकर जिमी के जीवन के प्रति आशा जगाते हुए सत्व की सुई उसे लगा दी और………और हैरत अंगेज तौर जिमी के शरीर में, उसके लहू में शर्करा का स्तर घटने लगा, धीरे-धीरे वह मृत्यु के दरवाजे से वापस लौट आया। यह चमत्कार था ! बैंिटग ने एक लाईलाज मर्ज की कारगर दवा खोज ली थी।
इधर प्रो0 मैकलियाड इस खोज को अपने नाम लिखाने पर तुले बैठे थे। उन्होंने एक शोध-पत्र प्रकाशित कर ‘इंसुलिन‘ के खोजक के रूप में पहला अपना तथा दूसरा बैंटिग का नाम दिया। इस शोध-पत्र में बैटिंग के सहयोगी बेस्ट का कहीं जिक्र तक नहीं था। बैंटिंग को मैकलियाड की यह हरकत नागवार गुजरी । उसने सार्वजनिक रूप से इसकी भत्र्सना की और लोगों को बताया कि ‘इंसुलिन‘ उसकी तथा बेस्ट की खोज है।
अभी यह विवाद जारी ही था कि ‘इंसुलिन‘ की महत्वपूर्ण खोज के लिए चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरूस्कार प्रो0 मेकलियाड तथा बैटिंग को संयुक्त रूप से देने की घोषणा कर दी गई। बैंटिग ने बेस्ट की अवेलहना के कारण नोबेल पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया। अल्यधिक विवादास्पद स्थिति में पुरस्कार के लिए नामों का क्रम सुधार कर बैंटिग को प्रथम तथा मैंकलियाड को दूसरे स्थान पर रखा गया। अब बैंटिग ने पुरूस्कार की आधी राशि अपने सहयोगी बेस्ट के साथ सार्वजनिक रूप से बांट ली। प्रो0 मैकलियाड को आज भी चिकित्सा जगत में एक स्वार्थी व तिकड़मी व्यक्ति के रूप में जाना जाता हैैै।
दुनिया भर के लाखों करोड़ों लोगो के लिए जीवन की आशा का संचार करने वाला वह महान चिकित्सा-विज्ञानी फ्रेडरिक ग्रांट बैंटिग सन् 1941 में एक विभान दुर्धटना का शिकार हो गया।